आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ मानकर जारी किए गए प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) आदेश में ऐसे किसी अपराध को आधार बनाया जाता है जो वैधानिक परिभाषा के दायरे में नहीं आता, तो पूरा डिटेंशन आदेश अमान्य हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि नजरबंदी के आदेश को दूषित करने के लिए केवल एक अप्रासंगिक या अनुचित आधार ही पर्याप्त है। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने इस मामले में रिट याचिका को स्वीकार करते हुए नजरबंदी आदेश और उसके बाद जारी पुष्टि आदेश को रद्द कर दिया तथा बंदी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता रेगुल्ला रमना ने अपने पुत्र और बंदी रेगुल्ला कार्तिक की रिहाई के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 20 नवंबर 2025 को ‘आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूट-लेगर्स, डकैत्स, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडास, इमोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड-ग्रैबर्स एक्ट, 1986’ (1986 का अधिनियम) की धारा 3(1) व 3(2) सहपठित धारा 2(जी) के तहत पारित प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश तथा 19 जनवरी 2026 के पुष्टि आदेश को चुनौती दी गई थी।
सक्षम प्राधिकारी ने बंदी के खिलाफ दर्ज छह आपराधिक मामलों को आधार बनाते हुए यह नजरबंदी आदेश जारी किया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वकील श्री कादियाम नीलकंठेश्वर राव ने दलील दी कि जिन छह आधारों पर यह आदेश आधारित है, उनमें से आधार संख्या 3 में दर्ज अपराध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के अध्याय 16, 17 या 22 के तहत दंडनीय नहीं है। इसलिए, आधार संख्या 3 के संबंध में बंदी को 1986 के अधिनियम की धारा 2(जी) के तहत ‘गुंडा’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
याचिकाकर्ता के वकील ने आगे कहा कि भले ही आधार संख्या 1, 2 और 4 से 6 के अपराध अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत आते हों, लेकिन आधार संख्या 3 जैसी अप्रासंगिक सामग्री पर विचार करने से नजरबंदी प्राधिकारी की संतुष्टि दूषित हो गई है। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने एम. हेमलता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (रिट याचिका संख्या 21828/2025) के निर्णय पर भरोसा जताया।
दूसरी तरफ, प्रतिवादियों की ओर से पेश सहायक सरकारी वकील श्री अकुला वेंकट साई जगदीश ने तर्क दिया कि इस डिटेंशन आदेश को शेष आधारों (आधार संख्या 1, 2 और 4 से 6) के बल पर बरकरार रखा जा सकता है। हालांकि, वे इस तथ्य से इनकार नहीं कर सके कि आधार संख्या 3 में उल्लिखित आपराधिक मामला आईपीसी के अध्याय 16, 17 या 22 के अंतर्गत नहीं आता है।
कोर्ट का विश्लेषण और प्रमुख टिप्पणियां
मामले के तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करते हुए खंडपीठ ने 1986 के अधिनियम की धारा 2(जी) का उल्लेख किया, जिसमें ‘गुंडा’ को परिभाषित किया गया है:
“2(जी) ‘गुंडा’ का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है, जो या तो स्वयं या किसी गिरोह के सदस्य या नेता के रूप में, भारतीय दंड संहिता के अध्याय 16, 17 या अध्याय 22 के तहत दंडनीय अपराधों को आदतन करता है, करने का प्रयास करता है या दुष्प्रेरित करता है।”
कोर्ट ने पाया कि आधार संख्या 3 के तहत दर्ज अपराध नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (एनडीपीएस) एक्ट से संबंधित था। चूंकि यह अपराध आईपीसी के अध्याय 16, 17 या 22 के अंतर्गत नहीं आता, इसलिए आधार संख्या 3 के आधार पर बंदी को 1986 के अधिनियम की धारा 2(जी) के तहत ‘गुंडा’ नहीं माना जा सकता।
पीठ ने एम. हेमलता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के फैसले को दोहराया, जिसमें समन्वय पीठ ने माना था कि यदि किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ मानकर नजरबंद किया जाता है और उसमें आबकारी कानून (एपी एक्साइज एक्ट) जैसे अन्य अपराध को भी शामिल कर लिया जाता है, तो यह अप्रासंगिक सामग्री पर विचार करना माना जाएगा और इससे नजरबंदी आदेश अमान्य हो जाएगा। कोर्ट ने उस निर्णय के महत्वपूर्ण अंशों को उद्धृत किया:
“7. यह स्वीकार्य तथ्य है कि डिटेनिंग अथॉरिटी ने बंदी को ‘गुंडा’ मानते हुए प्रिवेंटिव डिटेंशन का विवादित आदेश पारित किया है। अधिनियम की धारा 2(जी) के तहत गुंडा को परिभाषित किया गया है। केवल तभी किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ कहा जा सकता है, जब वह इस धारा में उल्लिखित भारतीय दंड संहिता के अध्यायों के तहत दंडनीय अपराध बार-बार करता पाया जाए। यदि कोई व्यक्ति एपी एक्साइज एक्ट के तहत दंडनीय अपराध करता पाया जाता है, तो वह धारा 2(जी) के तहत ‘गुंडा’ की परिभाषा में नहीं आएगा। यदि किसी व्यक्ति ने एपी एक्साइज एक्ट के तहत अपराध किया है, तो उसे अधिनियम के तहत ‘बूटलेगर’ माना जाता है। कानून पूरी तरह स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता के अपराधों के आधार पर ‘गुंडा’ मानकर नजरबंदी आदेश जारी करते समय यदि उसके द्वारा एपी एक्साइज एक्ट के तहत किए गए अपराध को भी आधार बनाया जाता है, तो यह अप्रासंगिक सामग्री को ध्यान में रखना माना जाएगा। इससे प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश अवैध हो जाता है और विवादित आदेश इसी आधार पर दूषित होकर निरस्त किए जाने योग्य है।”
उस फैसले में एस. प्रसाद रेड्डी बनाम कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, अनंतपुर {2005(3) ALT 487}, थल्लापुनेनी वेंकटेश्वरलू बनाम कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, कडप्पा {2004 (5) ALT 250} और सुप्रीम कोर्ट के फैसले खाजा बिलाल अहमद बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य {(2020) 13 SCC 632} का भी हवाला दिया गया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि सक्षम प्राधिकारी का समाधान अप्रासंगिक और अवैध आधारों पर टिका नहीं हो सकता।
इन कानूनी नज़ीरों को लागू करते हुए जस्टिस तिलहारी ने कहा:
“कानून सुस्थापित है कि यदि किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ मानकर 1986 के अधिनियम के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश पारित किया गया है और उसके द्वारा किए गए किसी ऐसे अन्य अपराध को भी आधार बनाया गया है जो अधिनियम की धारा 2(जी) के तहत नहीं आता, तो ऐसा प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश अवैध होगा।”
सरकारी वकील की इस दलील को कोर्ट ने खारिज कर दिया कि शेष वैध आधारों पर आदेश को बनाए रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले शिव प्रसाद भटनागर बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (1981) 2 SCC 456 का हवाला देते हुए खंडपीठ ने रेखांकित किया:
“एक ही दूषित आधार डिटेंशन आदेश को अमान्य करने के लिए पर्याप्त है।”
हाईकोर्ट ने 1986 के अधिनियम की तुलना पीआईटीएनडीपीएस (PITNDPS) कानून से करते हुए टिप्पणी की:
“1986 के अधिनियम में पीआईटीएनडीपीएस एक्ट की धारा 6 जैसा कोई प्रावधान नहीं है, जो स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था देता है कि यदि नजरबंदी आदेश दो या दो से अधिक आधारों पर दिया गया है, तो कुछ आधारों के निरस्त होने पर भी आदेश वैध रहेगा। यह व्यवस्था वर्तमान मामले पर लागू नहीं होती। 1986 के अधिनियम के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को रद्द करने के लिए एक ही दूषित आधार पर्याप्त है।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि नजरबंदी आदेश अप्रासंगिक सामग्री पर विचार करने के दोष से ग्रसित है। इस आधार पर कोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 20 नवंबर 2025 के डिटेंशन आदेश और 19 जनवरी 2026 के पुष्टि आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि बंदी किसी अन्य लंबित मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रेगुल्ला रमना बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 10656/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर
निर्णय की तिथि: 09.09.2026

