पॉलिसी की शर्तें छिपाने पर इंश्योरेंस कंपनी पर जुर्माना, उपभोक्ता को 2.74 लाख रुपये लौटाने का निर्देश

तिरुवनंतपुरम केरल के तिरुवनंतपुरम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी पाया है। आयोग ने कंपनी को निर्देश दिया है कि वह एक पॉलिसीधारक को 2.74 लाख रुपये का प्रीमियम वापस करे। इसके साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए 10,000 रुपये का मुआवजा और 3,000 रुपये अदालती खर्च के तौर पर 30 दिनों के भीतर देने का आदेश दिया है। यह कार्रवाई तब की गई जब कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि उसने प्रस्ताव स्वीकार करने से पहले ग्राहक को नियम व शर्तों वाली पॉलिसी हैंडबुक मुहैया कराई थी।

आयोग के अध्यक्ष पी वी जयराजन और सदस्य प्रीथा जी नायर व वीजू वी आर की तीन सदस्यीय पीठ ने 20 अगस्त को पारित आदेश में कहा कि यह सामान्य क्लेम खारिज होने का मामला नहीं है, बल्कि विशेष परिस्थितियों वाला मामला है। पीठ के अनुसार, रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि प्रस्ताव फॉर्म स्वीकार करने से पहले शिकायतकर्ता को पॉलिसी से जुड़ी शर्तों की हैंडबुक सौंपी गई थी।

एजेंट के समझाने पर ली थी पॉलिसी

शिकायतकर्ता के अनुसार, बीमा कंपनी के प्रतिनिधियों ने उनसे संपर्क कर उन्हें अपनी ‘लाइफ गारंटीड इनकम प्रो’ पॉलिसी लेने के लिए राजी किया था। इसके बाद उन्होंने 2022 में अपनी बेटी के नाम पर यह पॉलिसी खरीदी और 22 फरवरी 2022 को जीएसटी सहित 3,09,145 रुपये का पहला वार्षिक प्रीमियम जमा किया।

उपभोक्ता का आरोप है कि पॉलिसी से जुड़ी अनिवार्य नियम और शर्तें पहले स्पष्ट नहीं की गई थीं। उन्होंने कंपनी से शर्तों वाली बुकलेट मांगी भी थी, लेकिन प्रीमियम का भुगतान होने के तीन महीने बाद उन्हें हैंडबुक उपलब्ध कराई गई।

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ब्रेन स्ट्रोक के बाद सरेंडर करने से इनकार

पॉलिसी लेने के कुछ समय बाद शिकायतकर्ता को अचानक ब्रेन स्ट्रोक आ गया। इसके चलते उनके चेहरे, हाथ और पैर में लकवा व सुन्नता आ गई, साथ ही चलने, बोलने और समझने में गंभीर दिक्कतें पैदा हो गईं। परिवार में अकेले कमाने वाले होने के कारण उनके सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया। सर्जरी, लगातार इलाज और दवाओं के भारी खर्च को देखते हुए वे आगे का प्रीमियम चुकाने में असमर्थ हो गए।

जब उन्होंने कंपनी से संपर्क कर पॉलिसी बंद करने और जमा की गई रकम लौटाने की मांग की, तो कंपनी ने नियमों का हवाला देते हुए उस चरण पर कोई भी प्रीमियम वापस करने से मना कर दिया। उपभोक्ता ने पहले इस मामले को इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के सामने उठाया और बाद में अपने वकीलों अजिता वी के नायर और सचिन वी एल के जरिए उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया।

खर्च काटकर बाकी रकम लौटाने का आदेश

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उपभोक्ता आयोग ने पाया कि नोटिस मिलने के बाद बीमा कंपनी के वकील पेश तो हुए, लेकिन कंपनी ने आरोपों के जवाब में कोई औपचारिक लिखित बयान दाखिल नहीं किया।

आयोग ने माना कि कंपनी के इस आचरण से उपभोक्ता को गंभीर मानसिक आघात और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि, पीठ ने यह भी स्वीकार किया कि पॉलिसी जारी करते समय कंपनी ने जीएसटी, दस्तावेजीकरण और एजेंट कमीशन जैसे जायज प्रशासनिक खर्च वहन किए थे। आयोग ने कंपनी को इन मदों के तहत 35,000 रुपये काटने की अनुमति दी और कुल जमा रकम में से शेष 2.74 लाख रुपये ग्राहक को लौटाने का निर्देश जारी किया।

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