इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में अप्रैल 2026 के मजदूर प्रदर्शन के सिलसिले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत में लिए गए पत्रकार सत्यम वर्मा की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने बुधवार और गुरुवार (7 और 8 अक्टूबर) को दो दिनों तक संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय सुरक्षित किया।
सत्यम वर्मा की ओर से उनके अधिवक्ता अभिषेक द्विवेदी ने पैरवी की। सुनवाई पूरी होने के बाद अधिवक्ता द्विवेदी ने बताया कि अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। उन्होंने अदालती कार्यवाही पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि विस्तृत फैसला सार्वजनिक होने के बाद ही वह इस बारे में कुछ कह सकेंगे।
गौतमबुद्ध नगर डीएम के हिरासत आदेश को दी गई है चुनौती
सत्यम वर्मा ने इस याचिका के जरिए गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी द्वारा 12 मई 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 की धारा 3(2) सहपठित धारा 3(3) लगाई गई थी।
याचिका में इस हिरासत आदेश और उससे जुड़े सभी आगामी निर्देशों को रद्द करने की मांग की गई है। इसके साथ ही पत्रकार ने कथित अवैध हिरासत के खिलाफ तत्काल रिहाई और उचित मुआवजे की भी गुहार लगाई है।
घटनास्थल से 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में मौजूदगी का दावा
याचिका का मुख्य आधार यह है कि हिरासत आदेश पूरी तरह से तथ्यात्मक रूप से असंभव आधार पर आधारित है। प्रशासन ने 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हुई हिंसा में वर्मा की संलिप्तता का आरोप लगाया है, जबकि याचिका के अनुसार सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (सीडीआर) साबित करते हैं कि घटना के समय वह नोएडा से लगभग 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में मौजूद थे।
याचिका में दावा किया गया है कि उसी दिन दोपहर 2:14 बजे लखनऊ की हसनगंज पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। याचिकाकर्ता ने इसे पुख्ता साक्ष्य बताते हुए दलील दी कि भौतिक रूप से असंभव और पूरी तरह झूठे आधार पर जारी रासुका आदेश निरस्त किए जाने योग्य है।
इसके अलावा याचिका में आरोप लगाया गया कि जांच अधिकारी ने हसनगंज थाने के सीसीटीवी फुटेज और सीडीआर को जानबूझकर सक्षम प्राधिकारी (जिलाधिकारी) से छिपाया। याचिका के मुताबिक इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को दबाए जाने के कारण हिरासत आदेश जारी करने वाले प्राधिकारी का व्यक्तिगत विवेक (सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन) कानूनन दूषित हो गया।
11 प्राथमिकियों में नाम नहीं, सह-आरोपी के बयान पर कार्रवाई का आरोप
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि राज्य प्रशासन ने जिस आधार पर यह निवारक हिरासत लागू की है, उससे जुड़ी 11 में से किसी भी एफआईआर में पत्रकार सत्यम वर्मा का नाम दर्ज नहीं है। याचिका के अनुसार, पूरा हिरासत आदेश पुलिस हिरासत के दौरान मंगल नाम के एक सह-आरोपी व गवाह द्वारा दिए गए कथित बयान पर आधारित है।
‘कानून-व्यवस्था’ और ‘लोक-व्यवस्था’ के कानूनी अंतर पर दलील
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि यदि प्रशासन द्वारा जुटाए गए सभी साक्ष्यों को सही भी मान लिया जाए, तो भी यह मामला केवल न्यूनतम मजदूरी से जुड़ा एक स्थानीय स्तर का श्रम विवाद था।
दलील के मुताबिक, यह मामला सामान्य ‘कानून-व्यवस्था’ (लॉ एंड ऑर्डर) के दायरे में आता है, न कि व्यापक ‘लोक-व्यवस्था’ (पब्लिक ऑर्डर) के खतरे में। याचिका में आरोप लगाया गया कि मजदूरों की स्वतःस्फूर्त और वैध मांग को दबाने के लिए राज्य प्रशासन ने कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का अनुचित इस्तेमाल किया है।

