कर्नाटक सरकार जीवित व्यक्तियों द्वारा किसी अनजान जरूरतमंद मरीज को निःस्वार्थ भाव (परोपकार) से अंगदान करने की अनुमति देने के लिए एक व्यापक नीति और नियामक दिशानिर्देश तैयार करने पर विचार कर रही है। राज्य सरकार ने सोमवार को हाईकोर्ट को इस संबंध में औपचारिक जानकारी दी।
यह जानकारी हाईकोर्ट द्वारा पिछले हफ्ते दिए गए उस निर्देश के बाद सामने आई, जिसमें सरकार से परोपकारी अंगदान (अल्ट्रुइस्टिक ऑर्गन डोनेशन) पर अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट करने को कहा गया था।
नीति बनने से अदालती प्रक्रिया और समय की होगी बचत
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सूरज गोविंदराज ने अतिरिक्त सरकारी वकील मोहम्मद जाफर शाह से कहा कि सरकार को इस विषय से अवगत करा दिया गया है और वह एक ठोस नीति तैयार करने के लिए उचित समय ले सकती है।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक तय व्यवस्था और नीति होने से अंगदान के इच्छुक लोगों को अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। इससे प्रक्रियागत देरी से बचा जा सकेगा और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को समय पर जीवनरक्षक अंग प्रत्यारोपण मिल सकेगा।
दावणगेरे के व्यवसायी की याचिका पर सुनवाई
यह पूरा मामला दावणगेरे जिले के 52 वर्षीय एक व्यवसायी की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने किसी जरूरतमंद अनजान व्यक्ति को स्वेच्छा से अपनी एक किडनी दान करने की इच्छा जताई है। याचिकाकर्ता ने केंगेरी स्थित एक निजी अस्पताल की प्राधिकरण समिति को अंगदान की मंजूरी देने का निर्देश जारी करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया था।
पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि निजी अस्पतालों को ऐसे मामलों में अंगदान की अनुमति देने का अधिकार नहीं है और इस पर फैसला लेने के लिए केवल राज्य सरकार ही सक्षम प्राधिकारी है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 8 सितंबर को स्वास्थ्य परीक्षण के लिए बेंगलुरु के विक्टोरिया अस्पताल स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नेफ्रोलॉजी के निदेशक के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया है। संस्थान को चिकित्सीय जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपनी होगी।
नवंबर 2025 में हाईकोर्ट ने तय किया था पहला मामला
हाईकोर्ट ने जीवित व्यक्ति द्वारा परोपकारी अंगदान की अनुमति का पहला मामला 25 नवंबर 2025 को तय किया था। उस दौरान अदालत ने बेंगलुरु के एक अस्पताल से जुड़ी 58 वर्षीय महिला डॉक्टर को बिना किसी आर्थिक मुआवजे या लाभ के अपनी एक किडनी जरूरतमंद मरीज को दान करने की अनुमति दी थी। अस्पताल की आंतरिक प्राधिकरण समिति के अध्यक्ष द्वारा अनुमति खारिज किए जाने के बाद महिला डॉक्टर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

