इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति और ससुराल वालों पर मारपीट तथा मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाने वाली 24 वर्षीय महिला को करीब 20 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच विवाद से पैदा हुई मानसिक परेशानी का समाधान केवल गर्भपात नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में उचित काउंसलिंग की मदद ली जा सकती है।
जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने 5 अक्टूबर को दिए फैसले में महिला के अपने शरीर और प्रजनन संबंधी फैसले लेने के अधिकार को स्वीकार किया। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि मामले में ऐसे पर्याप्त सबूत नहीं हैं, जिनसे यह साबित हो कि गर्भावस्था जारी रखने से महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
हाईकोर्ट ने पति-पत्नी की मुफ्त मैरिटल काउंसलिंग कराने का निर्देश दिया। साथ ही महिला के खर्चों के लिए उसके पति के वेतन से हर महीने ₹12,000 काटने का आदेश दिया।
वैवाहिक विवाद और मानसिक परेशानी गर्भपात का एकमात्र आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भपात की अनुमति से जुड़े मामलों में महिला की शारीरिक स्वतंत्रता, प्रजनन संबंधी अधिकार, गर्भ में पल रहे बच्चे और महिला के स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं पर संतुलित तरीके से विचार करना जरूरी है।
बेंच ने पाया कि महिला ने घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसे ठोस सबूत नहीं हैं जिनसे यह साबित हो कि गर्भावस्था जारी रखने पर उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा होगा।
कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में विवाद के कारण होने वाली मानसिक परेशानी का समाधान केवल गर्भपात नहीं हो सकता। इसके लिए मनोवैज्ञानिक सहायता और वैवाहिक काउंसलिंग जैसे विकल्प उपलब्ध हैं। सरकारी संस्थानों में भी ऐसी सेवाएं दी जाती हैं।
फैसले में कोर्ट ने मदर टेरेसा के 1979 के नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकार करते समय दिए गए भाषण का भी उल्लेख किया। उस भाषण में मदर टेरेसा ने गर्भपात को बच्चे के खिलाफ युद्ध बताते हुए अजन्मे जीवन की पवित्रता पर जोर दिया था।
महिला ने पति और ससुराल वालों पर लगाए गंभीर आरोप
मामले में महिला की शादी मई 2026 में एक पुलिस कांस्टेबल से हुई थी। शादी के बाद उसके और पति के बीच विवाद शुरू हो गया।
महिला का आरोप था कि उसका पति उसके चरित्र पर शक करता था और कई बार उसके साथ मारपीट कर चुका था। उसने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों पर शारीरिक तथा मानसिक प्रताड़ना का भी आरोप लगाया।
महिला ने कोर्ट को बताया कि शुरुआत में वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती थी, लेकिन ससुराल में कथित दुर्व्यवहार के कारण उसका फैसला बदल गया। उसका कहना था कि अब वह मानसिक रूप से गर्भावस्था जारी रखने की स्थिति में नहीं है।
उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने गर्भपात कराने पर उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दी थी।
अधिवक्ता रवि केशरवानी के माध्यम से महिला ने दलील दी कि वह एक बालिग और विवाहित महिला है। इसलिए उसे अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े फैसले स्वतंत्र रूप से लेने का अधिकार है।
महिला ने अपनी आर्थिक स्थिति का भी हवाला दिया। उसने बताया कि वह बेरोजगार है और खर्चों के लिए माता-पिता पर निर्भर है। ऐसे में बच्चे के जन्म और उसके पालन-पोषण का खर्च उठाना उसके लिए संभव नहीं है।
पति ने आरोपों से किया इनकार
दूसरी ओर, महिला के पति ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया। उसने कहा कि पति-पत्नी के बीच मामूली गलतफहमी के कारण विवाद पैदा हुआ है।
पति ने मारपीट, प्रताड़ना, जबरन फिनाइल पिलाने और पुलिस की निष्क्रियता से जुड़े आरोपों को निराधार बताया। उसका कहना था कि इन आरोपों के समर्थन में कोई पर्याप्त सबूत पेश नहीं किया गया है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि पति की मासिक आय करीब ₹40,000 है। उसने पत्नी और बच्चे की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने पर सहमति जताई।
पति ने महिला के इलाज और देखभाल के लिए हर महीने ₹12,000 देने की भी बात कही।
आर्थिक परेशानी के आधार पर गर्भपात की अनुमति देने से इनकार
हाईकोर्ट ने महिला की आर्थिक परेशानियों को लेकर कहा कि उसकी दलील में कुछ दम है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी देखा कि पति नौकरी करता है और पत्नी तथा बच्चे के खर्च उठाने के लिए तैयार है।
बेंच ने माना कि केवल आर्थिक कठिनाइयों के कारण शादी के दौरान ठहरे गर्भ को अवांछित मानकर गर्भपात की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर जब पति आर्थिक सहायता देने के लिए सहमत हो।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने महिला की गर्भपात की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को पति-पत्नी के लिए मुफ्त वैवाहिक काउंसलिंग की व्यवस्था करने का निर्देश दिया। इसके अलावा महिला की देखभाल और अन्य खर्चों के लिए उसके पति के वेतन से हर महीने ₹12,000 काटकर उसे देने का आदेश दिया।

