व्यापारिक विवाद में आपराधिक मुकदमा दबाव बनाने का औजार नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट ने रद्द किया केस

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक सप्लायर कंपनी और उसके शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि खराब सामान की आपूर्ति से जुड़े व्यावसायिक मतभेदों को कारोबारी दबाव बनाने के लिए आपराधिक मुकदमे में तब्दील नहीं किया जा सकता।

जस्टिस उदय कुमार ने 6 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि किसी अनुबंध के उल्लंघन में केवल धोखाधड़ी या अमानत में खयानत जैसी कानूनी धाराओं के नाम जोड़ देने भर से वह आपराधिक कृत्य नहीं बन जाता। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि बकाया वसूली या वाणिज्यिक दबाव बनाने के साधन के रूप में फौजदारी अदालतों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।

शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों को बिना ठोस भूमिका के समन नहीं

कंपनी प्रबंधन और निदेशकों की जवाबदेही पर विचार करते हुए जस्टिस कुमार ने कहा कि आपराधिक अदालतें कंपनी के निदेशकों या वरिष्ठ अधिकारियों को सिर्फ इसलिए तलब नहीं कर सकतीं क्योंकि वे किसी ऊंचे पद पर बैठे हैं। अदालत के अनुसार, किसी अधिकारी के खिलाफ सम्मन तभी जारी किया जा सकता है जब शिकायत में उनकी सीधी और व्यक्तिगत भागीदारी को दर्शाने वाले स्पष्ट, सटीक और असंदिग्ध आरोप मौजूद हों।

अदालत ने पाया कि निचली अदालत में दी गई शिकायत में कंपनी और उसके सभी अधिकारियों को बिना किसी विशिष्ट भूमिका के सामान्य रूप से एक साथ लपेट दिया गया था। व्यक्तिगत भूमिका तय न होने के कारण अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनन सही नहीं माना जा सकता।

READ ALSO  "Someone is complicit", says SC on Atiq Ahmad's killing, seeks status report from UP on 183 'police encounters'

दीवानी प्रकृति के विवाद को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता

पीठ ने उल्लेख किया कि दोनों पक्षों के बीच वर्ष 2017 से ऑटोमोबाइल पार्ट्स की आपूर्ति का एक नियमित व्यापारिक संबंध चल रहा था। जस्टिस कुमार ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच उपजा विवाद पूरी तरह उत्पाद की गुणवत्ता, वारंटी के तहत सामान बदलने और एक अग्रिम भुगतान के निपटारे तक ही सीमित था।

हाईकोर्ट ने कहा कि मूल शिकायत में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि आर्डर देते समय या अनुबंध की शुरुआत में आरोपी कंपनी की कोई दुर्भावनापूर्ण या धोखेबाजी की मंशा थी। जब शुरुआत में कपट का कोई इरादा न हो, तो यह मामला पूरी तरह से दीवानी (सिविल) प्रकृति का रहता है, न कि आपराधिक न्याय प्रणाली का।

क्या है कारोबारी विवाद की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला ऑटोमोबाइल एक्सेसरीज बेचने वाले एक व्यापारी की शिकायत से शुरू हुआ, जो 2015 से इस कारोबार में था। वर्ष 2017 में उसने आरोपी कंपनी को जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण और अन्य वाहन संबंधी उत्पाद आपूर्ति करने का आदेश दिया।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि वित्तीय वर्ष 2018-2019 के दौरान आपूर्ति किए गए कई उत्पाद खराब या व्यावसायिक रूप से अनुपयोगी निकले, जिसे लेकर ईमेल पर आपत्तियां दर्ज कराई गईं। शिकायत के अनुसार, नए सामान के लिए दिया गया 60,000 रुपये का अग्रिम भुगतान न तो पूरा किया गया और न ही लौटाया गया। इसके अलावा, 5.70 लाख रुपये मूल्य के एक अलग खेप के सामान की मरम्मत या उसे बदलने का काम भी कई ईमेल और फोन कॉल के बावजूद लंबित रहा।

READ ALSO  Delhi HC Directs Police Not To Wait For 24 Hours Before Initiating Investigations Into Complaints Of Missing Children

इसके बाद शिकायतकर्ता ने अलीपुर ट्रायल कोर्ट में धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई। पुलिस जांच की रिपोर्ट मिलने के बाद मजिस्ट्रेट ने धोखाधड़ी, अमानत में खयानत और आपराधिक धमकी के आरोपों का संज्ञान लेते हुए सप्लायर कंपनी और उसके अधिकारियों को समन जारी कर दिया। सम्मन जारी होने के बाद आरोपी पक्ष ने राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत में वकीलों की दलीलें

हाईकोर्ट में आरोपी कंपनी की ओर से पेश वकील सचिन तालुकदार ने दलील दी कि यह विवाद पूरी तरह से दीवानी है। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता आरोपी कंपनी की ओर से किसी भी बेईमानी या कपटपूर्ण इरादे को साबित नहीं कर सका है। इसके साथ ही शिकायत में आपराधिक धमकी से संबंधित कोई भी कानूनी तत्व मौजूद नहीं था, फिर भी निचली अदालत ने यांत्रिक तरीके से समन जारी कर दिया।

शिकायतकर्ता की ओर से वकील स्वर्णली साहा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामले की पूरी सुनवाई ट्रायल में होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि भुगतान लेने के बावजूद आपूर्ति नहीं की गई और खराब उत्पाद भेजे गए, जिससे शिकायतकर्ता को नुकसान हुआ (जिसका उल्लेख अदालती दस्तावेजों में 10.54 रुपये के रूप में दर्ज था)।

READ ALSO  Two men who stole shoes from shop in Haryana's Rewari get 7 years in prison

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला पूरी तरह से दीवानी श्रेणी का है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा जारी समन और पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles