बिना साक्ष्य जीवनभर पुलिस निगरानी असंवैधानिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की क्लास-बी हिस्ट्रीशीट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ खोली गई क्लास-बी हिस्ट्रीशीट को खारिज करते हुए कहा है कि बिना पुख्ता आधार के किसी नागरिक को जीवनभर पुलिस निगरानी में रखना उसके मौलिक अधिकारों का गंभीर हनन है। अदालत ने पाया कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां यह साबित करने में विफल रहीं कि याचिकाकर्ता कोई आदतन या पेशेवर अपराधी है, जिसे सतत राज्य निगरानी की आवश्यकता हो।

जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने 14 अगस्त के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही या बिना विचार किए दी गई स्वीकृतियों के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर आजीवन पाबंदी नहीं लगाई जा सकती।

बिना विचार दिए रबर स्टैंप की तरह मंजूरी

मामले की समीक्षा करते हुए पीठ ने देखा कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) ने 27 फरवरी 2020 को बिना किसी ठोस तथ्य या सामग्री का मूल्यांकन किए केवल औपचारिक रूप से रबर स्टैंप की तरह प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी।

अदालत ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कुल आठ आपराधिक मामले दर्ज थे, जो अलग-अलग समय के और असंबद्ध थे। इनमें से अधिकांश मामले जमानत, समझौते या पूर्ण दोषमुक्ति के साथ समाप्त हो चुके थे। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अंतिम अपराध 2015 में दर्ज हुआ था, जिसके बाद 2020 में हिस्ट्रीशीट खोले जाने तक के पांच वर्षों के दौरान उसका रिकॉर्ड पूरी तरह साफ रहा।

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पेशेवर अपराधी की श्रेणी में नहीं आता मामला

उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन के नियम 228, 229 और 232 का अध्ययन करने के बाद पीठ ने पाया कि क्लास-बी हिस्ट्रीशीट विशेष रूप से ‘पुष्ट और पेशेवर अपराधियों’ के लिए होती है। इसमें पेशेवर ठग, जेबकतरे, जाली दस्तावेज बनाने वाले, तस्कर, भाड़े के गुंडे और असामाजिक तत्व शामिल हैं।

अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता का पिछला रिकॉर्ड यह तो दर्शाता है कि वह कानूनी विवादों में पड़ता रहा है, लेकिन पुलिस के हलफनामे में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो उसमें अपराध के प्रति पेशेवर रुख सिद्ध करता हो।

संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लंघन

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हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सतत पुलिस निगरानी से नागरिक के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है। यह संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत guaranteed व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और आवाजाही के अधिकारों का गंभीर रूप से हनन करता है।

पीठ ने माना कि अत्यंत गंभीर और खूंखार अपराधियों के मामलों में जनहित को व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर रखा जा सकता है, लेकिन ऐसे मामलों का चयन अत्यंत सावधानी और संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, प्रशासनिक असावधानी के आधार पर किसी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी को अनिश्चितकाल के लिए सीमित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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