उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद द्वारा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (यूपीरेरा) के रिकवरी आदेश का पूर्ण पालन न करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने वसूली आदेश से कम राशि का चेक सौंपने पर सख्त नाराजगी जताते हुए परिषद के आवास आयुक्त को मंगलवार सुबह 10:15 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया है।
रिकवरी सर्टिफिकेट से कम रकम का चेक देने पर सवाल
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी यूपीरेरा और हाईकोर्ट की कार्यवाहियों को बेहद हल्के में ले रहे हैं।
यह मामला गृह खरीदार अशोक कुमार सिंह की याचिका से जुड़ा है। परिषद ने सोमवार को अदालत में अनुपालन हलफनामा दाखिल कर बताया कि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के नाम 23,71,126 रुपये का चेक तैयार कर याचिकाकर्ता के वकील को दिया जा रहा है।
अदालत ने नियमानुसार बिना किसी नए आदेश का इंतजार किए इस राशि को याचिकाकर्ता को जारी करने की अनुमति दे दी। हालांकि, पीठ ने इस बात पर कड़ा एतराज जताया कि जब वैधानिक प्राधिकरण (यूपीरेरा) का रिकवरी सर्टिफिकेट 26,58,806.01 रुपये का था, तो चेक की राशि कम क्यों रखी गई।
परिषद के वकील ने अदालत को बताया कि विभाग ने अपने स्तर पर आंतरिक गणना की थी। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि कोई राज्य निकाय किसी वैधानिक प्राधिकरण द्वारा तय की गई राशि के विपरीत अपनी स्वतंत्र गणना कैसे लागू कर सकता है। अदालत ने नोट किया कि परिषद की ओर से कोई सन्तोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया और न ही हलफनामे के साथ गणना का कोई ब्योरा (कैलकुलेशन शीट) संलग्न किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद अशोक कुमार सिंह द्वारा यूपीरेरा के समक्ष दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था, जिस पर नियामक संस्था ने 29 जुलाई 2025 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। आदेश का अनुपालन न होने पर यूपीरेरा ने 27 मई 2026 को 26.58 लाख रुपये से अधिक का रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया था।
स्थानीय राजस्व अधिकारियों द्वारा रिकवरी की प्रक्रिया पूरी न करने पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। इस पर 7 अगस्त को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने आवास बोर्ड को 10 दिनों के भीतर पूरी राशि जमा करने का निर्देश दिया था और चेतावनी दी थी कि आदेश का पालन न होने पर आवास आयुक्त को अदालत में हाजिर होना पड़ेगा।

