इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राज बीर सिंह ने एक निचली अदालत की न्यायिक अधिकारी के आचरण को “एक न्यायिक अधिकारी के पद के अशोभनीय” बताते हुए उन्हें भविष्य में सतर्क रहने की चेतावनी दी है। मामला यह है कि शमनीय (कंपाउंडेबल) अपराधों में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को सत्यापित करने के बाद भी, पीठासीन अधिकारी ने वकील की फीस बनवाने के लिए आरोपियों को जमानत लेने पर मजबूर किया, आरोप तय किए और पूरा ट्रायल चला डाला। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत दाखिल रिकॉल अर्जी पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अपने पुराने आदेश को वापस लेने से तो इनकार कर दिया—क्योंकि ट्रायल कोर्ट पहले ही आरोपियों को बरी कर चुका था—लेकिन संबंधित न्यायिक अधिकारी के इस रवैये पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उन्हें आगाह किया।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक अरशद और दुलारे ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में अर्जी (संख्या 27772 वर्ष 2025) दाखिल कर बरेली के प्रेमनगर थाने में दर्ज केस क्राइम नंबर 190 वर्ष 2024 (आईपीसी की धारा 323 और 506) से जुड़े केस नंबर 2202 वर्ष 2025 (स्टेट बनाम अरशद व अन्य) की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। इसमें 16 जुलाई 2024 की चार्जशीट और 6 नवंबर 2024 के संज्ञान/समन आदेश को चुनौती दी गई थी। उनका कहना था कि यह विवाद एक मामूली घटना से जुड़ा था और अब दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौता हो चुका है।
हाईकोर्ट ने 8 अगस्त 2025 को इस अर्जी का निस्तारण करते हुए स्पष्ट किया था कि आईपीसी की धारा 323 और 506 के तहत अपराध शमनीय हैं और ट्रायल कोर्ट खुद इस मामले में अंतिम फैसला ले सकता है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि यदि दोनों पक्ष दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में समझौते का प्रार्थना पत्र दाखिल करते हैं, तो उस पर कानून के अनुसार त्वरित फैसला लिया जाए। साथ ही दो सप्ताह तक और प्रार्थना पत्र दाखिल होने की स्थिति में उसके निस्तारण तक आवेदकों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद निचली अदालत में घटे घटनाक्रम को लेकर आवेदकों ने हाईकोर्ट के 8 अगस्त 2025 के आदेश को वापस लेने के लिए आपराधिक विविध रिकॉल अर्जी नंबर 02 वर्ष 2025 दाखिल की।
निचली अदालत की कार्यवाही और दलीलें
रिकॉल अर्जी पर सुनवाई के दौरान आवेदकों के वकील ने अदालत को दिखाया कि तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम)/अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन), कोर्ट नंबर 7, बरेली ने हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया।
ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड से सामने आया कि 14 अगस्त 2025 को दोनों पक्षों ने समझौते का प्रार्थना पत्र दाखिल किया और अदालत ने उसे सत्यापित भी कर दिया, लेकिन इसके बावजूद समझौते पर कोई आदेश पारित नहीं किया गया और मामले को सुनवाई के लिए रख दिया गया। इसके बाद:
- 28 अगस्त 2025 को आवेदकों को जमानत दी गई और 29 अगस्त 2025 को आरोप तय करने की तारीख तय की गई।
- 29 अगस्त 2025 को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए।
- 1 सितंबर 2025 को अभियोजन पक्ष के गवाहों (पीडब्लू-1 और पीडब्लू-2) के बयान दर्ज किए गए।
- 8 सितंबर 2025 को धारा 313 के तहत आरोपियों के बयान दर्ज हुए और अंतिम बहस सुनी गई।
- 20 सितंबर 2025 को ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए आवेदकों को बरी कर दिया।
जब हाईकोर्ट ने पीठासीन अधिकारी से उनके इस कदम पर स्पष्टीकरण मांगा, तो उन्होंने 15 अप्रैल 2026 को अपना स्पष्टीकरण सौंपा। इसमें उन्होंने दावा किया कि पक्षों ने समझौते पर जोर नहीं दिया था। साथ ही उन्होंने बताया कि आरोपियों के वकील ने अनुरोध किया था कि गवाहों के पक्षद्रोही (होस्टाइल) बयान दर्ज कर मामले का फैसला किया जाए ताकि उन्हें अपनी फीस मिल सके, और अदालत ने इसी अनुरोध पर आगे ट्रायल की प्रक्रिया अपनाई।
हाईकोर्ट में तत्कालीन एसीजेएम/अतिरिक्त सिविल जज, बरेली की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सुधीर मेहरोत्रा ने कहा कि पीठासीन अधिकारी बिना शर्त माफी मांगती हैं और चूंकि उनका लंबा न्यायिक करियर अभी बाकी है, इसलिए उनकी माफी स्वीकार कर ली जाए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
ट्रायल कोर्ट की ऑर्डर-शीट देखने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पीठासीन अधिकारी का यह दावा झूठा था कि पक्षों ने समझौते पर जोर नहीं दिया। अदालत ने कहा कि 14 अगस्त 2025 की ऑर्डर-शीट साफ साबित करती है कि समझौता दाखिल हुआ और उसे सत्यापित भी किया गया। अदालत ने तर्क दिया कि जब आवेदक समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द कराने हाईकोर्ट तक आए और निचली अदालत में भी समझौता पेश किया, तो यह बात कतई गले नहीं उतरती कि वे समझौते को छोड़कर ट्रायल का सामना करना पसंद करेंगे।
हाईकोर्ट ने माना कि पीठासीन अधिकारी का स्पष्टीकरण अदालती आदेशों के प्रति घोर उपेक्षा को दर्शाता है, जिससे साबित होता है कि आरोपियों को केवल वकील की फीस बनवाने के लिए मुकदमे के ट्रायल में झोंका गया:
“यह स्पष्ट है कि एक बार जब विद्वान पीठासीन अधिकारी द्वारा 14.08.2025 को समझौते को सत्यापित कर दिया गया था, तो मामले का निस्तारण समझौते के आधार पर ही होना चाहिए था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अभियुक्तों को जमानत लेने के लिए मजबूर किया, आरोप तय किए और उन्हें ट्रायल पर भेज दिया। इस प्रकार, यह साफ है कि तत्कालीन एसीजेएम/अतिरिक्त सिविल जज (एस.डी.), कोर्ट नंबर 7, बरेली ने इस अदालत के आदेश की खुलेआम और घोर अवहेलना व उल्लंघन किया है तथा कानून के प्रावधानों की पूरी तरह उपेक्षा की है।”
अदालत ने आगे टिप्पणी की:
“उपर्युक्त तथ्यों के मद्देनजर यह स्पष्ट है कि इस अदालत द्वारा पारित 08.08.2025 के आदेश की तत्कालीन एसीजेएम/अतिरिक्त सिविल जज (एस.डी.), कोर्ट नंबर 7, बरेली द्वारा घोर और खुले तौर पर अवहेलना और उल्लंघन किया गया। समझौते के सत्यापन के बाद भी, उस पर आदेश पारित करने के बजाय, उन्होंने अवैध और मनमाने तरीके से ट्रायल की कार्यवाही आगे बढ़ाई, अभियुक्तों के खिलाफ आरोप तय किए और उन्हें मुकदमे में डाल दिया। उक्त पीठासीन अधिकारी का यह आचरण एक न्यायिक अधिकारी के पद के सर्वथा अशोभनीय है।”
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की ओर से मांगी गई माफी को ध्यान में रखते हुए कोई दंडात्मक कदम उठाने या उसकी सिफारिश करने से परहेज किया, लेकिन उन्हें सख्त चेतावनी दी:
“उपर्युक्त के दृष्टिगत, तत्कालीन एसीजेएम/अतिरिक्त सिविल जज (एस.डी.), कोर्ट नंबर 7, बरेली के खिलाफ कोई आगे की कार्रवाई नहीं की जाती है और न ही इसकी सिफारिश की जाती है, लेकिन उन्हें भविष्य में सतर्क रहने की चेतावनी दी जाती है।”
हाईकोर्ट के 8 अगस्त 2025 के आदेश को वापस लेने (रिकॉल करने) की मुख्य प्रार्थना पर अदालत ने कहा कि चूंकि निचली अदालत पहले ही मुकदमे का निस्तारण कर आवेदकों को बरी कर चुकी है, इसलिए पुराने आदेश को वापस लेने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। इसके साथ ही रिकॉल अर्जी का निस्तारण कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अरशद और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: आवेदन अंतर्गत धारा 528 बीएनएसएस संख्या 27772 वर्ष 2025 (आपराधिक विविध रिकॉल प्रार्थना पत्र संख्या 02 वर्ष 2025)
पीठ: जस्टिस राज बीर सिंह
निर्णय की तिथि: 31 अगस्त 2026

