पत्नी को ₹1.10 लाख मासिक अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार, पति पर ₹2 लाख लागत: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पत्नी को हर महीने ₹1.10 लाख अंतरिम भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली पति की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने इसे न्यायिक समय की बर्बादी बताते हुए पति पर ₹2 लाख की लागत भी लगाई।

जस्टिस ललिता कन्नेगंटी ने 22 सितंबर के आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट के आदेश को ठीक से पढ़े बिना यह तर्क दिया कि उसके बालिग बेटे को भी भरण-पोषण दिया गया है, जबकि आदेश में राशि केवल पत्नी के लिए तय की गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया वास्तविक कानूनी शिकायतों के समाधान के लिए है, न कि पक्षकारों के अहंकार की लड़ाई का माध्यम बनने के लिए। कोर्ट ने इस मुकदमेबाजी को “विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी” बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है।

फैमिली कोर्ट ने केवल पत्नी को दिया था भरण-पोषण

पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं और उनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हुई थी। उनका एक बेटा है। वैवाहिक मतभेदों के बाद दोनों अलग रहने लगे और पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की।

READ ALSO  बिलकिस सामूहिक बलात्कार मामला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, गुजरात से दोषियों को दी गई छूट से संबंधित रिकॉर्ड पेश करने को कहा

तलाक की कार्यवाही के दौरान पत्नी ने अपने और बेटे के लिए ₹1.45 लाख प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण तथा मुकदमे के खर्च के लिए ₹1 लाख की मांग की थी।

पत्नी का कहना था कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और रोजाना करीब 50 किलोमीटर यात्रा की परेशानी के कारण उसने प्रोस्थोडॉन्टिस्ट की नौकरी छोड़ दी थी। उसने बताया कि पेशेवर परामर्श से उसकी आय लगभग ₹35,000 प्रति माह है।

फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी के लिए ₹1.10 लाख प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च के तौर पर एकमुश्त ₹50,000 देने का आदेश दिया था।

इसी आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पति की आय के खुलासे पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

पत्नी की ओर से पेश अधिवक्ता सत्येन बजाज ने कहा कि पति एक प्रसिद्ध डॉक्टर है और उसके बेंगलुरु में दो क्लीनिक हैं। इसके अलावा गोवा, मालदीव और लंदन में भी उसका एक-एक क्लीनिक है। यह भी कहा गया कि पति के पिता ₹4 करोड़ के एक अपार्टमेंट में रहते हैं और उनके पास कई चल-अचल संपत्तियां हैं।

READ ALSO  विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण पर चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 11 नवंबर से सुनवाई करेगी सुप्रीम कोर्ट

दूसरी ओर, पति ने दलील दी कि पत्नी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल प्रोफेशनल है और उसके पास करीब 15 वर्षों का अनुभव है। इसलिए वह कम से कम ₹2 लाख प्रति माह कमा सकती है। उसने यह भी कहा कि वह पहले से पत्नी और बेटे की आर्थिक मदद कर रहा है।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि पति ने अपनी वास्तविक आय का पूरा खुलासा नहीं किया था और केवल इतना बताया था कि कटौतियों के बाद उसे ₹80,000 मिलते हैं।

कोर्ट ने कहा कि किसी पक्ष को अलग-अलग स्रोतों से होने वाली आय और खर्च का पूरा विवरण देना चाहिए, लेकिन पति ने अपनी संपत्तियों और देनदारियों से जुड़ी पूरी जानकारी पेश नहीं की।

हाईकोर्ट ने पति को आय और संपत्तियों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने या दबाने के खिलाफ चेतावनी भी दी। साथ ही फैमिली कोर्ट से कहा कि वह दोनों पक्षों के संपत्ति और देनदारी संबंधी बयानों की जांच कर उचित कार्रवाई करे।

पहले ₹1.03 लाख देने से भुगतान क्षमता स्पष्ट: कोर्ट

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि फैमिली कोर्ट का आदेश आने से पहले पति स्वयं पत्नी को ₹1.03 लाख दे रहा था।

READ ALSO  महाधिवक्ता के कार्यालय में विधि अधिकारी की नियुक्ति पर आरक्षण लागू नहीं होता क्योंकि यह सार्वजनिक रोजगार नहीं है: हाईकोर्ट

कोर्ट ने कहा कि इससे यह स्पष्ट है कि पत्नी खुद अपना भरण-पोषण करने की स्थिति में नहीं थी और पति भरण-पोषण देने में सक्षम था।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब पति पहले इतनी राशि दे चुका है तो अब वह यह तर्क नहीं दे सकता कि पत्नी पर्याप्त कमाई कर सकती है या वह खुद भरण-पोषण देने की स्थिति में नहीं है।

कोर्ट ने बेटे को भरण-पोषण दिए जाने संबंधी पति की दलील भी खारिज कर दी और कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में साफ तौर पर ₹1.10 लाख की राशि पत्नी के लिए तय की गई थी।

इन टिप्पणियों के साथ कर्नाटक हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी, पत्नी को ₹1.10 लाख प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार रखा और पति पर ₹2 लाख की लागत लगाई।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles