झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी का अपने पति से ‘घरजमाई’ बनकर रहने की इच्छा जताना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैवाहिक क्रूरता के दायरे में नहीं आता। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के फैसले को सही ठहराते हुए एक पति की तलाक की अपील खारिज कर दी।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की बेंच ने 15 सितंबर को यह फैसला सुनाया। बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी पुरुष पर ससुराल में स्थायी रूप से रहने का दबाव बनाना शादी तोड़ने का वैध कानूनी आधार नहीं हो सकता।
वैवाहिक क्रूरता का कानूनी पैमाना
हाईकोर्ट ने वैवाहिक कानून के तहत क्रूरता की व्याख्या करते हुए कहा कि इसके लिए किसी एक पक्ष का आचरण इतना गंभीर और असहनीय होना चाहिए कि दोनों का एक साथ रहना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाए। जजों ने रेखांकित किया कि यह वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मनमुटाव, आपसी खींचतान या रोजमर्रा की खटपट से कहीं अधिक गंभीर होना चाहिए।
अदालत ने यह भी साफ किया कि शादी के बाद मायके जाना हर दुल्हन का बुनियादी अधिकार है। पत्नी के मायके जाने को पति के प्रति किसी भी तरह का उत्पीड़न या क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कई शादियों में अगर कोई चाहे तो शिकायतों के दर्जनों कारण ढूंढ सकता है, लेकिन ये शिकायतें मुख्य रूप से स्वभावगत तालमेल की कमी से पैदा होती हैं। ऐसा मनमुटाव तलाक का आधार नहीं बन सकता।
पति ने लगाया था दबाव और सामाजिक अपमान का आरोप
यह मामला पति द्वारा दायर तलाक की अर्जी से जुड़ा था। पति का दावा था कि शादी के शुरुआती दिन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन जब पत्नी ने लगातार मायके जाना शुरू किया तो दोनों में दूरियां आ गईं। उसने आरोप लगाया कि ससुराल वाले उस पर अपने बुजुर्ग माता-पिता को छोड़ने और उनके साथ स्थायी रूप से रहने का दबाव बना रहे थे।
पति का कहना था कि वह अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाला अकेला सहारा है, इसलिए उसने घरजमाई बनने से इनकार कर दिया। उसने दलील दी कि इस इनकार के बाद उसे भारी मानसिक दबाव और सामाजिक बदनामी का सामना करना पड़ा, जिसके चलते उसने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की।
पत्नी का रुख: प्रताड़ना के बावजूद रिश्ता बनाए रखने की इच्छा
दूसरी ओर, पत्नी ने पति के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उसने अदालत के सामने आरोप लगाया कि उसे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
पत्नी ने कहा कि आने वाले दिनों में वैवाहिक जीवन सुखमय और शांतिपूर्ण रहेगा, इसी उम्मीद में उसने सब कुछ चुपचाप सहन किया। उसने साफ किया कि वह अपने वैवाहिक रिश्ते को खत्म नहीं करना चाहती और पति के साथ ही रहना चाहती है।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज की
रिकॉर्ड पर मौजूद सभी साक्ष्यों और दस्तावेजों की पड़ताल के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पति क्रूरता के आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
बेंच ने कहा कि इन आरोपों को किसी भी दृष्टिकोण से क्रूरता नहीं माना जा सकता। फैमिली कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन करते हुए तलाक की अर्जी खारिज की थी, इसलिए उस आदेश में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

