मॉवखर चर्च विवाद: मेघालय हाईकोर्ट ने प्रशासनिक दखल के आदेश किए रद्द, कहा- धार्मिक मामलों में ट्रिब्यूनल नहीं बन सकता प्रशासन

मेघालय हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिला प्रशासन किसी चर्च के आंतरिक विवादों को निपटाने के लिए धार्मिक ट्रिब्यूनल की तरह काम नहीं कर सकता। मॉवखर प्रेस्बिटेरियन चर्च की याचिका पर आंशिक राहत देते हुए अदालत ने ईस्ट खासी हिल्स के डिप्टी कमिश्नर द्वारा चर्च की धार्मिक गतिविधियों और पास्टोरल सेवाओं पर लगाई गई प्रशासनिक पाबंदियों को रद्द कर दिया है।

जस्टिस एच एस थांगख्यू की एकल पीठ ने मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि विरोधी गुटों के बीच किसी विवाद की मौजूदगी मात्र से कार्यपालिका को किसी धार्मिक संप्रदाय के आंतरिक मामलों को संचालित या नियंत्रित करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।

धार्मिक मामलों में प्रशासनिक दखल पर रोक

हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन द्वारा जारी 13 मई के कारण बताओ नोटिस और 19 जून के उन दो आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनके तहत खासी जयंतिया प्रेस्बिटेरियन (केजेपी) सिनॉड मिहंगी को चर्च में पास्टोरल देखभाल और धार्मिक संस्कार संपन्न कराने से रोक दिया गया था। डिप्टी कमिश्नर ने प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया के आंतरिक संविधान का हवाला देकर यह सीमाएं तय की थीं।

इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि डिप्टी कमिश्नर महज प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया के संविधान के आधार पर यह तय नहीं कर सकते कि किस सिनॉड के पास धार्मिक अधिकार क्षेत्र है। इसके साथ ही पीठ ने 12 मार्च के निर्देशों और 8 मई के पत्राचार के उन हिस्सों को भी खारिज कर दिया, जिनके जरिए चर्च के सामान्य कामकाज, बैठकों और संपत्तियों के उपयोग पर पूरी तरह या अनिश्चित काल के लिए रोक लगा दी गई थी।

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2019 की वित्तीय गड़बड़ियों से शुरू हुआ था विवाद

मॉवखर चर्च में विवाद की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई थी, जब पहली बार लगभग 2.86 करोड़ रुपये की अज्ञात वित्तीय कमी सामने आई। इसके बाद एक आंतरिक ऑडिट में करीब 4.65 करोड़ रुपये के कथित गबन का खुलासा हुआ। मामले में 3 अगस्त 2019 को 3.26 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी को लेकर पुलिस में औपचारिक प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई गई।

इस वित्तीय विवाद ने आगे चलकर प्रशासनिक टकराव का रूप ले लिया। यह मतभेद पादरी रेवरेंड एम पिंग्रोप के निलंबन व निष्कासन और केजेपी सिनॉड सेपंगी के साथ चर्च की संबद्धता को लेकर गहरा गए। गतिरोध चरम पर तब पहुंचा, जब 1 फरवरी 2026 को चर्च की आम सभा ने सिनॉड सेपंगी से अलग होने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

इसके बाद दोनों पक्षों में चर्च के प्रबंधन और केजेपी सिनॉड मिहंगी द्वारा पास्टोरल सेवाएं देने के अधिकार को लेकर खींचतान बढ़ गई। दोनों ओर से पुलिस में शिकायतें दर्ज हुईं, जिसके बाद प्रशासन ने चर्च के परिसरों, स्कूलों और सामुदायिक भवनों में सभाओं पर रोक लगा दी थी।

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कानून-व्यवस्था और सुरक्षा पर प्रशासनिक अधिकार बरकरार

अदालत ने यह भी साफ किया कि उसने मुख्य चर्च विवाद के मूल बिंदुओं पर कोई फैसला नहीं दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि 1 फरवरी 2026 के अलगाव प्रस्ताव की वैधता, पादरियों या पदाधिकारियों की नियुक्ति व बर्खास्तगी, दोनों सिनॉड के धार्मिक अधिकार क्षेत्र, या संपत्तियों के मालिकाना हक पर कोई निर्णय नहीं सुनाया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष अपने दावों के निपटारे के लिए सक्षम दीवानी अदालत, धार्मिक संस्थाओं या संबंधित वैधानिक मंचों का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र हैं।

इसके अलावा पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि इलाके में शांति भंग होने, हिंसा, अनधिकृत प्रवेश, तोड़फोड़, धमकी या अन्य संज्ञेय अपराधों की वास्तविक अथवा गंभीर आशंका बनती है, तो जिला प्रशासन कानून के अनुसार आवश्यक और निवारक कदम उठाने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

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