कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट: तीन साल की तय मियाद के बाद रिवीजन का अधिकार इस्तेमाल नहीं कर सकते राजस्व अधिकारी—सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1964 की धारा 56 के तहत राजस्व अधिकारी कानून द्वारा निर्धारित तीन वर्ष की मियाद (लिमिटेशन पीरियड) समाप्त होने के बाद पुनरीक्षण (रिवीजन) की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकते। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने अपीलों को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें दशकों पहले आवंटित जमीनों की नए सिरे से जांच का आदेश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि वैधानिक आधार के बिना अत्यधिक देरी के बाद रिवीजन शुरू करना पूरी तरह से कानून के विपरीत है।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला बेंगलुरु के दासरहल्ली गांव के सर्वे नंबर 2 में स्थित 28 गुंठा जमीन से जुड़ा है। एम.आर.आर. सेट्टी ने वर्ष 1929 में आठ अलग-अलग रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए यह संपत्ति खरीदी थी। इसके दशकों बाद, वर्ष 1974 में हुए सिटी टाइटल सर्वे के दौरान इस जमीन को सिटी टाइटल सर्वे (सीटीएस) संख्या 174/1 से 174/5 आवंटित किए गए।

वर्ष 2004 में, सेट्टी ने इस जमीन पर ‘गोकुल लेक व्यू’ नाम से एक रिहायशी अपार्टमेंट परिसर बनाने की अनुमति मांगी। तत्कालीन बैंगलोर महानगर पालिके (बाद में वृहत बेंगलुरु महानगर पालिके) ने 8 जुलाई 2004 को निर्माण योजना स्वीकृत की और 22 मई 2005 को निर्माण कार्य शुरू करने की अनुमति दे दी। निर्माण पूरा होने के बाद, टाउन प्लानिंग के संयुक्त निदेशक ने 12/13 जून 2006 को इस इमारत का ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया।

इसके बाद 26 अप्रैल 2014 को—यानी सीटीएस नंबर आवंटित होने के करीब चार दशक बाद—ज्वाइंट डायरेक्टर/रजिस्ट्रार ऑफ लैंड रिकॉर्ड्स, सिटी सर्वे (साउथ जोन, बेंगलुरु) ने कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1964 की धारा 56 के तहत एक नोटिस जारी किया। यह नोटिस एल. शंकरलिंगैया नामक एक तीसरे पक्ष की शिकायत पर जारी हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि येदियुर झील पर जनता द्वारा अतिक्रमण किया जा रहा है। राजस्व प्राधिकारी ने सीटीएस नंबर 174 के संबंध में पूर्ववर्ती जांच अधिकारी के पुराने आदेश को रद्द कर दिया और मूल झील सर्वे रिकॉर्ड्स के आधार पर सेट्टी की जमीन सहित कई सीटीएस प्लॉट्स की नए सिरे से जांच के आदेश दे दिए।

सेट्टी और अन्य प्रभावित भूस्वामियों ने इस नोटिस को कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 35210/2014 के माध्यम से चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि यह पूरी कार्यवाही 1964 के कानून की धारा 56(3) के परंतुक (प्रोविजो) के तहत समय-बाधित (टाइम-बार्ड) है। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 22 जुलाई 2015 को रिट याचिका स्वीकार करते हुए माना कि 35 साल की लंबी अवधि बीत जाने के बाद रिवीजन शुरू करने का अधिकार राजस्व अधिकारी के पास नहीं था।

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हालांकि, कर्नाटक सरकार की अपील पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 9 जनवरी 2020 को एकल पीठ का आदेश उलट दिया। खंडपीठ का कहना था कि चूंकि झील पर अतिक्रमण का आरोप है और अभी कोई अंतिम प्रतिकूल आदेश पारित नहीं हुआ है, इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए जांच जरूरी है। इसके बाद सेट्टी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका भी 16 जून 2023 को खारिज कर दी गई। इसके खिलाफ सेट्टी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिसंबर 2024 में सेट्टी के निधन के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया गया।

राज्य सरकार की दलीलें

हाईकोर्ट की खंडपीठ के रुख का बचाव करते हुए कर्नाटक सरकार के वकील ने तर्क दिया कि 1964 के अधिनियम की धारा 52 के तहत लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 4, 5 और 12 के प्रावधान लागू होते हैं।

इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार ने कर्नाटक लैंड रेवेन्यू (संशोधन) अधिनियम, 2025 का हवाला दिया, जिसके जरिए राजस्व अदालत की अंतर्निहित शक्तियों (इन्हेरेन्ट पावर्स) से संबंधित धारा 25 में संशोधन किया गया था। सरकार ने कहा कि नए जोड़े गए परंतुक के तहत यदि कोई नया और महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आता है, जो पहले रिकॉर्ड पर नहीं था, तो राजस्व अदालत को समीक्षा करने का अंतर्निहित अधिकार प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दोनों दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। धारा 52 के संदर्भ में पीठ ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान केवल अपीलों पर लागू होता है, न कि धारा 56 के तहत मिलने वाले रिवीजन के अधिकार पर। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब धारा 56(3) के परंतुक में स्पष्ट शब्दों में यह तय कर दिया गया है कि धारा 56(1) के तहत पुनरीक्षण (रिवीजन) की शक्ति का प्रयोग ऐसे आदेश के संबंध में, जिसके खिलाफ कोई अपील नहीं की गई है, उस आदेश की तारीख से तीन वर्षों के भीतर ही किया जा सकता है, तो उक्त परंतुक में निर्धारित मियाद (लिमिटेशन) को निष्प्रभावी या विफल करने के लिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के प्रावधानों को पिछले दरवाजे से नहीं लाया जा सकता।”

धारा 25 में किए गए संशोधन पर पीठ ने कहा कि कानून की धारा 24 के अनुसार राजस्व अधिकारी केवल तभी ‘राजस्व अदालत’ की तरह कार्य करते हैं, जब वे राज्य और किसी नागरिक के बीच या पक्षों के आपसी विवाद का न्यायिक निपटारा कर रहे हों। इसके विपरीत, वर्ष 1974 में सीटीएस नंबर देना केवल एक प्रशासनिक काम था, न कि अर्द्ध-न्यायिक (क्वासी-ज्यूडिशियल) प्रक्रिया। इसलिए संशोधित धारा 25 का लाभ भी सरकार को नहीं मिल सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने देरी से किए जाने वाले रिवीजन पर अपने पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया:

  • स्टेट ऑफ गुजरात बनाम पाटिल राघव नाथा व अन्य (1969) के मामले में तीन जजों की पीठ ने तय किया था कि जहां स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) रिवीजन के लिए कोई समय-सीमा तय न भी हो, वहां भी इस शक्ति का प्रयोग एक उचित समय (रीज़नेबल टाइम) के भीतर ही होना चाहिए।
  • सेबी बनाम सुनील कृष्णा खेतान व अन्य (2023) मामले में—जिसमें मनसाराम बनाम एस.पी. पाठक, भारत सरकार बनाम साइटैडल फाइन फार्मास्यूटिकल्स, स्टेट ऑफ उड़ीसा बनाम बृंदाबन शर्मा और स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बठिंडा डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड के सिद्धांतों को दोहराया गया था—शीर्ष अदालत ने फिर माना कि प्राधिकारियों को अनिश्चित काल तक कार्रवाई शुरू करने की छूट नहीं दी जा सकती।
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कोर्ट ने बिना समय-सीमा वाले मामलों में भी त्वरित कार्रवाई के महत्व पर जोर देते हुए कहा:

“पुराने और निष्प्रभावी हो चुके मामलों को उठाने और उन पर समय नष्ट न करने में व्यापक जनहित निहित है। इसलिए, किसी भी शक्ति का प्रयोग, भले ही कानून में कोई समय-सीमा निर्दिष्ट न की गई हो, एक उचित समय के भीतर ही किया जाना चाहिए। यह न्याय की विफलता तथा सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है और साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन पर बिना किसी देरी के रोक लगाई जाए और दंड दिया जाए, जिससे अधिनियम के मूल उद्देश्य को प्रभावी बनाया जा सके।”

मौजूदा मामले का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पाया कि यहां तो धारा 56(3) के परंतुक में तीन साल की स्पष्ट वैधानिक सीमा तय है:

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“बशर्ते कि उप-धारा (1) में उल्लिखित कोई भी राजस्व अधिकारी या सर्वेक्षण अधिकारी, इस अध्याय के तहत जिस आदेश के खिलाफ कोई अपील नहीं की गई है, उसके संबंध में इस धारा के तहत शक्तियों का प्रयोग, उस आदेश की तारीख से तीन वर्ष के भीतर कभी भी कर सकता है, जिसे संशोधित किया जाना है।”

अदालत ने कहा कि यह जमीन वर्ष 1929 से निजी संपत्ति रही है, 1974 में इसे सीटीएस नंबर मिले, नगर निगम ने इस पर इमारत निर्माण की मंजूरी दी और तीसरे पक्षों के हित भी पैदा हो चुके थे। ऐसी स्थिति में, “ज्वाइंट डायरेक्टर/रजिस्ट्रार ऑफ लैंड रिकॉर्ड्स द्वारा इस तरह की शक्ति का इस्तेमाल कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर था।” पीठ ने माना कि हाईकोर्ट की एकल पीठ ने नोटिस को रद्द करके बिल्कुल सही फैसला दिया था और खंडपीठ का नागरिकों को ऐसी अवैध जांच में शामिल होने का निर्देश देना गलत था।

शीर्ष अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ के 9 जनवरी 2020 के निर्णय और 16 जून 2023 के पुनर्विचार खारिज करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, 26 अप्रैल 2014 का विवादित नोटिस अपीलकर्ताओं की जमीन के संबंध में पूरी तरह से रद्द कर दिया गया। अदालत ने आदेश दिया कि दोनों पक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एम.आर.आर. सेट्टी (मृतक), विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाम कर्नाटक सरकार एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या एवं 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 23954-23955 / 2023)
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
निर्णय की तिथि: 2 सितंबर, 2026

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