सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कावेरी नदी जल बंटवारे को लेकर दायर एक नई याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच का अंतरराज्यीय विवाद है, जिस पर दोनों राज्य सरकारें पहले से ही अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यदि दो राज्यों के बीच पहले से चल रहे विवाद में सोसायटियों की याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी गई, तो ऐसे मुकदमों का कभी कोई अंत नहीं होगा। खारिज की गई याचिका में कई अन्य मांगों के साथ-साथ तमिलनाडु के कोटे से 70 टीएमसी (TMC) कावेरी जल कर्नाटक को दोबारा आवंटित करने की गुहार लगाई गई थी।
कर्नाटक का अनुपालन और नियामक निर्देश
पानी छोड़ने को लेकर दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच जारी कानूनी कार्यवाही के दौरान कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसने 31 अगस्त तक तमिलनाडु के हिस्से का अतिरिक्त पानी छोड़ दिया है। कर्नाटक ने यह भी कहा कि वह 9,000 क्यूसेक पानी का प्रवाह बनाए रखने के कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) के निर्देश का पूरी तरह पालन कर रहा है।
इससे पहले 25 अगस्त को सीडब्ल्यूएमए ने कावेरी जल नियमन समिति (सीडब्ल्यूआरसी) की उस सिफारिश को बरकरार रखा था, जिसमें कर्नाटक को 15 दिनों तक तमिलनाडु के लिए 9,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया था। वहीं, 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्नाटक को सीडब्ल्यूएमए के निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया था।
पानी की कमी और तमिलनाडु का दावा
दूसरी तरफ, तमिलनाडु सरकार ने कम बारिश वाले वर्ष में अपने हिस्से का पानी न मिलने पर लगातार असंतोष जताया है। जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार ने 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट का रुख कर कर्नाटक को तत्काल पानी छोड़ने का निर्देश देने की मांग की थी।
तमिलनाडु ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि सीडब्ल्यूआरसी द्वारा तय किया गया कोटा और कर्नाटक की ओर से वास्तव में छोड़ा गया पानी, दोनों ही राज्य की वास्तविक आवश्यकता से बेहद कम हैं। इसके अलावा, तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी सूचित किया कि उसने पानी के बकाए (बैकलॉग) का मुद्दा नियामक प्राधिकरण के समक्ष औपचारिक रूप से उठाया था, लेकिन उस पर कोई निर्देश जारी नहीं किया गया।

