सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (जेजे एक्ट) की धारा 94 के तहत पीड़िता की अवयस्कता साबित करने के लिए बपतिस्मा प्रमाणपत्र (बैपटिज्मल सर्टिफिकेट) कोई वैधानिक दस्तावेज नहीं है। इस आधार पर कोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 के तहत अभियुक्त को दी गई 20 साल की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने यह भी माना कि उम्र का वैधानिक प्रमाण न होने से कोई अभियुक्त अपने आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता, बशर्ते दुष्कर्म का तथ्य संदेह से परे साबित हो। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) के तहत समरूप अपराधों और आरोप तय करने में हुई त्रुटि को सुधारने के कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए शीर्ष अदालत ने अभियुक्त की सजा को भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 376(1) के तहत दुष्कर्म के अपराध में तब्दील कर दिया और उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स जिले के खलीहरियात महिला पुलिस स्टेशन में 27 नवंबर 2019 को दर्ज कराई गई एक एफआईआर से जुड़ा है। पीड़िता की मां ने शिकायत दर्ज कराई थी कि 26 नवंबर 2019 को उनकी 13 वर्षीय बेटी के साथ मोकोइदालिंग, सुतंगा में अभियुक्त ने दुष्कर्म किया था।
पुलिस जांच के बाद अभियुक्त के खिलाफ आईपीसी की धारा 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 3 व 4 के तहत आरोप तय किए गए। विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष ने 14 गवाह पेश किए, 11 भौतिक साक्ष्य प्रदर्शित किए और एक बपतिस्मा प्रमाणपत्र पेश किया, जिसे ‘पेपरमार्क-1’ के रूप में चिह्नित किया गया था। ईस्ट जयंतिया हिल्स की विशेष अदालत (पॉक्सो) ने 16 जून 2021 को अभियुक्त को दोषी ठहराया। ट्रायल कोर्ट ने मां के बयान, बपतिस्मा प्रमाणपत्र और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता की उम्र 13 वर्ष मानी और अभियुक्त को पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत 20 साल के कठोर कारावास तथा आईपीसी की धारा 506 के तहत दो साल के कारावास की सजा सुनाई।
मेघालय हाईकोर्ट ने 8 जुलाई 2024 को अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा को बरकरार रखा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने पॉक्सो एक्ट के तहत दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि पीड़िता की उम्र जेजे एक्ट, 2015 की धारा 94 के अनुसार साबित नहीं की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के पी. युवप्रकाश बनाम राज्य के फैसले का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि एक निजी चर्च द्वारा जारी बपतिस्मा प्रमाणपत्र न तो स्कूल या मैट्रिकुलेशन बोर्ड का प्रमाणपत्र है और न ही नगर निगम या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र। यह भी दलील दी गई कि चर्च के पादरी से पूछताछ नहीं की गई, दस्तावेज को औपचारिक रूप से प्रदर्शित करने के बजाय केवल चिह्नित किया गया था और जांच अधिकारी ने पीड़िता का रेडियोलॉजिकल ऑसिफिकेशन (अस्थि) टेस्ट भी नहीं कराया। अपीलकर्ता ने यह तर्क भी उठाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आईपीसी की धारा 376 के तहत कोई आरोप तय नहीं किया गया था, इसलिए उसे इस धारा में सजा नहीं दी जा सकती।
इसके विपरीत, मेघालय राज्य के महाधिवक्ता अमित कुमार ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने पुख्ता सबूतों के आधार पर दोषसिद्धि का फैसला दिया है। राज्य सरकार ने दलील दी कि खासी जयंतिया प्रेस्बिटेरियन असेंबली द्वारा 18 सितंबर 2016 को जारी बपतिस्मा प्रमाणपत्र में पीड़िता की जन्मतिथि 5 मार्च 2006 दर्ज है, जिसे अदालत में चुनौती नहीं दी गई थी। बपतिस्मा प्रमाणपत्र की वैधता के समर्थन में राज्य ने लुइस कैतानो विगास बनाम एस्ट्रेलिना मारियाना आर.एम.ए. डा’कोस्टा व अन्य के मामले का उल्लेख किया। इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि पीड़िता का मासिक धर्म शुरू नहीं हुआ था, जो यह साबित करता है कि वह अवयस्क थी। पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह व अन्य के फैसले का हवाला देते हुए राज्य ने कहा कि पीड़िता का बयान विश्वसनीय था, जिसे अभियुक्त के चेहरे की चोटों, मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन फटने के निष्कर्षों और कपड़ों पर अभियुक्त के ब्लड ग्रुप के निशान मिलने से पूर्ण समर्थन मिला।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में विचार के लिए दो मुख्य कानूनी बिंदु तय किए:
- क्या ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा पॉक्सो एक्ट के तहत दोषसिद्धि के लिए पीड़िता की उम्र का निर्धारण कानून के अनुसार सही किया गया था?
- यदि कानून के अनुसार पीड़िता की अवयस्कता साबित नहीं होती है, तो क्या आईपीसी की धारा 376 के तहत अलग से आरोप तय न होने के बावजूद अभियुक्त को धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराया जा सकता है?
1. जेजे एक्ट की धारा 94 के तहत उम्र साबित करने में अभियोजन की विफलता
शीर्ष अदालत ने उम्र निर्धारण की कानूनी प्रक्रिया की समीक्षा करते हुए जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य, मध्य प्रदेश राज्य बनाम अनूप सिंह (जिसमें महादेव बनाम महाराष्ट्र राज्य का संदर्भ लिया गया था) और पी. युवप्रकाश बनाम राज्य के पूर्व फैसलों का उल्लेख किया। इन फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि जेजे एक्ट की धारा 94 उम्र साबित करने के लिए एक सख्त पदानुक्रम तय करती है: सबसे पहले मैट्रिक या स्कूल का जन्म प्रमाणपत्र, उसके अभाव में नगर निगम, नगरपालिका या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र और इन दोनों के न होने पर ही मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट कराया जा सकता है।
यह पाते हुए कि जांच अधिकारी ने इनमें से कोई भी वैधानिक दस्तावेज हासिल नहीं किया और न ही पीड़िता का ऑसिफिकेशन टेस्ट कराया, पीठ ने टिप्पणी की:
“पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर उपलब्ध एकमात्र दस्तावेज खासी जयंतिया प्रेस्बिटेरियन असेंबली द्वारा जारी बपतिस्मा प्रमाणपत्र है। यद्यपि बपतिस्मा प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि का समर्थन पीड़िता की मां (पीडब्ल्यू-2) के बयान से होता है कि लड़की का जन्म 05.03.2006 को हुआ था, फिर भी चूंकि यह दस्तावेज किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 के तहत निर्धारित दस्तावेजों में से नहीं है, इसलिए हमारा यह सुविचारित मत है कि अभियोजन पक्ष किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 में अपेक्षित तरीके से पीड़िता की उम्र साबित करने में विफल रहा है।”
राज्य सरकार द्वारा पेश लुइस कैतानो विगास मामले को अलग बताते हुए पीठ ने कहा कि वह मामला संपत्ति के बंटवारे से जुड़े दीवानी विवाद का था, जहां बपतिस्मा रिकॉर्ड के साथ औपचारिक नागरिक जन्म प्रमाणपत्र भी मौजूद था। इसलिए, वह मिसाल पॉक्सो मामलों में लागू नहीं हो सकती।
2. अलग से आरोप न होने पर भी आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषसिद्धि वैध
दुष्कर्म का अपराध साबित होने पर जोर देते हुए पीठ ने कहा कि उम्र का तकनीकी प्रमाण न होने का मतलब यह नहीं है कि यौन हिंसा के दोषी को बरी कर दिया जाए। अदालत ने सुच्चा सिंह व अन्य बनाम पंजाब राज्य के फैसले का उद्धरण देते हुए कहा:
“संदेह के लाभ के नियम के प्रति जरूरत से ज्यादा झुकाव काल्पनिक संदेहों या अनसुलझी आशंकाओं को बढ़ावा नहीं देना चाहिए और इस तरह सामाजिक सुरक्षा को नष्ट नहीं करना चाहिए। इस दलील पर न्याय को निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता कि सौ दोषी भले छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। दोषियों को छूटने देना किसी दुष्कर्म पीड़िता के साथ न्याय करना नहीं है।”
आईपीसी की धारा 376 के तहत औपचारिक आरोप तय न होने के बिंदु पर पीठ ने सीआरपीसी की धारा 464(1), 222 और 386(b) की विस्तृत व्याख्या की। इसके साथ ही संदीप यादव बनाम सतीश व अन्य, रफीक अहमद उर्फ रफी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, सचिन बनाम महाराष्ट्र राज्य, शमनासाहेब एम. मुल्तानी बनाम कर्नाटक राज्य, उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम स्वरूप उर्फ बरकत, विली (विलियम) स्लैनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य और दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का विश्लेषण किया गया।
अदालत ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 3 और आईपीसी की धारा 375 में दुष्कर्म के आवश्यक तत्व और ‘एक्टस रियस’ (आपराधिक कृत्य) पूरी तरह समान हैं; दोनों के बीच एकमात्र अंतर पीड़िता की उम्र का है। पीठ ने कहा:
“जब अभियुक्त को पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत अपराध के खिलाफ अपना बचाव करने का पूरा अवसर दिया गया है, जिसकी प्रकृति आईपीसी की धारा 376 के अपराध के समान ही है, तो यह मानने में कोई झिझक नहीं है कि अभियोजन पक्ष द्वारा पीड़िता की अवयस्कता साबित न कर पाने की स्थिति में भी, उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 376 के आरोप के तहत आगे बढ़ने में न्याय की कोई विफलता नहीं होगी।”
रिकॉर्ड के सबूतों की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि पीड़िता ने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड के तीनों राउंड में अभियुक्त की सही पहचान की थी। पीड़िता द्वारा बचाव में पत्थर मारने से अभियुक्त के माथे पर जो चोट आई थी, उसकी पुष्टि डॉक्टर ने की। इसके अलावा, फॉरेंसिक जांच में पीड़िता के कपड़ों पर अभियुक्त का ब्लड ग्रुप पाया गया और मेडिकल जांच ने भी जबरन संभोग की पुष्टि की।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि वैधानिक उम्र प्रमाण के अभाव में पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती, लेकिन समरूप अपराध होने के कारण अभियुक्त को आईपीसी की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का दोषी ठहराया जाना पूरी तरह न्यायसंगत है।
मेघालय हाईकोर्ट और विशेष अदालत (पॉक्सो) के फैसलों में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 376 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने (जुर्माना न देने पर छह महीने का अतिरिक्त साधारण कारावास) की सजा सुनाई। आईपीसी की धारा 506 के तहत सुनाई गई दो वर्ष की सजा को बरकरार रखा गया और अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: प्यनचेमलंगकी बरेह बनाम मेघालय राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4337/2026
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

