सार्वजनिक खरीद और टेंडर कानून से जुड़े एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि टेंडर की अंतिम तिथि के बाद किसी डिबारमेंट (काली सूची या रोक) आदेश को स्थगित रखने का फैसला केवल भविष्यलक्षी प्रभाव रखता है और यह पिछली तारीख से बिडर की अयोग्यता को दूर नहीं कर सकता। कोर्ट ने लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (एलएंडटी) की रिट याचिका को खारिज करते हुए उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें जल जीवन मिशन, उत्तर प्रदेश द्वारा जारी डिबारमेंट आदेश के चलते जेवर एयरपोर्ट से गंगा एक्सप्रेसवे लिंक परियोजना के लिए एलएंडटी की तकनीकी बिड को गैर-प्रतिक्रियाशील घोषित कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यूपीडा ने 22 जून 2026 को जेवर एयरपोर्ट से गंगा एक्सप्रेसवे लिंक एक्सप्रेसवे (पैकेज-1) के निर्माण के लिए ई-टेंडर आमंत्रित किया था। यह परियोजना गौतमबुद्ध नगर के भाईपुर ब्राह्मण से बुलंदशहर के बिचौला तक ईपीसी आधार पर विकसित की जानी थी। शुद्धिपत्र के बाद बिड जमा करने की अंतिम तिथि 7 सितंबर 2026 तय की गई और 8 सितंबर 2026 को तकनीकी बिड खोली गईं। एलएंडटी ने अन्य ग्यारह कंपनियों के साथ अंतिम तिथि पर अपनी बिड जमा की।
टेंडर जमा करने से पहले, 13 अप्रैल 2026 को जल जीवन मिशन, उत्तर प्रदेश ने एलएंडटी को डिबार करने का आदेश पारित किया था, जो बिड जमा करने की अंतिम तिथि यानी 7 सितंबर 2026 को प्रभावी था। एलएंडटी ने अपनी टेंडर बिड में इस डिबारमेंट का खुलासा नहीं किया और केवल क्लॉज 2.2.2.10 के तहत एक घोषणा प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया था कि पिछले पांच वर्षों में निर्माण दोषों के कारण उसके किसी भी ढांचे या राजमार्ग में कोई विनाशकारी विफलता नहीं हुई है।
तकनीकी मूल्यांकन के दौरान सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर यूपीडा ने 18 सितंबर 2026 को पत्र जारी कर आरएफ़पी के क्लॉज 2.1.18 और 2.2.10 के तहत कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा। 22 सितंबर 2026 को दिए अपने जवाब में एलएंडटी ने पहली बार यह खुलासा किया कि उत्तर प्रदेश राज्य जल एवं स्वच्छता मिशन ने 14 सितंबर 2026 के आदेश द्वारा डिबारमेंट आदेश को आस्थगित रखा है। कंपनी ने यह भी स्वीकार किया कि मध्य प्रदेश राज्य ने भी 13 अगस्त 2026 को उसके खिलाफ एक अलग डिबारमेंट आदेश पारित किया था, जिसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ में चुनौती दी गई है।
यूपीडा की तकनीकी मूल्यांकन समिति ने 25 सितंबर 2026 को एलएंडटी की तकनीकी बिड को इस आधार पर खारिज कर दिया कि कंपनी जल जीवन मिशन, उत्तर प्रदेश द्वारा डिबार की गई थी। इसके बाद एलएंडटी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर रिजेक्शन ऑर्डर को रद्द करने और अपनी वित्तीय बिड को अन्य योग्य बिडर्स के साथ खोलने का निर्देश देने की मांग की।
दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें
एलएंडटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और वरिष्ठ अधिवक्ता जे.एन. माथुर ने बहस की, जिनका सहयोग अधिवक्ता महिमा पाहवा और अधिवक्ता प्रशांत कुमार सिंह ने किया। उन्होंने दलील दी कि आरएफ़पी का क्लॉज 2.2.2.10 विशेष रूप से ढांचागत विफलताओं से संबंधित है और यह क्लॉज 2.1.18 पर प्रभावी होता है। उन्होंने कहा कि टेंडर में डिबारमेंट को लेकर अलग से घोषणा करने की कोई स्पष्ट शर्त नहीं थी। वरिष्ठ वकीलों ने क्लॉज 1.2.2 का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि बिड 120 दिनों के लिए वैध थी, इसलिए पात्रता की जांच 25 सितंबर 2026 यानी तकनीकी मूल्यांकन अपलोड होने की तिथि पर की जानी चाहिए थी, जिस दिन तक जल जीवन मिशन के 14 सितंबर के आदेश से डिबारमेंट पहले ही टल चुका था।
एलएंडटी के वकीलों ने यह भी कहा कि अन्य बिडर्स को अपनी कमियां सुधारने का अवसर दिया गया, जबकि एलएंडटी को इससे वंचित रखा गया। इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एलएंडटी द्वारा कोट की गई दर सबसे कम बोली लगाने वाले (एल-1) बिडर से लगभग 252 करोड़ रुपये कम थी, जिससे सार्वजनिक खजाने को भारी नुकसान होगा। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने किंबरली क्लब प्राइवेट लिमिटेड बनाम कृषि मंडी, बंशीधर कंस्ट्रक्शन बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम मोंटे कार्लो लिमिटेड, यूपी जल संस्थान कर्मचारी संघ बनाम यूपी राज्य और एफसीआई बनाम कामधेनु कैटल फीड इंडस्ट्रीज जैसे फैसलों पर भरोसा जताया।
दूसरी तरफ, यूपीडा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने, जिनके साथ अधिवक्ता अभिनीत जायसवाल और अधिवक्ता शरद तिवारी उपस्थित थे, याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि क्लॉज 2.1.18 में साफ तौर पर यह प्रावधान है कि केंद्र या राज्य सरकार द्वारा प्रतिबंधित कोई भी कंपनी, जिसका प्रतिबंध बिड जमा करने की अंतिम तिथि पर लागू हो, भाग लेने के लिए पात्र नहीं होगी। पात्रता की गणना केवल और केवल 7 सितंबर 2026 (बिड ड्यू डेट) पर ही की जानी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि एलएंडटी ने डिबारमेंट की बात छिपाकर क्लॉज 4.3(बी) के तहत अनुचित आचरण किया और वह साफ हाथों से कोर्ट नहीं आई।
श्री मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि 14 सितंबर 2026 का स्थगन आदेश केवल आगे के लिए लागू हुआ और वह पूर्वव्यापी प्रभाव से 7 सितंबर की अयोग्यता को समाप्त नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों श्री चामुंडी मोपेड्स लिमिटेड बनाम चर्च ऑफ साउथ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन और नजमा खातून बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का हवाला देते हुए उन्होंने समझाया कि किसी आदेश को रद्द करने और उस पर रोक लगाने या टालने में कानूनी अंतर होता है। उन्होंने सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड बनाम एसएलएल-एसएमएल, टाटा मोटर्स लिमिटेड बनाम बेस्ट और पीएसईबी बनाम भाटिया इंटरनेशनल लिमिटेड का संदर्भ देते हुए कहा कि टेंडर की अनिवार्य शर्तों का कड़ाई से पालन होना चाहिए ताकि समान अवसर की निष्पक्षता बनी रहे।
उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता व अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रीतीश कुमार ने, अधिवक्ता राहुल कपूर के साथ, यूपीडा के रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यदि एलएंडटी के लिए नियमों में ढील दी जाती है तो यह उन कंपनियों के साथ भेदभाव होगा, जिन्होंने डिबारमेंट के कारण टेंडर में भाग नहीं लिया था। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के सीजेडीएआरसीएल लॉजिस्टिक्स लिमिटेड बनाम राइट्स लिमिटेड फैसले का हवाला देते हुए कहा कि टेंडर शर्तों से ऐसा विचलन स्वीकार्य नहीं है जो समान प्रतिस्पर्धा के स्तर को बिगाड़ता हो।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सरकारी अनुबंधों में न्यायिक समीक्षा के दायरे पर चर्चा करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों टाटा सेलुलर बनाम भारत संघ, जगदीश मंडल बनाम उड़ीसा राज्य, एफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम नागपुर मेट्रो और टाटा मोटर्स बनाम बेस्ट का उल्लेख किया। कोर्ट ने दोहराया कि रिट अदालत प्रशासनिक फैसलों में अपील की अदालत की तरह हस्तक्षेप नहीं करती, बल्कि केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया की निष्पक्षता और वैधता की जांच करती है। टेंडर जारी करने वाला प्राधिकरण अपने दस्तावेजों का अर्थ निकालने के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्णायक होता है, जब तक कि उसका निष्कर्ष पूरी तरह अतार्किक न हो।
आरएफ़पी के विभिन्न प्रावधानों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि क्लॉज 2.1.18 एक अनिवार्य पात्रता शर्त है:
“किसी वर्ग के व्यक्तियों को बिड जमा करने के लिए अयोग्य घोषित करने वाला क्लॉज स्वाभाविक रूप से पात्रता की एक अनिवार्य शर्त है।”
कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि क्लॉज 2.2.2.10 ने क्लॉज 2.1.18 का स्थान ले लिया। पीठ ने कहा कि दोनों क्लॉज पूरी तरह से अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। एक क्लॉज पिछले पांच वर्षों के तकनीकी निर्माण रिकॉर्ड की पड़ताल करता है, जबकि दूसरा क्लॉज टेंडर में भाग लेने के मूल अधिकार से जुड़ी एक अनिवार्य दहलीज शर्त है।
अदालत ने तकनीकी मूल्यांकन की तारीख को संदर्भ तिथि मानने के तर्क को भी नकार दिया। कोर्ट ने कहा कि क्लॉज 1.2.2 सिर्फ बिड के प्रस्ताव की वैधता अवधि तय करता है, न कि पात्रता जांचने की तारीख। पात्रता का आकलन हमेशा बिड जमा करने की नियत तिथि पर ही होता है, जैसा कि सेंट्रल कोलफील्ड्स और भाटिया इंटरनेशनल के मामलों में निर्धारित है।
14 सितंबर 2026 के स्थगन पत्र के कानूनी प्रभाव पर हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की:
“डिबारमेंट के आदेश को स्थगित या रोक पर रखने का आदेश केवल भविष्यलक्षी (प्रॉस्पेक्टिव) प्रभाव रखता है। यह डिबारमेंट को मिटाता नहीं है और न ही आदेश पारित होने से पहले की अवधि के लिए इसे अस्तित्वहीन बनाता है।”
श्री चामुंडी मोपेड्स मामले की नजीर देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी आदेश को रद्द करने से पुरानी स्थिति पूरी तरह बहाल हो जाती है, जबकि किसी आदेश पर रोक या स्थगन केवल उसके भविष्य के प्रभाव को रोकता है। अतः 7 सितंबर 2026 को एलएंडटी कानूनी और तथ्यात्मक रूप से एक प्रतिबंधित कंपनी थी।
पोद्दार स्टील कॉर्पोरेशन बनाम गणेश इंजीनियरिंग वर्क्स, पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत बोर्ड बनाम पटेल इंजीनियरिंग और बीएसएन जोशी एंड संस बनाम नायर कोल सर्विसेज का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अनिवार्य शर्तों में ढील नहीं दी जा सकती:
“यह बिड की किसी प्रक्रियात्मक खामी को सुधारना नहीं है, बल्कि बिडर की पात्रता में ही बदलाव करना है।”
पीठ ने माना कि यदि अंतिम तिथि के बाद हुए स्थगन के आधार पर किसी अयोग्य बिडर को शामिल किया गया, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और समान अवसर के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन होगा। इससे उन अन्य कंपनियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जिन्होंने नियम देखकर खुद को दूर रखा था।
252 करोड़ रुपये के मूल्य अंतर और सार्वजनिक धन की बचत के तर्क पर हाईकोर्ट ने दो टूक निर्णय दिया:
“किसी अयोग्य बिडर द्वारा कम कीमत कोट करना उसे विचार किए जाने का अधिकार नहीं देता। न ही अदालत कीमत के लाभ के नाम पर प्रतिवादियों को टेंडर की स्पष्ट पात्रता शर्त की अनदेखी करने का निर्देश दे सकती है।”
कंपनी के आचरण पर अदालत ने कहा कि यद्यपि वह एलएंडटी पर धोखाधड़ी का कोई निष्कर्ष नहीं दे रही है, लेकिन सवाल पूछे जाने तक डिबारमेंट की बात न बताना कंपनी के पक्ष में अनुच्छेद 226 के तहत विवेकाधीन राहत देने के आड़े आता है। इसके लिए कोर्ट ने रामजस फाउंडेशन, के.डी. शर्मा बनाम सेल, दलीप सिंह बनाम यूपी राज्य और अवतार सिंह बनाम भारत संघ का उल्लेख किया।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण के आधार पर निम्नलिखित प्रमुख कानूनी सिद्धांत तय किए:
- सरकारी डिबारमेंट लागू होने पर बिड दाखिल करने से रोकने वाली शर्त टेंडर की एक अनिवार्य और बुनियादी पात्रता शर्त है।
- पात्रता का आकलन कड़ाई से बिड की अंतिम तिथि के आधार पर ही किया जाना चाहिए। बाद में जारी हुआ कोई भी रोक या स्थगन आदेश केवल भविष्य के लिए लागू होता है और पिछली तारीख से पात्रता बहाल नहीं कर सकता।
- टेंडर प्राधिकरण के पास अंतिम तिथि बीत जाने के बाद ऐसी अनिवार्य शर्तों में छूट देने या संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है, और न ही अदालत ऐसा निर्देश दे सकती है।
- किसी अयोग्य प्रतिभागी द्वारा कम कीमत कोट करने मात्र से उसे बिड स्वीकार किए जाने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने पाया कि यूपीडा की तकनीकी मूल्यांकन समिति का निर्णय आरएफ़पी के नियमों के अनुरूप था और उसमें कोई मनमानापन, दुर्भावना या अतार्किकता नहीं थी। इसके साथ ही कोर्ट ने एलएंडटी की रिट याचिका खारिज कर दी। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्णय की टिप्पणियां केवल इसी याचिका तक सीमित हैं और इससे एलएंडटी द्वारा अन्य सक्षम मंचों या मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में डिबारमेंट आदेशों के खिलाफ चल रही चुनौतियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य
वाद संख्या: रिट – सी संख्या 10822 / 2026
पीठ: जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

