इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत में रखने के बाद की गई औपचारिक गिरफ्तारी या रिमांड आदेश से उस गैरकानूनी कार्रवाई को जायज नहीं ठहराया जा सकता। अमेरिकी न्यायशास्त्र के प्रसिद्ध सिद्धांत ‘फ्रूट ऑफ द पॉइजनस ट्री’ (जहरीले पेड़ का फल) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने प्रयागराज निवासी रवि चौरसिया को तुरंत रिहा करने का आदेश सुनाया है। इसके साथ ही अदालत ने पीड़ित को 30,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश भी दिया है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह आदेश रवि चौरसिया की मां द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। पीठ ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को शुरू में ही गैरकानूनी ढंग से बंधक बनाया गया हो, तो उसके बाद की गई गिरफ्तारी भले ही वैध आधारों पर क्यों न हो, वह और उससे जुड़ी रिमांड की समस्त न्यायिक कार्यवाही दूषित और अमान्य हो जाती है।
जहरीले पेड़ का फल’ सिद्धांत का हवाला
अपने 28 सितंबर के फैसले में हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि यह सिद्धांत गिरफ्तारी और हिरासत के मामलों पर भी समान रूप से लागू होता है। अदालत ने शुरुआती अवैध हिरासत की तुलना ‘जहरीले पेड़’ से की और उसके बाद पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों को उसका ‘फल’ बताया।
पीठ ने टिप्पणी की कि जब बाद में दिखाई गई गिरफ्तारी की जड़ में ही अवैध हिरासत मौजूद हो, तो वह गिरफ्तारी और मजिस्ट्रेट द्वारा मंजूर की गई रिमांड की कार्यवाही दोनों ही गैरकानूनी हो जाती हैं, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत नागरिक को मिले मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य’ मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन वाली गिरफ्तारी के बाद दिए गए रिमांड आदेश पूरी तरह अमान्य हो जाते हैं।
31 घंटे तक थाने में अवैध रूप से रखा, याचिका के बाद दिखाई गिरफ्तारी
याचिका के मुताबिक, सोरांव थाने की पुलिस 14 सितंबर को रवि चौरसिया को अयोध्या से पकड़कर प्रयागराज के सोरांव थाने लाई थी, लेकिन जनरल डायरी (जीडी) में उसकी हिरासत या आमद का कोई विवरण दर्ज नहीं किया गया। 15 सितंबर को रवि की मां थाने पहुंचीं और बेटे के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी न मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी।
हाईकोर्ट ने पाया कि 15 सितंबर को याचिका दाखिल होने की जानकारी मिलते ही पुलिस हरकत में आई और 16 सितंबर की सुबह 10:45 बजे जीडी में औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई। इसके बाद उसका मेडिकल कराकर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। अदालत ने पाया कि रवि को बिना किसी औपचारिक गिरफ्तारी और बिना मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए लगभग 31 घंटे तक थाने के लॉकअप में रखा गया, जो 24 घंटे के भीतर पेश करने की वैधानिक सीमा का खुला उल्लंघन था।
एसएचओ का बहाना खारिज, वकील से परामर्श के अधिकार पर स्पष्टीकरण
अदालत द्वारा तलब किए गए थाने के सीसीटीवी फुटेज और अधिकारियों के जवाबी हलफनामे से भी यह साबित हुआ कि रवि पुलिस के कब्जे में था। सोरांव के थानाध्यक्ष (एसएचओ) ने जीडी में प्रविष्टि न होने को अनजाने में हुई भूल बताया, जिसे अदालत ने सिरे से नकार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी तजुर्बेकार पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को थाने लाकर लॉकअप में डालने का रिकॉर्ड दर्ज करना नहीं भूल सकता।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 38 के उल्लंघन पर भी कड़ा रुख अपनाया। यह धारा जांच के दौरान आरोपी को अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने का अधिकार प्रदान करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस का यह वैधानिक दायित्व उसी क्षण शुरू हो जाता है जब किसी संदिग्ध को पूछताछ के लिए थाने लाया जाता है, भले ही उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न किया गया हो या उस पर औपचारिक आरोप तय न हुए हों।
कमिश्नर को जांच के आदेश और एसएचओ की सेवा पुस्तिका में प्रतिकूल प्रविष्टि
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि रवि चौरसिया किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। साथ ही प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया गया कि वे इस अवैध हिरासत के मामले की निष्पक्ष जांच कराएं, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करें और उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई अमल में लाएं।
पीठ ने सोरांव के थानाध्यक्ष के आचरण पर गंभीर असंतोष व्यक्त करते हुए आदेश दिया कि यदि विभागीय जांच में उनकी लापरवाही साबित होती है, तो अदालत की यह प्रतिकूल टिप्पणी उनकी सेवा पुस्तिका (सर्विस रिकॉर्ड) में दर्ज की जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस यदि चाहे तो कानूनी प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए रवि चौरसिया को दोबारा गिरफ्तार कर सकती है।

