इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखने वाली और समलैंगिक लिव-इन रिश्ते में रह रहीं दो बालिग महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति से साथ रह रहे दो बालिग नागरिकों को शांतिपूर्ण जीवन जीने का पूरा अधिकार है और उनके इस फैसले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि यदि कोई भी व्यक्ति उनके जीवन या स्वतंत्रता पर खतरा पैदा करता है या उनके शांतिपूर्ण जीवन में दखल देता है, तो उन्हें तुरंत पुलिस सुरक्षा दी जाए।
जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी की एकलपीठ ने दोनों महिलाओं द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 14 सितंबर को यह फैसला सुनाया। याचिका में दोनों महिलाओं ने बताया था कि वे बालिग और अविवाहित हैं तथा अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य लोग उनके इस रिश्ते से नाखुश हैं और उन्हें लगातार धमकियां देकर प्रताड़ित कर रहे हैं। इससे पहले 10 सितंबर को अदालत ने दोनों युवतियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया था, जिसके अनुपालन में दोनों अदालत के समक्ष पेश हुईं।
अनुच्छेद 21 के तहत बालिगों की स्वतंत्रता और गरिमा सुरक्षित
याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने कहा, “याचिकाकर्ताओं को अनुच्छेद 21 के तहत पूर्ण सुरक्षा प्राप्त है। याचिकाकर्ता बालिग हैं, समलैंगिक हैं, शिक्षित हैं और अपना भला-बुरा अच्छी तरह समझने में पूरी तरह सक्षम हैं। उन्होंने पूरी सोच-विचार के बाद साथ रहने का निर्णय लिया है और उन पर किसी भी प्रकार का बल प्रयोग या दबाव नहीं डाला गया है। इसलिए किसी को भी याचिकाकर्ताओं के लिव-इन रिश्ते में साथ रहने का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है, और इस अदालत को उन्हें सुरक्षा प्रदान करने से इनकार करने का कोई कारण नजर नहीं आता। यह याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है।”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि दोनों महिलाएं बालिग हैं। अपनी उम्र प्रमाणित करने के लिए उन्होंने अदालत में अपनी हाईस्कूल की अंकतालिकाएं (मार्कशीट) पेश कीं। वकील ने तर्क दिया कि अपनी पसंद के साथी के साथ रहना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
पारंपरिक मान्यताओं और सामाजिक स्वीकार्यता पर सरकार की दलील
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि यद्यपि किसी व्यक्ति द्वारा जीवनसाथी चुनने का अधिकार अनुच्छेद 21 के दायरे में आता है, लेकिन ऐसे रिश्तों को कानूनी या विधायी मान्यता मिलना अपने आप में कोई मौलिक अधिकार नहीं है। सरकारी पक्ष ने समलैंगिक संबंधों को लेकर समाज में व्यापक स्वीकार्यता की कमी तथा विवाह व परिवार से जुड़ी पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं का भी हवाला दिया।
अदालत ने व्यक्तिगत रूप से की बातचीत, स्वेच्छा से लिया गया फैसला
हाईकोर्ट ने केवल वकीलों की दलीलों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय दोनों महिलाओं से सीधे बातचीत की। व्यक्तिगत साक्षात्कार और जांच के बाद अदालत ने दर्ज किया कि दोनों महिलाएं बालिग हैं, अपना हित-अहित समझने में सक्षम हैं और उन्होंने बिना किसी दबाव, डर या अनुचित प्रभाव के स्वतंत्र सहमति से यह कदम उठाया है। दोनों ने अदालत को बताया कि वे समलैंगिक रिश्ते में हैं और आगे भी साथ रहना चाहती हैं। इसके अलावा दोनों महिलाओं ने लिखित बयान प्रस्तुत कर पुष्टि की कि वे अपनी मर्जी से साथ रह रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के नज़ीरों का उल्लेख
हाईकोर्ट ने इस मामले में समलैंगिक और एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+) समुदाय के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का संज्ञान लिया। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लेख किया जिसमें सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) को स्वतंत्रता, गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का अनिवार्य अंग माना गया था।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उस बाद के फैसले पर भी विचार किया जिसमें कहा गया था कि जब तक कानून या रीति-रिवाज द्वारा मान्यता न दी गई हो, तब तक विवाह का कोई अनियंत्रित मौलिक अधिकार नहीं बनता और विवाह या सिविल यूनियन जैसी कानूनी मान्यता केवल विधायिका द्वारा कानून बनाकर ही दी जा सकती है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट माना है कि समलैंगिक जोड़ों को निजता, पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर संबंध बनाने का पूरा संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समलैंगिक विवाह को वैधानिक मान्यता न होने का यह कतई मतलब नहीं है कि आपसी सहमति से साथ रहने वाले दो बालिगों को संविधान प्रदत्त सुरक्षा से वंचित कर दिया जाए। ऐसे रिश्ते अनुच्छेद 21 के तहत निजता, विकल्प और व्यक्तिगत स्वायत्तता के अंतर्गत पूरी तरह संरक्षित हैं।
पुलिस कमिश्नर और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा उत्पन्न होती है, तो वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति लेकर संबंधित पुलिस कमिश्नर, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) या पुलिस अधीक्षक (एसपी) से संपर्क कर सकती हैं। संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे दोनों महिलाओं के बालिग होने और स्वेच्छा से साथ रहने की पुष्टि करने के बाद उन्हें तत्काल आवश्यक सुरक्षा मुहैया कराएं।

