सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिक्री कर (सेल्स टैक्स) कानून के तहत कर का दायित्व तय करने वाला ‘टैक्सेबल इवेंट’ वस्तु की सप्लाई (आपूर्ति) का कार्य है। इसलिए किसी भी उत्पाद का टैक्स क्लासिफिकेशन पूरी तरह से उस भौतिक रूप पर निर्भर करता है जिसमें उसे बेचा जाता है, न कि इस बात पर कि उपभोक्ता बाद में उसका अंतिम रूप से क्या इस्तेमाल करता है। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने मध्य प्रदेश वाणिज्यिक कर विभाग द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने माना कि कैडिला हेल्थ केयर लिमिटेड द्वारा निर्मित और बेचे जाने वाले उत्पाद “जीआरडी पाउडर” और “जीआरडी मिक्स” को “गैर-अल्कोहलिक पेय और बेवरेज” के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, बल्कि उन पर रेसिड्यूरी (अवशिष्ट) प्रविष्टि के तहत 8 प्रतिशत की दर से ही टैक्स लगेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका (डब्ल्यूपी संख्या 3020/2003 और 4633/2003) में 3 अगस्त 2011 को दिए गए आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने कैडिला हेल्थ केयर लिमिटेड के उत्पादों “जीआरडी पाउडर” और “जीआरडी मिक्स” को मध्य प्रदेश कमर्शियल टैक्स एक्ट, 1994 की अनुसूची दो के भाग सात की प्रविष्टि 1 (रेसिड्यूरी एंट्री) के तहत वर्गीकृत करने के निर्णय को सही ठहराया था। इसके तहत असेसमेंट वर्ष 1997-1998 के लिए 8 प्रतिशत की कर दर तय की गई थी।
वाणिज्यिक कर विभाग ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि इन उत्पादों को 1994 के कानून की अनुसूची दो के भाग चार की प्रविष्टि 20(ii) के तहत रखा जाना चाहिए। यह प्रविष्टि “सभी प्रकार के गैर-अल्कोहलिक पेय और बेवरेज, जिनमें सिरप, कॉर्डियल, डिस्टिल्ड जूस, अर्क और एसेंस शामिल हैं, जब वे सीलबंद या कैप्सूल या कॉर्क लगी बोतलों या जार में बेचे जाते हैं” से संबंधित है और इस पर 10 प्रतिशत की उच्च दर से कर लगता है।
अदालत ने एंट्री टैक्स एक्ट, 1976 के तहत भी वर्ष 1997-1998 की स्थिति का विश्लेषण किया और पाया कि उस दौरान तीन अलग-अलग चरण थे:
- 1 अप्रैल से 30 अप्रैल 1997 के बीच यह उत्पाद रेसिड्यूरी एंट्री के तहत 1 प्रतिशत कर के दायरे में आता था;
- मई से सितंबर 1997 के बीच कोई प्रासंगिक प्रविष्टि न होने के कारण यह एंट्री टैक्स के दायरे में नहीं था;
- 1 अक्टूबर 1997 से 31 मार्च 1998 के बीच अनुसूची दो की प्रविष्टि 14 (“सभी प्रकार के गैर-अल्कोहलिक पेय और बेवरेज, आइसक्रीम, कुल्फी और बर्फ की कैंडी” – 2%) और अनुसूची तीन की क्रम संख्या 1 (रेसिड्यूरी उत्पाद – 1%) के बीच प्रतिस्पर्धा थी।
अपीलकर्ताओं की दलीलें
वाणिज्यिक कर विभाग की ओर से पेश वकील अरकाज कुमार ने तर्क दिया कि टैक्स प्रविष्टियों की व्याख्या स्वाभाविक और व्यावहारिक तरीके से की जानी चाहिए, न कि अत्यधिक तकनीकी रूप में। उन्होंने कहा कि उत्पाद की पैकेजिंग पर साफ लिखा होता है कि दूध या पानी में मिलाकर “इस तैयारी का आनंद गर्म या ठंडा लें”, जो इसे खाद्य सामग्री के बजाय एक हेल्थ ड्रिंक के रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने यह भी दलील दी कि चाय और कॉफी पाउडर रूप में बेचे जाने के बावजूद हमेशा टैक्स के उद्देश्य से बेवरेज ही माने जाते हैं।
विभाग ने क्लासिफिकेशन के लिए तीन स्थापित परीक्षणों का हवाला दिया:
- ‘कॉमन यूज एंड फंक्शनल कैरेक्टर टेस्ट’, जिसके लिए अतुल ग्लास इंडस्ट्रीज (प्राइवेट) लिमिटेड बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज (1986) का हवाला दिया गया;
- ‘बेसिक नेचर ऑफ द गुड टेस्ट’, जिसके लिए इंडियन एल्युमिनियम केबल्स लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1985) पर भरोसा जताया गया;
- ‘पॉपुलर मीनिंग या कॉमन पार्लेंस टेस्ट’ (सामान्य बोलचाल का अर्थ)।
अपीलकर्ताओं ने पियोमा इंडस्ट्रीज बनाम स्टेट ऑफ केरल (2008) (जिसमें रसना पाउडर को हॉर्लिक्स, बूस्ट और बॉर्नविटा वाली श्रेणी में देखा गया था), हमदर्द (वक्फ) लैबोरेटरीज बनाम कमिश्नर, कमर्शियल टैक्स, यूपी (2026) (जिसमें कहा गया था कि ‘शामिल’ शब्द प्रविष्टि का दायरा विस्तृत करता है), और एस. सैमुअल एम.डी., हैरिसन्स मलयालम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2004) (जिसमें चाय को खाद्य पदार्थ न मानकर बेवरेज माना गया था) का भी हवाला दिया।
प्रतिवादियों की दलीलें
कैडिला हेल्थ केयर लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विवेक सरीन ने कहा कि 1994 के कानून की धारा 2(डी) और धारा 9 के तहत टैक्स केवल अनुसूची दो में स्पष्ट रूप से दर्ज वस्तुओं पर ही लगाया जा सकता है। किसी ऐसी वस्तु को, जिसका उल्लेख विशिष्ट रूप से नहीं है, जबरन किसी विशेष प्रविष्टि में शामिल करना कानून के दायरे को गैर-कानूनी ढंग से बढ़ाने जैसा होगा।
प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि प्रविष्टि 20(ii) में उत्पाद के उपयोग या इस्तेमाल के तरीके का कोई जिक्र नहीं है। उन्होंने डनलप इंडिया लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1976) का हवाला देते हुए कहा कि क्लासिफिकेशन के लिए किसी वस्तु का अंतिम इस्तेमाल पूरी तरह से अप्रासंगिक होता है। इसके अलावा, हमदर्द वक्फ लैबोरेटरीज बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज (1999) का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि बेवरेज पानी के अलावा ऐसे तरल पदार्थ होते हैं जिन्हें सीधे या पतला करके पिया जाता है। इसलिए किसी उत्पाद को पेय पदार्थ मानने के लिए बिक्री के समय उसका तरल रूप में होना आवश्यक है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने टैक्स विभाग की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि टैक्स कानूनों की व्याख्या सख्त रूप से की जानी चाहिए। अदालत ने मथुरा अग्रवाल बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश (1999) का स्मरण कराते हुए कहा कि विधायिका की मंशा कानून की स्पष्ट भाषा से ही समझी जानी चाहिए, उसमें अपनी तरफ से कोई शब्द जोड़ना या घटाना संभव नहीं है।
टैक्सेबल इवेंट और क्लासिफिकेशन के आधार पर कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, दिल्ली बनाम कैरियर एयरकॉन लिमिटेड (2006) का उल्लेख करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“टैक्सेबल इवेंट सप्लाई का कार्य है और टैक्स की देनदारी वस्तु के उसी रूप से तय होती है, जिस रूप में उसे बेचा जाता है।”
पीठ ने जोर देकर कहा कि टैक्स विभाग को यह देखना होता है कि बिक्री के समय क्या दिया गया, न कि यह कि ग्राहक बाद में उसका क्या करेगा:
“हालांकि, टैक्स अधिकारी बिक्री के समय वस्तु के रूप के आधार पर ही टैक्स लगाने के लिए बाध्य हैं। टैक्स अधिकारियों को यह देखना होगा कि वास्तव में क्या सप्लाई किया गया है, न कि यह कि वस्तु का ‘अंतिम इस्तेमाल’ क्या है।”
“लिहाजा, टैक्स की लागू दर तय करने वाला क्लासिफिकेशन बिक्री के समय वस्तु के रूप पर आधारित होना चाहिए, न कि इस बात पर कि उपभोक्ता बाद में उसका किस प्रकार इस्तेमाल करना चुनता है।”
अदालत ने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि प्रोटीन पाउडर को दूध या पानी में मिलाकर पिया जा सकता है, तो उसी पाउडर का इस्तेमाल भारतीय मिठाई बर्फी बनाने में भी हो सकता है, जिसे ठोस रूप में खाया जाता है।
प्रविष्टि 20(ii) की भाषा का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पाया कि ‘बेवरेज’ के साथ ‘सिरप, कॉर्डियल, डिस्टिल्ड जूस, अर्क और एसेंस’ जैसे शब्द लिखे गए हैं:
“इन सभी सूचीबद्ध वस्तुओं में एक समान सूत्र यह है कि वे तरल पदार्थ हैं, जिन्हें बोतलबंद किया जा सकता है, स्टोर किया जा सकता है और लिक्विड रूप में ही पिया या इस्तेमाल किया जा सकता है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रविष्टि में वस्तु के इस्तेमाल के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया गया है:
“नतीजतन, विधायिका ने वस्तुओं का क्लासिफिकेशन उनके अंतिम उपयोग के आधार पर नहीं, बल्कि उनके भौतिक गुण और रूप के आधार पर तय किया है। तदनुसार, इस अदालत का मानना है कि टैक्सेबल इवेंट यानी बिक्री के समय वस्तु की पहचान ही टैक्स कानून के तहत क्लासिफिकेशन के लिए निर्णायक कारक होनी चाहिए।”
टैक्स विभाग द्वारा कॉमन पार्लेंस या फंक्शनल टेस्ट के जरिए ‘एंड-यूज’ (अंतिम उपयोग) को जोड़ने की कोशिश को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस अदालत का मानना है कि जहां प्रविष्टि की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध हो—जैसा कि इन अपीलों में है—वहां स्पष्ट या अंतर्निहित वैधानिक मार्गदर्शन को दरकिनार करने या नजरअंदाज करने के लिए कॉमन पार्लेंस टेस्ट, फंक्शनल टेस्ट या बेसिक नेचर टेस्ट को लागू करके ‘एंड यूज’ की अवधारणा को शामिल नहीं किया जा सकता।”
कानूनी व्याख्या के सिद्धांत ‘इजूस्डम जेनेरिस’ (सजातीय नियम) को लागू करते हुए पीठ ने रेखांकित किया:
“इजूस्डम जेनेरिस का नियम यह मांग करता है कि किसी सामान्य शब्द की व्याख्या उसके साथ आने वाले विशिष्ट शब्दों के संदर्भ में की जाए। ‘बेवरेज’ शब्द को अपने साथ जुड़े इन शब्दों के वर्ग से ही अर्थ ग्रहण करना होगा और इसे अलग-थलग करके इस तरह नहीं समझा जा सकता कि इसमें बिल्कुल अलग प्रकृति या भौतिक रूप की वस्तुएं शामिल हो जाएं।”
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया:
“जो वस्तुएं किसी विशिष्ट प्रविष्टि के विवरण में फिट नहीं बैठती हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से रेसिड्यूरी प्रविष्टि के तहत ही आना चाहिए। सिर्फ अधिक टैक्स दर वसूलने के लिए उन्हें किसी अनुपयुक्त विशिष्ट प्रविष्टि में जबरन नहीं डाला जा सकता।”
अदालत ने विभाग द्वारा उद्धृत पूर्व निर्णयों को भी वर्तमान मामले से भिन्न बताया:
- पियोमा इंडस्ट्रीज मामले में प्रविष्टि 87 में एक वैधानिक स्पष्टीकरण जोड़ा गया था, जिसमें पेय बनाने वाले पाउडर, टैबलेट और कॉन्संट्रेट को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था; ऐसी कोई व्यवस्था वर्तमान मामले में नहीं थी।
- एस. सैमुअल एम.डी. मामले में केवल यह तय हुआ था कि चाय खाद्य सामग्री नहीं है; उसमें यह तय नहीं हुआ था कि चाय पत्ती या पाउडर अपने आप में बेवरेज है या नहीं।
- हमदर्द (वक्फ) लैबोरेटरीज (2026) का शरबत पहले से ही तरल रूप में मौजूद था, और ‘शामिल’ शब्द का यह अर्थ नहीं हो सकता कि वह हर प्रकार के भौतिक रूपों को अपने दायरे में ले ले।
कोर्ट का निर्णय
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि विवादित उत्पाद काउंटर पर पाउडर और बिस्कुट के रूप में बेचे जाते हैं:
“भले ही यह संभव है कि अंततः इन वस्तुओं का इस्तेमाल कोई पेय या ठोस खाद्य पदार्थ बनाने में किया जाए, लेकिन टैक्सेबल इवेंट के समय वे पाउडर के रूप में ही मौजूद रहती हैं। इसलिए, वे ‘बेवरेज’ शब्द के दायरे में नहीं आती हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने वाणिज्यिक कर विभाग की अपीलों को खारिज करते हुए इन उत्पादों को रेसिड्यूरी प्रविष्टि के अंतर्गत ही वर्गीकृत करने के फैसले को बरकरार रखा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: एडिशनल कमिश्नर कमर्शियल टैक्स एवं अन्य बनाम कैडिला हेल्थ केयर लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9788-9789/2013
पीठ: जस्टिस मनमोहन, जस्टिस अरुण पल्ली
निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर 2026

