सरकारी वकीलों के लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य करने के आदेश पर दिल्ली हाईकोर्ट की रोक

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें ट्रायल कोर्ट में काम करने वाले सरकारी वकीलों के लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक सिस्टम से रोजाना हाजिरी लगाना अनिवार्य किया गया था।

जस्टिस अमित महाजन ने दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम राहत दी। एसोसिएशन ने दिल्ली सरकार के अभियोजन निदेशालय द्वारा 5 अक्टूबर को जारी आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई दिसंबर में तय की है।

सरकारी वकीलों ने क्यों किया आदेश का विरोध?

दिल्ली सरकार के आदेश के मुताबिक, सभी अभियोजन अधिकारियों को अपने संबंधित जिला कोर्ट परिसर या जिला प्रभारी के कार्यालय में बायोमेट्रिक मशीन अथवा मोबाइल ऐप के जरिए प्रतिदिन हाजिरी दर्ज करनी थी।

एसोसिएशन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन, आशीष मोहन और सचिन पुरी ने दलील दी कि सरकारी वकील और अतिरिक्त सरकारी वकील भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 18 और 19 के तहत नियुक्त होते हैं और कोर्ट के अधिकारी के रूप में काम करते हैं।

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उन्होंने कहा कि सरकारी वकीलों की उपस्थिति पहले से ही कोर्ट की दैनिक कार्यवाही के आदेशों में दर्ज होती है। ऐसे में उन्हें अलग से बायोमेट्रिक हाजिरी लगाने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है।

याचिका में इस आदेश को मनमाना और बिना ठोस कारण के जारी किया गया बताया गया। साथ ही दलील दी गई कि यह आधार से जुड़े कानूनी प्रावधानों और निजता के अधिकार के खिलाफ है।

कोर्ट की कार्यवाही पर पड़ सकता है असर

एसोसिएशन ने बताया कि सरकारी वकीलों का काम मुख्य रूप से कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ा होता है। अदालतों में सुबह 10 बजे सुनवाई शुरू होती है, लेकिन सरकारी वकीलों की जिम्मेदारियां उससे पहले ही शुरू हो जाती हैं।

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उन्हें जांच अधिकारियों से बातचीत करनी होती है, पुलिस की केस फाइलें देखनी होती हैं, गवाहों की उपस्थिति की जानकारी लेनी होती है और रिमांड तथा जमानत से जुड़े मामलों की तैयारी करनी होती है। इसके बाद वे कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने तक सुनवाई में मौजूद रहते हैं।

याचिका में कहा गया कि हाजिरी के लिए सख्त नियम लागू करने से मुख्य सरकारी वकीलों पर अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ पड़ेगा। उन्हें कोर्ट से जुड़े सामान्य कामकाज के दौरान भी अभियोजन अधिकारियों की आवाजाही का हिसाब रखना होगा।

एसोसिएशन के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था सरकारी वकीलों का ध्यान उनकी मुख्य जिम्मेदारियों से हटा सकती है। इससे रिमांड, जमानत और आपराधिक मुकदमों की सुनवाई में अनावश्यक देरी होने की आशंका है।

याचिका में यह भी कहा गया कि इस तरह की देरी आपराधिक न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले शीघ्र सुनवाई के अधिकार पर भी असर डाल सकती है।

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सरकार ने पहले खारिज कर दी थी आपत्ति

एसोसिएशन ने हाईकोर्ट को बताया कि उसने पहले भी अधिकारियों के सामने बायोमेट्रिक हाजिरी की अनिवार्यता का विरोध करते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी।

हालांकि, संबंधित अधिकारियों ने उसकी आपत्ति को आधारहीन बताते हुए खारिज कर दिया था। अधिकारियों का कहना था कि हाजिरी दर्ज करना आवश्यक है।

इस मामले में एसोसिएशन की ओर से एडवोकेट कुशल कुमार, आदित्य कपूर, ऋषभ सक्सेना और हर्ष आहूजा भी पेश हुए।

फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों के लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य करने वाले आदेश पर रोक लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई दिसंबर में होगी।

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