नियमित चयन से आए डायरेक्ट रिक्रूट्स, अनुकंपा और अस्थायी कर्मचारियों से वरिष्ठ रहेंगे: सुप्रीम कोर्ट

तमिलनाडु मिनिस्ट्रियल सर्विस में वरिष्ठता को लेकर चार दशकों से चले आ रहे विवाद का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि खुली प्रतियोगी परीक्षा और नियमित चयन प्रक्रिया के जरिए नियुक्त हुए कर्मचारी, बाद में नियमित किए गए अस्थायी या अनुकंपा नियुक्त कर्मचारियों से कनिष्ठ (जूनियर) नहीं हो सकते। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 1983 परीक्षा बैच के डायरेक्ट रिक्रूट्स की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्त कर्मचारी उनसे वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकते। इसके साथ ही अदालत ने यह भी माना कि आपातकालीन प्रावधानों के तहत आए विशेष अस्थायी कर्मचारी भी नियमित डायरेक्ट रिक्रूट्स से नीचे ही रहेंगे। वहीं, अनुकंपा कर्मचारियों और विशेष अस्थायी कर्मचारियों के बीच आपसी वरिष्ठता तय करने के लिए उनके नियमितीकरण की तारीख को आधार मानने का आदेश दिया गया है।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद 1980 के दशक की शुरुआत में तमिलनाडु सरकार के विभिन्न विभागों में हुई नियुक्तियों से जुड़ा है। वर्ष 1981 से 1983 के बीच राज्य सरकार ने जूनियर असिस्टेंट और अन्य मिनिस्ट्रियल पदों पर नियमित भर्ती पर रोक लगा दी थी। इस दौरान प्रशासनिक काम चलाने के लिए तमिलनाडु स्टेट एंड सबऑर्डिनेट सर्विसेज रूल्स, 1955 के पार्ट II के जनरल रूल्स के नियम 10(a)(i) के तहत रोजगार कार्यालयों के जरिए आपातकालीन और अस्थायी नियुक्तियां की गईं। एम. प्रेमा, आर. कांतिमती और ए. गोविंदराजन जैसे कर्मचारी इसी प्रावधान के तहत सेवा में आए।

इसी बीच, तमिलनाडु लोक सेवा आयोग (टीएनपीएससी) ने ग्रुप IV के 5,000 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया और 27 नवंबर 1983 को लिखित परीक्षा आयोजित की। इस परीक्षा के परिणाम अलग-अलग तिथियों पर घोषित हुए और सफल अभ्यर्थियों को 1985 से 1987 के बीच नियुक्तियां दी गईं। इन चयनित कर्मचारियों को 1983 बैच के डायरेक्ट रिक्रूट्स के रूप में जाना गया।

दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने अनुकंपा पर नियुक्त कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित करने का निर्णय लेते हुए 14 सितंबर 1984 को एक शासनादेश (जी.ओ. नंबर 951) जारी किया, जिसमें कार्यभार ग्रहण करने की तिथि के आधार पर उन्हें डायरेक्ट रिक्रूट्स के बीच वरिष्ठता सूची में स्थान देने का प्रावधान किया गया था। इसके तुरंत बाद, 22 सितंबर 1984 के शासनादेश से नियम 10(a)(i) के तहत कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों (विशेष कर्मचारियों) को 26 जून 1984 से नियमित कर दिया गया। इनकी सेवा शर्तों और वरिष्ठता को विनियमित करने के लिए राज्यपाल ने 19 जून 1987 को स्पेशल एब्जॉर्प्शन रूल्स, 1987 अधिसूचित किए, जिसे 25 जून 1984 से प्रभावी माना गया। इन नियमों के क्लॉज 10 में स्पष्ट प्रावधान किया गया कि विशेष कर्मचारी, नवंबर 1983 की परीक्षा से चयनित डायरेक्ट रिक्रूट्स से नीचे ही रहेंगे, भले ही डायरेक्ट रिक्रूट्स ने बाद की तारीख में कार्यभार संभाला हो।

जब वरिष्ठता सूची में विशेष कर्मचारियों को डायरेक्ट रिक्रूट्स से नीचे रखा गया, तो उन्होंने वर्ष 2001 में तमिलनाडु प्रशासनिक अधिकरण में क्लॉज 10 की वैधता को चुनौती दी। वहीं, डायरेक्ट रिक्रूट्स ने 2004 में मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दोनों श्रेणियों पर अपनी वरिष्ठता का दावा किया। मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 3 अप्रैल 2006 को अपने फैसले में कहा कि डायरेक्ट रिक्रूट्स विशेष कर्मचारियों से ऊपर रहेंगे, लेकिन डायरेक्ट रिक्रूट्स और अनुकंपा कर्मचारियों के बीच वरिष्ठता का निर्धारण उनकी पहली नियुक्ति की तिथि से होगा। इस फैसले से असंतुष्ट होकर तीनों पक्ष—डायरेक्ट रिक्रूट्स, विशेष कर्मचारी और मूल आवेदक—सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

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पक्षों की दलीलें

डायरेक्ट रिक्रूट्स की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. प्रभाकर ने दलील दी कि पिछले दरवाजे, आपातकालीन या अनुकंपा के आधार पर सेवा में आए कर्मचारी खुली और पारदर्शी प्रतियोगी परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों से आगे नहीं निकल सकते। उन्होंने के. मदलईमुथु एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि नियमित प्रक्रिया से आए अभ्यर्थी अन्य माध्यमों से भर्ती हुए लोगों पर वरिष्ठता पाने के पूर्ण हकदार हैं।

अनुकंपा पर नियुक्त कर्मचारियों (जिनमें 1985 में नियुक्त और फरवरी 1987 में नियमित हुए एस. प्रेम कुमार और टी.ए. कण्णप्पा शामिल थे) की ओर से तर्क दिया गया कि वे सेवा नियमों के नियम 2(14) के तहत डायरेक्ट रिक्रूट्स की परिभाषा में आते हैं। उन्होंने 14 सितंबर 1984 के शासनादेश पर भरोसा जताया और कहा कि इस आदेश को किसी ने चुनौती नहीं दी है, इसलिए कार्यभार ग्रहण करने की तिथि के अनुसार उन्हें डायरेक्ट रिक्रूट्स के साथ वरिष्ठता मिलनी चाहिए।

विशेष कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. सुब्रमण्यम ने सेवा विधिशास्त्र के सामान्य सिद्धांत का हवाला देते हुए तर्क दिया कि नियमितीकरण के बाद कर्मचारियों की वरिष्ठता उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से गिनी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि एब्जॉर्प्शन से पहले उनके द्वारा की गई निरंतर सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार ने स्पेशल एब्जॉर्प्शन रूल्स के क्लॉज 10 का समर्थन करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का अपवाद है, इसलिए ऐसे कर्मचारी खुली प्रतियोगी परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों की बराबरी का दावा नहीं कर सकते।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

पीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने रेखांकित किया कि तमिलनाडु सेवा नियमों के नियम 6 में भर्ती के केवल दो ही तरीके मान्य हैं—सीधी भर्ती या स्थानांतरण द्वारा भर्ती। अनुकंपा नियुक्ति नियमित भर्ती का विकल्प नहीं हो सकती। अनुकंपा कर्मचारियों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

“अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का एक अपवाद है। अनुकंपा नियुक्तियां एक योजना के तहत की जाती हैं और सेवाकाल के दौरान दिवंगत हुए कर्मचारी के आश्रितों को सामान्यतः उनकी योग्यता और उपलब्ध रिक्तियों के आधार पर वर्ग III या वर्ग IV के पदों पर नियुक्त किया जाता है। यह चयन का कोई नियमित माध्यम नहीं है और अनुकंपा नियुक्त कर्मचारियों को डायरेक्ट रिक्रूट्स के समकक्ष नहीं रखा जा सकता।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत जारी कार्यकारी आदेश नियमों के पूरक तो हो सकते हैं, लेकिन वे सेवा विधिशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत काम नहीं कर सकते। नियमित रूप से चयनित अभ्यर्थियों की वैध अपेक्षाओं पर जोर देते हुए अदालत ने कहा:

“एक सरकारी कर्मचारी, जो नियमित चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त होता है, उसकी यह वैध अपेक्षा होती है कि बाद के चरण में नियमित माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के साथ-साथ अन्य स्रोतों से संवर्ग में आने वाले अन्य नियुक्तियों के मुकाबले भी उसकी पारस्परिक वरिष्ठता सुरक्षित रहे। जो व्यक्ति नियमित माध्यम से चुने गए थे, उन्हें बाद के चरण में अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण के कारण कनिष्ठ नहीं बनाया जा सकता।”

इस आधार पर पीठ ने माना कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अनुकंपा कर्मचारियों को 1983 के डायरेक्ट रिक्रूट्स से ऊपर रखकर गलती की थी।

नियम 10(a)(i) के तहत नियुक्त विशेष कर्मचारियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल एब्जॉर्प्शन रूल्स, 1987 के क्लॉज 10 की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह सही ठहराया। अदालत ने तमिलनाडु राज्य एवं अन्य बनाम ई. परिपूर्णम एवं अन्य तथा एम.पी. पलानीसामी एवं अन्य बनाम ए. कृष्णन एवं अन्य के फैसलों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि तदर्थ या आपातकालीन व्यवस्था के तहत आए कर्मचारी नियमितीकरण से पहले की अपनी सेवा का लाभ वरिष्ठता के लिए नहीं ले सकते।

क्लॉज 10 के तहत विशेष कर्मचारियों की वरिष्ठता घटाए जाने को उचित ठहराते हुए अदालत ने कहा:

“क्लॉज 10 वरिष्ठता तय करने के उस सुस्थापित मानदंड का पालन करता है कि जो सरकारी कर्मचारी नियमित नियुक्ति प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त होते हैं, उन्हें वरिष्ठता सूची में उन लोगों से उच्च स्थान पर होना चाहिए जो नियमितीकरण के माध्यम से संवर्ग में आए हैं। नियोक्ता को संवर्ग में कर्मचारियों के दो या दो से अधिक वर्गों की पारस्परिक वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार है।”

संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले डायरेक्ट रिक्रूट क्लास II इंजीनियरिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया:

“वरिष्ठता का यह एक बुनियादी नियम है कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए और नियमों के अनुसार किसी पद पर नियुक्त सरकारी कर्मचारी को उन नियुक्तियों से वरिष्ठ होना चाहिए जो सेवा में अस्थायी या कामचलाऊ व्यवस्था के तहत आए थे अथवा किसी आपात स्थिति के कारण नियुक्त किए गए थे।”

अदालत ने हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम शीला देवी और एस.डी. जयप्रकाश बनाम भारत संघ के मामलों का अंतर समझाते हुए कहा कि पूर्व की अस्थायी सेवाओं को केवल पेंशन लाभ के लिए गिना जा सकता है, नियमित डायरेक्ट रिक्रूट्स के ऊपर वरिष्ठता पाने के लिए नहीं।

अनुकंपा और विशेष कर्मचारियों के बीच पारस्परिक वरिष्ठता के सवाल पर अदालत ने व्यावहारिक रुख अपनाते हुए कहा:

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“उन मामलों को छोड़कर जहां भर्ती नियम स्पष्ट हैं और पारस्परिक वरिष्ठता तय करने की पद्धति प्रदान करते हैं, अस्थायी, तदर्थ या अनुकंपा नियुक्त कर्मचारियों की पारस्परिक वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए उनके नियमितीकरण की तिथि से वरिष्ठता गिनने के मानदंड का पालन किया जाना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं के समूह का निपटारा करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. डायरेक्ट रिक्रूट्स द्वारा दायर सिविल अपील संख्या 8755/2013 को इस हद तक स्वीकार किया गया कि अनुकंपा नियुक्त कर्मचारी एस. प्रेम कुमार और टी.ए. कण्णप्पा, 1983 बैच के डायरेक्ट रिक्रूट्स से ऊपर नहीं रहेंगे।
  2. स्पेशल एब्जॉर्प्शन रूल्स के क्लॉज 10 को चुनौती देने वाले ट्रांसफर्ड केस (सी) संख्या 50, 51 और 52/2013 को खारिज कर दिया गया।
  3. विशेष कर्मचारियों द्वारा दायर सिविल अपील संख्या 8756 और 8757/2013 को इस निर्देश के साथ निस्तारित किया गया कि विशेष कर्मचारियों और अनुकंपा कर्मचारियों के बीच वरिष्ठता का निर्धारण उनके संबंधित नियमितीकरण की तिथि के आधार पर किया जाएगा।
  4. मद्रास हाईकोर्ट के 3 अप्रैल 2006 के निर्णय को उपरोक्त सीमा तक संशोधित किया गया।
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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एम. प्रेमा बनाम तमिलनाडु राज्य, सचिव के माध्यम से एवं अन्य (और संबद्ध मामले)

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8757/2013, साथ में सिविल अपील संख्या 8755/2013, 8756/2013, और टी.सी.(सी) संख्या 50/2013, 51/2013, 52/2013

पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस श्री चंद्रशेखर

निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर 2026

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