छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पदोन्नति और पदस्थापना के लिए मूल्यांकन का न्यूनतम बेंचमार्क तय करना पूरी तरह से विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) के exclusive अधिकार क्षेत्र और विवेक के अंतर्गत आता है। जस्टिस बिभू दत्त गुरु की एकल पीठ ने एडिशनल सुपरिनटेंडेंट ऑफ पुलिस (एडिशनल एसपी) के पद पर पदस्थापना के लिए चयन न किए जाने को चुनौती देने वाली एक महिला डिप्टी सुपरिनटेंडेंट ऑफ पुलिस (डीएसपी) की रिट याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि एक योग्य अधिकारी के पास पदोन्नति या पदस्थापना के लिए विचार किए जाने का अधिकार होता है, लेकिन केवल पात्रता मानदंड पूरा करने से पद पाने का कोई अटूट या निहित अधिकार हासिल नहीं हो जाता। चयन समिति द्वारा अपनाए गए मानदंडों में किसी भी प्रकार का मनमानापन, पक्षपात या प्रक्रियात्मक अवैधता न पाते हुए अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
मामला क्या है?
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, 2014 बैच की सीधी भर्ती डीएसपी माधुरी धीरही, जो वर्तमान में सीनियर स्केल में कार्यरत हैं, ने 10 दिसंबर 2025 की विभागीय पदोन्नति/स्क्रीनिंग कमेटी के फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता ने आठ वर्ष की अर्हता सेवा पूरी कर ली थी और वह छत्तीसगढ़ पुलिस कार्यपालिक (राजपत्रित) सेवा भर्ती तथा पदोन्नति नियम, 2005 के नियम 23 और अनुसूची-V के कॉलम (4) के तहत एडिशनल एसपी के पद पर पदस्थापना के लिए निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा करती थीं।
हालांकि, दिसंबर 2025 में हुई अपनी स्क्रीनिंग बैठक के दौरान डीपीसी ने उन्हें पदस्थापना के लिए “योग्य नहीं” (नॉट फिट) घोषित कर दिया था। डीपीसी ने पिछले पांच वर्षों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) के आधार पर न्यूनतम “गुड” ग्रेडिंग और कुल मिलाकर न्यूनतम 15 अंकों का बेंचमार्क तय किया था। याचिकाकर्ता को चार “वेरी गुड” ग्रेडिंग (प्रत्येक के लिए 3 अंक) और एक “गुड” ग्रेडिंग (2 अंक) प्राप्त हुई थी, जिससे उनका कुल योग 14 अंक हुआ। 15 अंकों की आवश्यक सीमा से 1 अंक कम रहने के कारण चयन समिति ने उन्हें अनफिट पाया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक रंजन तिवारी और अधिवक्ता अतुल कुमार केशरी ने तर्क दिया कि धीरही 2005 के नियमों के नियम 23 के तहत निर्धारित सभी वैधानिक पात्रता शर्तों को पूरा करती हैं। उन्होंने दलील दी कि डीपीसी ने नियमों में किसी वैधानिक आधार के बिना मनमाने ढंग से “गुड” श्रेणी के तहत 15 अंकों का बेंचमार्क लागू कर दिया, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। वकील ने कहा कि पांच वर्षों में 15 अंकों की आवश्यकता का व्यावहारिक अर्थ यह था कि अधिकारी को पांचों वर्षों के लिए “वेरी-गुड” ग्रेडिंग के बराबर अंक लाने होंगे। उन्होंने 5 सितंबर 1974 के तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार के एक परिपत्र का भी हवाला दिया जिसमें “गुड” के लिए 8 से 12 अंकों का बेंचमार्क निर्धारित था, और उल्लेख किया कि 2014 से 2017 तक के वर्षों में डीपीसी ने न्यूनतम 10 अंकों का बेंचमार्क रखा था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे शासकीय अधिवक्ता विवेक वर्मा ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि केवल पात्रता शर्तों को पूरा करने से अधिकारी को विचार किए जाने का अधिकार मिलता है, न कि पदस्थापना का कोई स्वचालित अधिकार। राज्य ने प्रस्तुत किया कि डीपीसी एक विशेषज्ञ निकाय है जो सेवा अभिलेखों और एसीआर के आधार पर उपयुक्तता तय करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने कहा कि 15 अंकों का बेंचमार्क छत्तीसगढ़ लोक सेवा (पदोन्नति) नियम, 2003 और प्रचलित प्रथा के अनुसार अपनाया गया था। हाईकोर्ट के 29 जुलाई 2026 के आदेश के अनुपालन में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रशासन) द्वारा दायर हलफनामे में यह पुष्टि की गई कि 15 अंकों का मानदंड एडिशनल एसपी के पद की जिम्मेदारी और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष रूप से तय किया गया था और सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू किया गया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
नियम 23 का विश्लेषण करते हुए जस्टिस बिभू दत्त गुरु ने माना कि यद्यपि पात्रता पूरी करने वाले अधिकारी को विचार किए जाने का अधिकार है, लेकिन यह पदस्थापना का कोई निहित अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि डीपीसी समान और वस्तुनिष्ठ मानकों को लागू करके उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन करने के लिए गठित विशेषज्ञ निकाय है। अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करते हुए अदालतें चयन समिति के फैसलों पर अपील अदालत के रूप में काम नहीं करती हैं।
हाईकोर्ट ने चयन बेंचमार्क से संबंधित मुख्य कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा:
“बेंचमार्क तय करना पूरी तरह से डीपीसी/चयन समिति के विशेष अधिकार क्षेत्र और विवेक के भीतर आता है। सामान्य तौर पर, इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता जब तक कि इसे मनमाना, भेदभावपूर्ण या किसी वैधानिक प्रावधान के विपरीत न दिखाया जाए।”
अपने निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णयों का उल्लेख किया:
- यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ए.के. नरूला (2007) 11 SCC 10 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी:
- “दिशा-निर्देश डीपीसी को यह प्रावधान करके कुछ छूट (प्ले इन द जॉइंट्स) देते हैं कि उसे गोपनीय रिपोर्टों में दर्ज समग्र ग्रेडिंग से ही संचालित होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वह उन प्रविष्टियों के आधार पर अपना मूल्यांकन कर सकती है। डीपीसी के लिए यह आवश्यक है कि वह एक ही मानक, मापदंड और मानदंडों को अपनाकर प्रत्येक उम्मीदवार के प्रदर्शन का अलग-अलग समग्र मूल्यांकन करे। चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है जब मूल्यांकन की प्रक्रिया पक्षपात, दुर्भावना या मनमानेपन के आधार पर दूषित हो। जहां डीपीसी ने सभी उम्मीदवारों पर एक ही मापदंड और नियम लागू करके निष्पक्ष और उचित तरीके से कार्रवाई की है, वहां अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी।”
- बी.वी. शिवैया एवं अन्य बनाम के. अद्दंकी बाबू एवं अन्य (1998) 6 SCC 720 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
- “इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि पदोन्नति के मामले में ‘वरिष्ठता-सह-योग्यता’ का मापदंड यह मांग करता है कि प्रशासन की दक्षता के लिए आवश्यक न्यूनतम योग्यता होने पर, वरिष्ठ व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाएगी और योग्यता का तुलनात्मक मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं है। न्यूनतम आवश्यक योग्यता का आकलन करने के लिए, सक्षम प्राधिकारी न्यूनतम मानक निर्धारित कर सकता है और पदोन्नति के लिए पात्र कर्मचारी की योग्यता के मूल्यांकन का तरीका भी तय कर सकता है।”
- दलपत आबासाहेब सालुंके बनाम बी.एस. महाजन (1990) 1 SCC 305 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था:
- “यह कहना अनावश्यक है कि चयन समितियों के निर्णयों पर अपील सुनना और उम्मीदवारों की आपेक्षित योग्यता का विश्लेषण करना अदालत का काम नहीं है। कोई उम्मीदवार किसी विशिष्ट पद के लिए उपयुक्त है या नहीं, इसका निर्णय विधिवत गठित चयन समिति द्वारा किया जाना चाहिए जिसके पास इस विषय की विशेषज्ञता है। अदालत के पास ऐसी विशेषज्ञता नहीं है। चयन समिति के निर्णय में केवल सीमित आधारों पर ही हस्तक्षेप किया जा सकता है, जैसे कि समिति के गठन या उसकी प्रक्रिया में अवैधता या स्पष्ट तात्विक अनियमितता जो चयन को दूषित करती हो।”
इन पूर्व उदाहरणों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि डीपीसी ने उपयुक्तता का न्यूनतम मानक तय करके अपने अधिकारों के भीतर काम किया है। याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहीं कि 15 अंकों का बेंचमार्क भेदभावपूर्ण तरीके से लागू किया गया था या प्रक्रिया में कोई पक्षपात था।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि डीपीसी अधिकारियों की उपयुक्तता का आकलन करने के लिए एक उचित न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित करने के लिए पूर्णतः सक्षम थी। चूंकि याचिकाकर्ता ने आवश्यक 15 अंकों के बेंचमार्क के मुकाबले 14 अंक प्राप्त किए थे, इसलिए उन्हें “योग्य नहीं” ठहराया जाना कानून के अनुकूल था। याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका को निरस्त कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: माधुरी धीरही बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 4177/2026
पीठ: जस्टिस बिभू दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 25 अगस्त 2026

