गंभीर मरीजों को अस्पतालों के चक्कर कटवाने पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा स्वास्थ्य सुधार का रोडमैप

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश में गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर करने की परिपाटी पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह नवसृजित मेडिकल कॉलेजों में जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं पुख्ता करने और मरीजों को भटकने से रोकने के लिए अल्पकालिक व दीर्घकालिक कदमों का एक समग्र रोडमैप पेश करे। इसके साथ ही बेंच ने यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि राज्य के कुल बजट का कितना हिस्सा चिकित्सा ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित किया जाता है।

यह निर्देश जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने आशुतोष कुमार सिंह की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। यह मामला सुलतानपुर से इलाज के लिए लखनऊ लाए गए एक नवजात शिशु की मौत से जुड़ा है। गंभीर स्थिति में लाए गए इस बच्चे को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआईएमएस) और संजय गांधी पीजीआई (एसजीपीजीआई) के बीच चक्कर कटवाए गए, जिसके बाद उसने दम तोड़ दिया।

नवजात की मौत पर 15 दिन में निष्पक्ष जांच और मुआवजे की चेतावनी

खंडपीठ ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराकर 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट पेश करने का आदेश राज्य सरकार को दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि इस जांच में पीड़ित परिवार का बयान अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर चिकित्सीय या प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो अदालत जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ पीड़ित परिवार को समुचित मुआवजा देने पर भी विचार करेगी।

सुसज्जित एंबुलेंस और ऑनलाइन रेफरल प्रणाली पर जोर

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अदालत ने कहा कि यह मामला महज एक बच्चे को समय पर इलाज न मिल पाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की व्यापक समस्याओं को दर्शाता है। बेंच ने कहा कि यदि नवजात को सुलतानपुर से राजधानी के बड़े अस्पताल में स्थानांतरित करना अनिवार्य था, तब भी परिवहन के लिए प्रयुक्त एंबुलेंस में मरीज की जान बचाने योग्य सभी जरूरी चिकित्सीय उपकरण होने चाहिए थे।

अस्पतालों के अनावश्यक फेरों में मरीजों का बहुमूल्य समय नष्ट होने से बचाने के लिए अदालत ने एक पारदर्शी ऑनलाइन रेफरल व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया। इस प्रणाली के तहत किसी भी मरीज को भेजने से पहले रेफर करने वाला अस्पताल यह सुनिश्चित करेगा कि संबंधित संस्थान में आवश्यक बेड और इलाज उपलब्ध है या नहीं। इसके अलावा, प्रमुख सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों को सही जानकारी देने के लिए योग्य कर्मियों की तैनाती की आवश्यकता भी जताई गई।

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स्वास्थ्य बजट का ब्योरा तलब, 1 अक्टूबर को अगली सुनवाई

अदालत ने अपर मुख्य सचिव (चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) को सुधार की पूरी कार्ययोजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी। हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (चिकित्सा शिक्षा) सहित केजीएमयू, आरएमएलआईएमएस और एसजीपीजीआई के उन सभी डॉक्टरों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया है, जो इस नवजात के मामले से अवगत रहे हैं।

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