नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिल्डर द्वारा किए गए विलंब के लिए न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) द्वारा लगाया गया टाइम एक्सटेंशन चार्ज सीआईआरपी लागत (कॉस्ट) के रूप में नहीं वसूला जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह पेनल्टी निर्दोष होमबायर्स या नए सफल समाधान आवेदक (एसआरए) पर नहीं डाली जा सकती। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के उस आदेश को संशोधित कर रद्द कर दिया, जिसमें तीन साल के टाइम एक्सटेंशन चार्ज को सीआईआरपी लागत मानने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही पीठ ने होमबायर्स की अपील स्वीकार कर ली और दसवें वर्ष तक एक्सटेंशन चार्ज वसूलने की नोएडा की अपील खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नोएडा के सेक्टर 100 में स्थित ‘लोटस बुलेवार्ड’ और सेक्टर 110 में स्थित ‘लोटस पनाश’ नामक दो आवासीय बहुमंजिला प्रोजेक्ट्स से जुड़ा है। इन दोनों परियोजनाओं के लिए नोएडा अथॉरिटी ने मेसर्स ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को भारी प्रीमियम पर लीज डीड के तहत जमीन आवंटित की थी। बिल्डर इन प्रोजेक्ट्स को 2016 की तय समयसीमा के भीतर पूरा करने में विफल रहा और गंभीर वित्तीय संकट में फंस गया। इसके बाद कंपनी को दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) के तहत कॉर्पोरेट देनदार (कॉर्पोरेट डेटर) घोषित कर दिया गया।
वित्तीय लेनदारों की श्रेणी में आने वाले होमबायर्स से ही लेंडर्स की कमेटी (सीओसी) का गठन हुआ। प्रोजेक्ट को अधर में लटकने से बचाने के लिए होमबायर्स ने अपनी शेष बिक्री राशि का अग्रिम भुगतान करते हुए फंड जुटाया और सीओसी द्वारा स्वीकृत ‘पूल एंड बिल्ड’ व्यवस्था के तहत निर्माण कार्य को चालू रखा।
बाद में एनसीएलटी ने मेसर्स एसएमवी एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड की समाधान योजना को मंजूरी दे दी, जो अब एसआरए बन गई। हालांकि, नोएडा द्वारा लीज के टाइम एक्सटेंशन चार्ज की मांग को लेकर विवाद खड़ा हो गया। एनसीएलएटी ने दोनों लीज डीड के तहत प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए निर्धारित अधिकतम तीन साल की अवधि के टाइम एक्सटेंशन चार्ज को सीआईआरपी लागत मानने का निर्देश दिया। इस आदेश के खिलाफ होमबायर्स के अधिकृत प्रतिनिधि (एआर) और नोएडा दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
होमबायर्स के अधिकृत प्रतिनिधि की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने दलील दी कि टाइम एक्सटेंशन चार्ज पूरी तरह से दंडात्मक प्रकृति (पेनल नेचर) का है। यह इनसॉल्वेंसी रेगुलेशंस की धारा 5(13)(सी) के दायरे में नहीं आता, क्योंकि इसे न तो इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी) द्वारा वहन किया गया है और न ही इसका प्रोजेक्ट को जारी रखने से कोई संबंध है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि टाइम एक्सटेंशन चार्ज के विवाद के चलते नोएडा ने 16 अक्टूबर 2024 को लोटस पनाश के तीन टावरों को सील कर दिया था। उन्होंने कहा कि देरी की गलती सिर्फ पूर्ववर्ती बिल्डर की थी, जिसने दिसंबर 2016 से लेकर दिवाला प्रक्रिया शुरू होने की तारीख 10 जनवरी 2019 तक डिफॉल्ट किया। ऐसे में बेकसूर होमबायर्स पर यह देनदारी नहीं थोपी जा सकती।
दूसरी ओर, नोएडा की ओर से पेश वकील रचित मित्तल ने तर्क दिया कि टाइम एक्सटेंशन चार्ज का भुगतान किए बिना प्रोजेक्ट को कानूनी रूप से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, इसलिए इसे आवश्यक सीआईआरपी लागत माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लीज उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 और 18 जून 2015 व 18 अक्टूबर 2019 के नीतिगत कार्यालय आदेशों से संचालित होती है। इस नीति के तहत तीन साल से आगे दसवें साल तक क्रमशः 7%, 8%, 9% और 10% तथा उसके बाद 1% वार्षिक दर से एक्सटेंशन चार्ज वसूला जा सकता है, जिसे सीआईआरपी लागत में शामिल किया जाना चाहिए।
एसआरए की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कृष्णेंदु दत्ता ने होमबायर्स के प्रतिनिधि की दलीलों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि स्वीकृत समाधान योजना में आकस्मिक सुरक्षा केवल ओवरलैप अवधि के शेष तक सीमित है और योजना के अनुसार न्यायिक फैसले के बिना यदि यह लागत 3 करोड़ रुपये के अनुमान से अधिक होती है, तो उसे लोटस पनाश के टावर 17, 18 और 19 के आवंटियों से सुपर एरिया चार्ज के रूप में वसूला जाना तय हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
नोएडा द्वारा भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत लीज पर दी गई जमीनों और समझौतों की पड़ताल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदारों की व्यथा पर गंभीर चिंता जताई। पीठ ने टिप्पणी की:
“यह एक और ऐसा मामला है जो उन घर खरीदारों की दुर्दशा को उजागर करता है, जो अपने सिर पर छत पाने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई और जीवन भर की बचत इस उम्मीद में लगा देते हैं कि वे शानो-शौकत से रहेंगे, जैसा कि बिल्डर ने आकर्षक नामों वाली गगनचुंबी इमारतों का वादा करके दिखाया था, लेकिन अंत में उन्हें यह अहसास होता है कि यह सब सिर्फ एक अधूरा सपना था।”
पीठ ने आगे कहा कि नोएडा भले ही वाणिज्यिक गतिविधियों से जुड़ा हो, लेकिन एक स्थानीय निकाय के रूप में उसका मूल उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि जनहित और सुनियोजित शहरी विकास करना है। लीज डीड और नीतिगत आदेशों में तय की गई पेनल्टी चूककर्ता बिल्डर को दंडित करने और समय पर निर्माण सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी।
कोर्ट ने रेखांकित किया कि मौजूदा मामले में दोषी बिल्डर दिवाला प्रक्रिया के कारण बाहर हो चुका है और अधर में लटके प्रोजेक्ट को होमबायर्स के अपने फंड तथा नए एसआरए के सहयोग से पूरा किया जा रहा है। ऐसे में नई व्यवस्था पर पेनल्टी थोपना विकास के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देगा। पीठ ने कहा:
“इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में हमारा यह मानना है कि नोएडा के लिए यह सर्वथा उचित होगा कि वह पेनल्टी चार्ज को माफ कर दे, क्योंकि जिस देरी के कारण यह स्थिति बनी है, वह न तो घर खरीदारों की गलती से हुई है और न ही एसआरए की चूक के कारण। यहां कॉर्पोरेट देनदार के पुराने गुनाहों की सजा घर खरीदारों और एसआरए को देने की कोशिश की जा रही है, जिसे कतई अनुमति नहीं दी जा सकती; विशेष रूप से तब, जब पेनल्टी लगाने वाला प्राधिकरण एक ऐसा स्थानीय निकाय है जिसका मुख्य सरोकार अपने अधिकार क्षेत्र के समग्र विकास से है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि नोएडा द्वारा देरी पर लगाई गई पेनल्टी एसआरए और होमबायर्स पर वैध रूप से नहीं थोपी जा सकती। पीठ ने टाइम एक्सटेंशन चार्ज को सीआईआरपी लागत मानने के एनसीएलएटी के निर्देश को पूरी तरह रद्द करते हुए आदेश को संशोधित किया। इसके अलावा, कोर्ट ने तीन साल से आगे दसवें वर्ष तक अतिरिक्त चार्ज वसूलने की नोएडा की मांग को भी खारिज कर दिया।
इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने होमबायर्स के अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा दायर सिविल अपील संख्या 3132/2026 को स्वीकार कर लिया और नोएडा अथॉरिटी द्वारा दायर सिविल अपील संख्या 4207/2026 को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द ऑथराइज्ड रिप्रेजेंटेटिव फॉर ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड, सुश्री राकेश वर्मा बनाम मैसर्स न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी एवं अन्य (सिविल अपील संख्या 4207/2026 के साथ)
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 3132/2026, सिविल अपील संख्या 4207/2026 के साथ
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 03 सितंबर 2026

