दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सेंट्रल सेक्रेटेरिएट क्लब के दो पदाधिकारियों को राष्ट्रपति संपदा (प्रेसिडेंट्स एस्टेट) स्थित उसके परिसर से जरूरी रिकॉर्ड और सामान वापस लेने की इजाजत दें। क्लब को यह पूरी प्रक्रिया दो सप्ताह की समयसीमा के भीतर पूरी करनी होगी।
जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने संबंधित अधिकारियों से कहा कि वे क्लब के दो नामित पदाधिकारियों को परिसर में जाने और वहां मौजूद सामान को एकत्र करने की आवश्यक सुविधा प्रदान करें।
सामान और रिकॉर्ड की सूची सौंपेंगे क्लब के प्रतिनिधि
अदालत के निर्देश के अनुसार, पूर्व में तालकटोरा क्लब के नाम से पहचानी जाने वाली इस संस्था के प्रतिनिधि पहले परिसर का मुआयना करेंगे। इसके बाद वे वहां से निकाले जाने वाले जरूरी दस्तावेजों और वस्तुओं की एक सूची तैयार कर अधिकारियों को सौंपेंगे। सूची मिलने के तुरंत बाद प्रशासन इन सामानों को क्लब के सुपुर्द करने के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
यह निर्देश 7 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान सामने आया, जब क्लब के वकील ने कोर्ट से गुहार लगाई कि मुख्य विवाद लंबित रहने के दौरान ही सरकारी अधिकारियों ने संपत्ति का कब्जा ले लिया है, इसलिए उन्हें अपने जरूरी दस्तावेज और निजी संपत्ति वापस लाने की अनुमति दी जाए।
मान्यता रद्दीकरण और बेदखली के खिलाफ कानूनी लड़ाई
यह अंतरिम राहत क्लब द्वारा दायर उस मुख्य याचिका से जुड़ी है, जिसमें दो प्रशासनिक फैसलों को चुनौती दी गई है। इनमें पहला कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) का 14 जुलाई का मान्यता रद्द करने का आदेश है और दूसरा संपदा अधिकारी द्वारा 17 जुलाई को जारी किया गया बेदखली नोटिस, जिसके जरिए परिसर को तत्काल खाली करने का फरमान सुनाया गया था।
इससे पूर्व, 13 अगस्त को हाईकोर्ट ने क्लब की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया था। हालांकि, उस समय बेंच ने संपत्ति पर यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया था, जिसके चलते प्रशासन द्वारा परिसर को कब्जे में लेने का रास्ता साफ हो गया था।
107 साल पुरानी संस्था को अवैध कब्जाधारी बताने का आरोप
क्लब ने अपनी याचिका में सरकार की इस पूरी कार्रवाई को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और प्रशासनिक शक्तियों का अनुचित इस्तेमाल करार दिया है। याचिका के अनुसार, क्लब का कामकाज संभाल रही एड-हॉक कमेटी के कार्यकाल के दौरान हुई वित्तीय और प्रबंधकीय अनियमितताओं की शिकायतों पर सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय, प्रशासन ने फरवरी में बिना कोई कारण बताओ नोटिस दिए ही मान्यता वापस ले ली थी।
अदालती दखल के बाद क्लब को सुनवाई का अवसर मिला, लेकिन इसके बाद 14 जुलाई को मान्यता रद्द करने का नया आदेश जारी कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 107 साल पुरानी इस ऐतिहासिक संस्था को स्थायी दखल का दर्जा प्राप्त था। इसके बावजूद, आवंटन निरस्त कर संस्था को ‘अनधिकृत कब्जाधारी’ की श्रेणी में डाल दिया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।

