दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 में 23 अक्टूबर 2015 के संशोधन के जरिए जोड़ी गई धारा 12(5) और सातवीं अनुसूची के अयोग्यता संबंधी प्रावधानों को पिछली तारीख से लागू करके उससे पहले नियुक्त किए गए आर्बिट्रेटर की नियुक्ति को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। एक्ट की धारा 37 के तहत दायर अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस भारत पराशर की खंडपीठ ने निचली अदालत (जिला कोर्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डीएमआरसी) के एक सेवारत कर्मचारी को एकमात्र आर्बिट्रेटर बनाए जाने के आधार पर आर्बिट्रल अवार्ड को निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना कि जब यह विवाद आर्बिट्रेशन के लिए भेजा गया और आर्बिट्रेटर नियुक्त हुआ, तब लागू कानूनी ढांचे के तहत यह नियुक्ति पूरी तरह वैध थी।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला डीएमआरसी और मेसर्स पंकज एसोसिएट्स (प्रोपराइटरशिप फर्म, जिसका प्रतिनिधित्व अब कानूनी वारिस कर रहे हैं) के बीच हुए एक अनुबंध से जुड़ा है। ठेकेदार को तीन साल की अवधि के लिए 5,00,000 रुपये के मासिक लाइसेंस शुल्क पर द्वारका सेक्टर-21 और द्वारका सेक्टर-11 मेट्रो स्टेशनों पर पार्किंग स्थल संचालित करने का ठेका मिला था। डीएमआरसी ने 28 जून 2013 को स्वीकृति पत्र (लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस) जारी किया और 16 जुलाई 2013 को स्थलों का कब्जा सौंप दिया गया। हालांकि, द्वारका सेक्टर-21 में तय 6,965 वर्ग मीटर क्षेत्र के मुकाबले शुरुआत में केवल 3,652 वर्ग मीटर क्षेत्र ही सौंपा गया, क्योंकि बाकी हिस्से का विकास कार्य चल रहा था।
इसके बाद सौंपे गए क्षेत्र, पिछले ठेकेदार द्वारा पार्किंग शुल्क की वसूली और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। इस पर ठेकेदार ने 3 जून 2014 को समझौते के क्लॉज 45 को लागू करते हुए मामले को आर्बिट्रेशन में भेजने की मांग की। क्लॉज 45 के अनुसार, यदि सुलह (कॉन्सिलिएशन) से विवाद हल नहीं होता है, तो उसे डीएमआरसी द्वारा नामित एकमात्र आर्बिट्रेटर को भेजा जाएगा। इस क्लॉज में स्पष्ट रूप से यह शर्त भी शामिल थी कि यदि नामित आर्बिट्रेटर डीएमआरसी का कर्मचारी हो, तो इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी। साथ ही यह भी लिखा था कि कार्यवाही आर्बिट्रेशन एक्ट “में समय-समय पर किए गए संशोधनों, जिसमें संदर्भ (रेफरेंस) किए जाने के समय लागू प्रावधान शामिल हैं” के तहत संचालित होगी।
बकाया लाइसेंस शुल्क न चुकाने के कारण डीएमआरसी ने 31 जुलाई 2014 को लाइसेंस अनुबंध समाप्त कर दिया, जिसके बाद ठेकेदार ने पार्किंग स्थल का कब्जा सौंप दिया। इसके बाद 24 मार्च 2015 को डीएमआरसी ने अपने सीनियर एडिशनल जनरल मैनेजर/फाइनेंशियल, श्री आशु शर्मा को एकमात्र आर्बिट्रेटर नियुक्त किया। आर्बिट्रेटर ने 27 मई 2015 को पहली बैठक की और धारा 12(1) के तहत घोषणा पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका इस मामले में कोई व्यक्तिगत हित नहीं है और उनकी निष्पक्षता या स्वतंत्रता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।
जब यह आर्बिट्रेशन कार्यवाही लंबित थी, उसी दौरान 23 अक्टूबर 2015 को आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन (संशोधन) एक्ट, 2015 लागू हो गया, जिसके जरिए कानून में धारा 12(5) और सातवीं अनुसूची जोड़ी गई। बाद में 21 जुलाई 2017 को आर्बिट्रेटर ने अपना अवार्ड पारित किया, जिसमें ठेकेदार के 71,53,025 रुपये के दावों को खारिज कर दिया गया और डीएमआरसी के 40,15,831 रुपये के काउंटर-क्लेम को ब्याज सहित स्वीकार कर लिया गया।
ठेकेदार ने इस अवार्ड को धारा 34 के तहत जिला जज-04, पटियाला हाउस कोर्ट, नई दिल्ली के समक्ष चुनौती दी। 23 अक्टूबर 2024 को जिला जज ने अवार्ड को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि डीएमआरसी के सेवारत कर्मचारी की नियुक्ति धारा 12(5) का उल्लंघन है। इस आदेश के खिलाफ डीएमआरसी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
डीएमआरसी की ओर से दलील दी गई कि आर्बिट्रेशन की कार्यवाही 3 जून 2014 को नोटिस जारी होने के साथ ही शुरू हो गई थी और आर्बिट्रेटर की नियुक्ति 24 मार्च 2015 को हुई थी। ये दोनों ही तारीखें 23 अक्टूबर 2015 को संशोधन कानून लागू होने से पहले की हैं। 2015 संशोधन कानून की धारा 26 तथा सुप्रीम कोर्ट के एस.पी. सिंगला कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, बीसीसीआई बनाम कोच्चि क्रिकेट प्राइवेट लिमिटेड और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम परमार कंस्ट्रक्शन कंपनी जैसे फैसलों का हवाला देते हुए डीएमआरसी ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल के गठन की वैधता को नियुक्ति के समय लागू कानूनी ढांचे के आधार पर ही परखा जाना चाहिए। डीएमआरसी ने यह भी कहा कि अनुबंध में “समय-समय पर संशोधित” वाक्यांश का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि पक्षकार पहले से वैध रूप से हो चुकी नियुक्ति को पिछली तारीख से रद्द करने पर सहमत थे। डीएमआरसी ने अपने समर्थन में सेंट्रल ऑर्गनाइजेशन फॉर रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन (कोर) बनाम ईसीआई-स्पिक-एसएमओ-एमसीएमएल (जेवी), डी.वी. आनंद बनाम हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अवनीत सोनी बनाम कविता अग्रवाल के निर्णयों पर भी भरोसा जताया।
दूसरी तरफ, प्रतिवादी (ठेकेदार के कानूनी वारिसों) ने तर्क दिया कि आर्बिट्रेटर डीएमआरसी का सेवारत कर्मचारी था और डीएमआरसी द्वारा उसकी एकतरफा नियुक्ति की गई थी, जिससे वह कानूनन (डी ज्यूरे) कार्य करने के अयोग्य हो गया था। सुप्रीम कोर्ट के भद्रा इंटरनेशनल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम आर.के. पांडे के फैसलों का हवाला देते हुए प्रतिवादी ने कहा कि स्वतंत्रता और निष्पक्षता आर्बिट्रेशन के मूलभूत सिद्धांत हैं जो नियुक्ति के स्तर पर भी लागू होते हैं। इसके अलावा जगदीश चंद गुप्ता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, हैनसन एग्रो लिमिटेड बनाम गेल (इंडिया) लिमिटेड, एलोरा पेपर मिल्स लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ओम 360 डिग्रीज एडवर्टाइजिंग और विनीत दुजोदवाला बनाम फीनिक्स एआरसी प्राइवेट लिमिटेड का उल्लेख करते हुए दलील दी गई कि क्लॉज 45 में भविष्य के कानूनी संशोधनों को लागू करने की सहमति दी गई थी, इसलिए 2015 में जोड़ी गई धारा 12(5) इस मामले पर लागू होती है।
कानूनी स्थिति और हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने रेखांकित किया कि 2015 के संशोधन से पहले एक्ट की धारा 11(2) में पक्षकारों को आर्बिट्रेटर की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने की पूरी स्वायत्तता दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम राजा ट्रांसपोर्ट (पी) लिमिटेड फैसले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“नामित आर्बिट्रेटर का किसी एक पक्ष का कर्मचारी होना, अपने आप में उसके पक्षपातपूर्ण होने, आंशिक होने या उसकी स्वतंत्रता की कमी का अनुमान लगाने का आधार नहीं है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के तहत किसी कर्मचारी को आर्बिट्रेटर तभी अयोग्य माना जाता था जब वह सीधे तौर पर उस अनुबंध से जुड़ा हो या उस अधिकारी का सीधा अधीनस्थ हो जिसके निर्णय पर विवाद था, अथवा उसके खिलाफ वास्तविक पक्षपात साबित किया गया हो। इसके विपरीत, 2015 के संशोधन की धारा 12(5) ने एक वैधानिक अयोग्यता पैदा की:
“इस प्रकार, संशोधन ने निष्पक्षता के केवल मौजूदा मानक का विस्तार नहीं किया। इसने सातवीं अनुसूची में उल्लिखित संबंधों से एक विशिष्ट वैधानिक परिणाम, यानी आर्बिट्रेटर के रूप में कार्य करने की अयोग्यता को जोड़ दिया।”
सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों जैसे टीआरएफ लिमिटेड बनाम एनर्गो इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड, पर्किन्स ईस्टमैन आर्किटेक्ट्स डीपीसी बनाम एचएससीसी (इंडिया) लिमिटेड, वोएस्टालपाइन शिएनेन जीएमबीएच बनाम दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड और कोर पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ये सभी सिद्धांत 2015 के बाद के कानूनी ढांचे से निकले हैं। कोर मामले में संविधान पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल से संबंधित निष्कर्ष भविष्य की तारीख से लागू होंगे, ताकि पहले से पूरी हो चुकी या लंबित कार्यवाहियों को झटका न लगे। इसी प्रकार, भद्रा इंटरनेशनल का मामला 23 अक्टूबर 2015 के बाद शुरू हुए आर्बिट्रेशन से जुड़ा था, जहां धारा 12(5) सीधे लागू होती थी।
हाईकोर्ट ने 2015 संशोधन कानून की धारा 26 का विश्लेषण किया, जो यह स्पष्ट करती है कि 23 अक्टूबर 2015 से पहले शुरू हुई कार्यवाहियों पर संशोधन लागू नहीं होंगे, जब तक कि पक्षकार इसके विपरीत सहमत न हों। हैनसन एग्रो लिमिटेड बनाम गेल (इंडिया) लिमिटेड में निर्धारित तीन श्रेणियों का उल्लेख करते हुए अदालत ने क्लॉज 45 के शब्दों की जांच की, जिसमें लिखा था कि कार्यवाही कानून में “समय-समय पर किए गए संशोधनों, जिसमें संदर्भ के समय लागू प्रावधान शामिल हैं” से शासित होगी।
इस क्लॉज की समग्र व्याख्या करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“इसलिए क्लॉज 45 में प्रयुक्त दोनों अभिव्यक्तियों को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए। ‘समय-समय पर संशोधित’ शब्द यह दर्शाते हैं कि पक्षकारों का आशय अपने संविदात्मक संदर्भ को समझौते के निष्पादन की तारीख पर मौजूद कानून के पाठ तक ही स्थायी रूप से सीमित रखने का नहीं था। हालांकि, ‘संदर्भ के समय लागू प्रावधान’ का उल्लेख आर्बिट्रेशन पर लागू होने वाले प्रावधानों को निर्धारित करने के लिए एक विशिष्ट समय-सीमा तय करता है। इसलिए इस क्लॉज को एक ऐसे असीमित समझौते के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता कि कानून में होने वाला प्रत्येक आगामी संशोधन पहले से शुरू हो चुके आर्बिट्रेशन पर स्वतः लागू होगा।”
पीठ ने यह भी पाया कि 23 अक्टूबर 2015 के बाद पक्षकारों के बीच ऐसा कोई लिखित समझौता या आचरण सामने नहीं आया जिससे यह सिद्ध हो कि वे नए संशोधित कानून को अपनाने पर सहमत हुए थे। कोर्ट ने एलोरा पेपर मिल्स (जहां प्रभावी रूप से कार्यवाही शुरू ही नहीं हुई थी) और धर्म प्रतिष्ठानम बनाम मधोक कंस्ट्रक्शन (पी) लिमिटेड के मामलों को अलग बताते हुए कहा कि यहां नियुक्ति अनुबंध में तय प्रक्रिया के तहत ही हुई थी:
“धर्म प्रतिष्ठानम में एकतरफा नियुक्ति को इसलिए चुनौती दी गई थी क्योंकि संविदात्मक व्यवस्था उस तरीके को अधिकृत नहीं करती थी जिस तरह से आर्बिट्रेटर नियुक्त किया गया था। यहां एकमात्र आर्बिट्रेटर को नामित करने का अधिकार स्पष्ट रूप से अनुबंध में मौजूद है। परिणामस्वरूप, यह सिद्धांत कि पक्षकारों को सहमत प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, नियुक्ति को अमान्य नहीं करता, बल्कि उस प्रक्रिया के अनुरूप की गई नियुक्ति का समर्थन करता है।”
इसके अतिरिक्त, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि नियुक्त आर्बिट्रेटर ने अनुबंध के निष्पादन के दौरान विवाद को संभाला था, या वह उस अधिकारी का प्रत्यक्ष अधीनस्थ था जिसके फैसले को चुनौती दी गई थी, या उसने किसी पूर्वाग्रह से कार्य किया था।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 23 अक्टूबर 2015 से पहले वैध रूप से की गई आर्बिट्रेटर की नियुक्ति को निरस्त करने के लिए धारा 12(5) और सातवीं अनुसूची को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने कहा:
“विद्वान जिला जज, जिन्होंने इस आधार पर आगे बढ़कर निर्णय लिया कि एकमात्र आर्बिट्रेटर की नियुक्ति सातवीं अनुसूची के साथ पठित धारा 12(5) के तहत अस्वीकार्य हो गई थी, उन्होंने एक ऐसे आर्बिट्रेशन पर 2015 के बाद के वैधानिक ढांचे को लागू करने में त्रुटि की, जो 23.10.2015 से पहले शुरू हो चुका था और जिसमें आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का गठन भी उसी तारीख से पहले हो चुका था।”
इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने डीएमआरसी की अपील को स्वीकार कर लिया, जिला जज के 23 अक्टूबर 2024 के फैसले को रद्द कर दिया और आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के गठन के खिलाफ उठाई गई चुनौती को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम श्री पंकज (दिवंगत) कानूनी वारिसों के जरिए
वाद संख्या: एफएओ (कॉर्म) 23/2025 एवं सीएम अप्लीकेशन 4055/2025
पीठ: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस भारत पराशर
निर्णय की तिथि: 30 सितंबर 2026

