जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 1993 के एक हत्या के मामले में नेपाल सिंह की सजा को रद्द करते हुए कहा कि एक ही तरह के साक्ष्यों और समान भूमिका के आधार पर निचली अदालतें बिना कोई स्पष्ट कारण दिए कुछ आरोपियों को सजा देने और अन्य को बरी करने का रुख नहीं अपना सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष के मुख्य चश्मदीद गवाहों की गवाही परस्पर विरोधाभासों और बनावटी बातों से भरी थी, जिससे वह विश्वास के योग्य नहीं रह जाती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मध्य प्रदेश के दमोह जिले के हट्टा थाना में दर्ज प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) संख्या 6/1993 से जुड़ा है, जो भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 147, 148, 149 और 307 के तहत दर्ज की गई थी। अभियोजन के अनुसार, 6 जनवरी 1993 को छह आरोपियों ने घातक हथियारों से लैस होकर एक गैरकानूनी सभा बनाई और गफलू तथा भरत सिंह पर हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया, जिससे गफलू की मृत्यु हो गई।
इस मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया गया था। अपने पक्ष को साबित करने के लिए अभियोजन ने 17 गवाहों का परीक्षण किया। सुनवाई के बाद, ट्रायल कोर्ट ने पांच आरोपियों—झाल्लू, करोड़ी, संजू, उज्जू उर्फ उज्जियार और हन्नू उर्फ हनुमत—को बरी कर दिया, जबकि एक सह-आरोपी प्रकाश पटेरिया की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई। शेष पांच आरोपियों, जिनमें अपीलकर्ता नेपाल सिंह भी शामिल था, को आईपीसी की धारा 148, 324/149 और 302/149 के तहत दोषी ठहराया गया।
मध्य प्रदेश राज्य ने पांच सह-आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती नहीं दी। हालांकि, दोषियों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, जिसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर पीठ) ने 8 मार्च 2018 को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि डॉ. पी.डी. करगइयां (पीडब्लू-14) के चिकित्सीय साक्ष्य से गफलू की मौत की पुष्टि तो होती है, लेकिन मुख्य प्रश्न यह तय करना था कि इस घटना में वास्तव में कौन-कौन शामिल था।
दोषियों की संलिप्तता साबित करने के लिए अभियोजन ने पीडब्लू-6 (घायल चश्मदीद गवाह और मृतक का बेटा) और पीडब्लू-7 (मृतक की पत्नी) की गवाही पर भरोसा जताया। हालांकि मुख्य परीक्षा में उन्होंने बिना किसी उकसावे के हमले का दावा किया था, लेकिन पीठ ने पाया कि जिरह के दौरान उनके बयानों में गंभीर विरोधाभास और बनावटी बातें सामने आईं।
जिरह के दौरान पीडब्लू-6 ने स्वीकार किया कि पक्षों के बीच पहले से विवाद चल रहा था और मृतक गफलू खुद एक पुरानी घटना में आरोपी था। पीडब्लू-6 ने दावा किया कि पहली चोट लगते ही वह बेहोश हो गया था, लेकिन इसके बावजूद उसने यह ब्योरा दिया कि किस हमलावर ने किस हथियार से वार किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीडब्लू-6 ने स्वीकार किया:
“मैंने अपने पिता को फरसा मारते हुए व्यक्तिगत रूप से नहीं देखा।”
इसी तरह, पीडब्लू-7 ने भी चश्मदीद होने के अपने शुरुआती दावे का खंडन करते हुए जिरह में स्वीकार किया:
“कहासुनी वाले दिन, मैं घर पर अपने बच्चों को खाना खिला रही थी, तभी मुझे घर के भीतर शोर सुनाई दिया कि खेत में मेरे पति और बेटे पर हमला हुआ है। मैं गांव के कई लोगों के साथ तुरंत मौके की ओर भागी।”
अदालत ने माना कि पीडब्लू-7 तब मौके पर पहुंची जब उसके पति को पहले ही खाट पर लेटा दिया गया था, जिससे घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखने का उसका दावा गलत साबित होता है। इसके अलावा, पीठ ने टिप्पणी की कि पीडब्लू-8 और पीडब्लू-9, जिन्होंने कथित तौर पर घटना देखने का दावा किया था, जिरह के विश्लेषण से अभियोजन द्वारा गढ़े गए गवाह प्रतीत होते हैं।
लाठी, फरसा और बल्लम जैसे हथियारों की बरामदगी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल हथियारों की बरामदगी से आरोपियों का अपराध से संबंध स्थापित नहीं हो जाता, क्योंकि ऐसे उपकरण ग्रामीण इलाकों के घरों में सामान्य रूप से पाए जाते हैं। पूर्व में चले आ रहे भूमि विवाद और शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा आरोपियों द्वारा जोती जा रही जमीन के मालिक पर पहले किए गए हमले के मद्देनजर अदालत ने कहा कि आरोपियों को झूठे मामले में फंसाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
निचली अदालतों के फैसलों की मुख्य विधिक त्रुटि को उजागर करते हुए पीठ ने माना कि एक ही प्रकार के तथ्यों और बयानों में सभी आरोपियों को समान भूमिका दी गई हो, तो या तो सभी को सजा होनी चाहिए या सभी को बरी किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने ऐसा कोई कारण नहीं बताया कि पांच सह-आरोपियों को बरी करने के लिए अपनाए गए तर्क का लाभ दोषियों को क्यों नहीं दिया जा सकता था।
अदालत का फैसला
यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही पर विश्वास नहीं किया जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता नेपाल सिंह की सजा को रद्द कर दिया। पीठ ने 8 मार्च 2018 के हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि यदि आरोपी जेल में है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए तथा उसके जमानत बांड रद्द किए जाएं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नेपाल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 2239-2240 / 2026
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 17 अगस्त 2026

