हाईकोर्ट की भौतिक स्थिति या बैठकों का स्थल आर्बिट्रेशन की न्यायिक ‘सीट’ तय नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट

आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 के तहत क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (टेरिटोरियल ज्यूरिसडिक्शन) के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए किसी स्थान पर मध्यस्थता कार्यवाही आयोजित होने या वहां स्थित हाईकोर्ट द्वारा मध्यस्थ नियुक्त किए जाने से वह स्थान आर्बिट्रेशन की न्यायिक ‘सीट’ (ज्यूरिडिकल सीट) नहीं बन जाता। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एमसीएल) द्वारा दायर धारा 34 की याचिका को समय-सीमा समाप्त होने और क्षेत्राधिकार न होने के आधार पर खारिज कर दिया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मामले को सुंदरगढ़ के जिला जज के समक्ष त्वरित निस्तारण के लिए बहाल कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 7 नवंबर 2012 को महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एमसीएल) द्वारा सुंदरगढ़ स्थित कुलदा ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (बसुंधरा गर्जनबहाल क्षेत्र) में भारी मशीनरी (एचईएमएम) किराए पर लेने और सामग्री के परिवहन कार्य के लिए जारी एक निविदा (टेंडर) से जुड़ा था। सफल बोलीदाता बनने के बाद मेसर्स जीएससीओ (गुरमीत सिंह एंड कंपनी) इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के साथ अनुबंध किया गया। दोनों पक्षों के बीच हुए इस अनुबंध में आर्बिट्रेशन से संबंधित कोई खंड (क्लॉज) शामिल नहीं था।

कार्य पूरा होने के बाद 3 जुलाई 2016 को कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया। हालांकि, विभिन्न दावों को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद उभर आए। इसके बाद ठेकेदार कंपनी जीएससीओ ने कटक स्थित उड़ीसा हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कीं। 25 मार्च 2019 को हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की आपसी सहमति दर्ज करते हुए अधिनियम की धारा 11(6) के तहत पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एम.एम. दास को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया। ठेकेदार कंपनी ने इस नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिकाओं के जरिए चुनौती दी, लेकिन अंततः वे याचिकाएं वापस ले ली गईं।

एकमात्र मध्यस्थ ने कटक में कार्यवाही संचालित की और 25 अक्टूबर 2021 को ठेकेदार कंपनी के पक्ष में फैसला (आर्बिट्रल अवॉर्ड) सुनाया। इस फैसले के खिलाफ एमसीएल ने 8 दिसंबर 2021 को सुंदरगढ़ की जिला अदालत में धारा 34 के तहत तीन आपत्तियां दायर कीं।

इसके जवाब में प्रतिवादी कंपनी ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के तहत अर्जी दाखिल कर दो प्राथमिक आधारों पर एमसीएल की याचिका खारिज करने की मांग की—पहला, याचिका धारा 34(3) के तहत निर्धारित समय-सीमा के बाद दायर की गई थी; और दूसरा, मध्यस्थता की कार्यवाही कटक में चलने के कारण सुंदरगढ़ जिला अदालत के पास इस पर सुनवाई का कोई क्षेत्राधिकार नहीं था।

READ ALSO  पोकर और रमी जुआ नहीं, कौशल के खेल हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

सुंदरगढ़ के जिला जज ने 6 मार्च 2024 को यह अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद कंपनी ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत उड़ीसा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने 20 जून 2025 को याचिका स्वीकार करते हुए एमसीएल की धारा 34 याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि चूंकि मध्यस्थ की नियुक्ति कटक स्थित हाईकोर्ट द्वारा की गई थी, इसलिए अधिनियम की धारा 42 के तहत कटक ही कानूनी सीट बन गया और याचिका समय-सीमा से भी बाहर थी। इस निर्णय के खिलाफ एमसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में एमसीएल की ओर से पेश हुए भारत के अटॉर्नी जनरल ने स्पष्ट किया कि 25 अक्टूबर 2021 के मध्यस्थता फैसले के खिलाफ धारा 34 की आपत्ति याचिकाएं 8 दिसंबर 2021 को ही दाखिल कर दी गई थीं, जो कि तीन महीने की वैधानिक मियाद के भीतर थीं। इस बिंदु पर प्रतिवादी कंपनी के वरिष्ठ अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि समय-सीमा को लेकर हाईकोर्ट का निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण था।

क्षेत्राधिकार के प्रश्न पर अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि विवाद का कारण पूरी तरह सुंदरगढ़ में उत्पन्न हुआ था, जहां अनुबंध का कार्य निष्पादित किया गया था। उन्होंने सामान्य निविदा शर्तों के क्लॉज 12 और ई-टेंडर नोटिस के क्लॉज 40 का उल्लेख किया, जिनमें स्पष्ट प्रावधान था कि विवाद उसी अदालत के क्षेत्राधिकार में आएंगे जहां कार्य किया गया है। इसके अलावा, ओडिशा सरकार के विधि विभाग के 13 नवंबर 2020 के परिपत्र के अनुसार सुंदरगढ़ के लिए कोई अलग वाणिज्यिक अदालत (कमर्शियल कोर्ट) अधिसूचित नहीं थी, जिससे सुंदरगढ़ के जिला जज ही धारा 2(1)(ई) के तहत सक्षम प्राधिकारी थे। एमसीएल ने स्पष्ट किया कि कटक में कार्यवाही केवल मध्यस्थ की सुविधा के लिए की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले समय-सीमा के मुद्दे को हल किया और माना कि रिकॉर्ड से यह साफ है कि याचिकाएं तीन महीने की वैधानिक सीमा के भीतर दाखिल की गई थीं, इसलिए हाईकोर्ट का फैसला तथ्यों के विपरीत था।

READ ALSO  रिश्वत कांड में सीबीआई ने उत्तर रेलवे के डिप्टी चीफ इंजीनियर को हिरासत में लिया

इसके बाद पीठ ने आर्बिट्रेशन के ‘सीट’ और ‘वेन्यू’ के बीच के मूलभूत अंतर को रेखांकित किया। पीठ ने टिप्पणी की:

“आर्बिट्रेशन की ‘सीट’ और ‘वेन्यू’ के बीच अंतर होता है। जहां ‘सीट’ आर्बिट्रेशन कार्यवाही पर सुपरवाइजरी क्षेत्राधिकार रखने वाली अदालतों को तय करती है, वहीं ‘वेन्यू’ केवल उस भौतिक स्थान को दर्शाता है जहां बैठकें आयोजित की जाती हैं। कटक को सीट के रूप में स्पष्ट रूप से नामित न किए जाने की स्थिति में, हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन के वेन्यू को ही सीट मानकर स्पष्ट रूप से गलती की है।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि मध्यस्थ नियुक्त करने वाले 25 मार्च 2019 के आदेश में किसी सीट या वेन्यू का कोई उल्लेख नहीं था, न ही पक्षों के बीच कटक को सीट बनाने को लेकर कोई सहमति बनी थी। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत एल्यूमिनियम कंपनी बनाम कैसर एल्यूमिनियम टेक्निकल सर्विसेज इंक (बाल्को), इंडस मोबाइल डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम डेटाविंड इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड और बीजीएस एसजीएस सोमा जेवी बनाम एनएचपीसी लिमिटेड के फैसलों का सहारा प्रतिवादी नहीं ले सकता, क्योंकि यहां किसी भी सीट का पूर्व निर्धारण नहीं हुआ था।

हाईकोर्ट द्वारा धारा 11 के आधार पर क्षेत्राधिकार कटक को दिए जाने के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने कहा:

READ ALSO  नाबालिग भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर सकता है: मद्रास हाईकोर्ट

“केवल इसलिए कि हाईकोर्ट की मुख्य पीठ कटक में स्थित है, कटक की जिला या वाणिज्यिक अदालतों को क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं हो जाएगा। हाईकोर्ट ने अपने क्षेत्राधिकार को केवल उसी जिले तक सीमित मानकर स्पष्ट भूल की है, जहां हाईकोर्ट भौतिक रूप से स्थित है, यानी कटक।”

राज्य के भीतर अदालती क्षेत्राधिकार के व्यापक दायरे को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा:

“किसी राज्य का हाईकोर्ट पूरे राज्य पर क्षेत्राधिकार रखता है और इस प्रकार हाईकोर्ट के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर आने वाली सभी वाणिज्यिक अदालतें या जिला अदालतें (जहां कोई वाणिज्यिक अदालत स्थापित नहीं की गई है) को अधिनियम की धारा 34 के तहत याचिका पर सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार होगा, जब तक कि पक्षों के बीच इसके विपरीत कोई समझौता न हो या नियुक्ति आदेश अथवा अदालत के किसी निर्देश में ‘सीट’ का कोई विशिष्ट निर्धारण न किया गया हो।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 20 जून 2025 के आदेश को अमान्य ठहराते हुए अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने एमसीएल द्वारा दायर धारा 34 याचिकाओं को सुंदरगढ़ के जिला जज के समक्ष पुनर्स्थापित करने का निर्देश दिया और कहा कि जिला जज कानून के अनुसार इस मामले का त्वरित निस्तारण करें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड एवं अन्य बनाम मेसर्स जीएससीओ इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 की विशेष अनुमति याचिका सिविल संख्या 21375 वर्ष 2025 

पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा 

निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles