इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने माना है कि पूर्व विभागीय अनुमति के बिना पहली शादी के कायम रहते दूसरी शादी करना केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) नियमावली, 1955 के नियम 15 और केंद्रीय सिविल सेवाएं (आचरण) नियमावली, 1964 के नियम 21 के तहत कदाचार है और इसके लिए सीआरपीएफ अधिनियम, 1949 की धारा 11(1) के तहत सेवा से बर्खास्तगी की सजा दी जा सकती है। सेवा से हटाए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली पूर्व सीआरपीएफ कॉन्स्टेबल की रिट याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 11 के तहत बर्खास्तगी की सजा कानूनी रूप से दी जा सकती है और अनुशासित बल में बहुविवाह के लिए यह सजा असंगत नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को वर्ष 1988 में सीआरपीएफ में कॉन्स्टेबल (जल वाहक) के पद पर नियुक्त किया गया था। भर्ती से पूर्व, वर्ष 1976 में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उसका विवाह हुआ था और उस शादी से उसके बच्चे भी थे। भर्ती के बाद, वर्ष 1989 में उसकी पहली पत्नी बच्चों के साथ घर छोड़कर चली गई और काफी तलाश के बावजूद उसका कोई सुराग नहीं मिला।
वर्ष 1992 में याचिकाकर्ता ने विभाग को सूचित किए बिना और पूर्व अनुमति लिए बिना दूसरा विवाह कर लिया। उसने बाद में अपनी दूसरी पत्नी को सर्विस रिकॉर्ड में नॉमिनी के रूप में दर्ज करा दिया, लेकिन यह खुलासा नहीं किया कि वह उसकी दूसरी पत्नी है और न ही उसने पहली पत्नी का कोई उल्लेख किया।
मामले की जानकारी सामने आने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई और 8 जनवरी 2011 को आरोप पत्र जारी किया गया। जांच के दौरान याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि पहली शादी के कायम रहते हुए ही उसने 1992 में दूसरा विवाह किया था। जांच अधिकारी ने 6 जून 2011 की रिपोर्ट में आरोपों को सिद्ध माना। 14 जून 2011 को कारण बताओ नोटिस और व्यक्तिगत सुनवाई के बाद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी (कमांडेंट, 101 बटालियन, आरएएफ/सीआरपीएफ) ने 8 जुलाई 2011 को सीआरपीएफ नियम 15 के साथ पठित सीआरपीएफ अधिनियम की धारा 11(1) के तहत याचिकाकर्ता को सेवा से हटाने का आदेश दिया।
विभागीय अपील को उप महानिरीक्षक (डीआईजी), सीआरपीएफ, नई दिल्ली ने 4 जून 2013 को और पुनरीक्षण याचिका को महानिरीक्षक (आईजी), आरएएफ/सीआरपीएफ, नई दिल्ली ने 13 दिसंबर 2013 को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी और अपीलीय व पुनरीक्षण आदेशों को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि दूसरी शादी के बाद सर्विस रिकॉर्ड में नॉमिनी का नाम दर्ज कराकर विभाग को सूचित कर दिया गया था। इसके बावजूद कई वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की गई और अचानक 2011 में जांच शुरू कर दी गई। याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि यदि दूसरी शादी का आरोप साबित भी होता है, तो भी सीआरपीएफ अधिनियम की धारा 11(1) के खंड (ए) से (ई) के तहत केवल छोटी सजाएं ही दी जा सकती हैं—जैसे पद अवनति, एक महीने के वेतन तक का जुर्माना, क्वार्टर या गार्ड में नजरबंदी या विशेष पद से हटाना। सेवा से बर्खास्तगी की सजा अत्यधिक, असंगत और धारा 11 के तहत गैर-कानूनी है।
वहीं, प्रतिवादी पक्ष के वकील ने दलील दी कि सीआरपीएफ नियमावली का नियम 15 स्पष्ट रूप से बहुविवाह को प्रतिबंधित करता है, जब तक कि पर्सनल लॉ में इसकी अनुमति न हो और विभाग से पूर्व अनुमति न ली गई हो। एक अनुशासित बल के सदस्य से उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षा की जाती है और पहली शादी के रहते दूसरा विवाह करने वाला व्यक्ति सेवा में बने रहने की पात्रता खो देता है। प्रतिवादियों ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 11 में प्रयुक्त शब्द “निलंबन या बर्खास्तगी के स्थान पर, या इसके अतिरिक्त” यह साबित करते हैं कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी को कदाचार के लिए बर्खास्तगी की सजा देने का पूर्ण अधिकार है।
अदालत का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता और उसकी पहली पत्नी दोनों हिंदू हैं और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आते हैं। इस कानून में सक्षम अदालत से तलाक की डिग्री प्राप्त किए बिना पहली शादी के रहते दूसरा विवाह करना पूरी तरह प्रतिबंधित है और ऐसा विवाह शुरू से ही शून्य (void ab initio) होता है।
अदालत ने सीआरपीएफ नियमावली, 1955 के नियम 15 का विश्लेषण किया, जिसमें प्रावधान है:
“15. बहुविवाह .- बल का कोई भी सदस्य, जिसकी पत्नी जीवित है, सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना कोई अन्य विवाह नहीं करेगा, भले ही ऐसा दूसरा विवाह बल के सदस्य पर लागू होने वाले पर्सनल लॉ के तहत अनुमेय ही क्यों न हो।”
कोर्ट ने केंद्रीय सिविल सेवाएं (आचरण) नियमावली, 1964 के नियम 21 का भी उल्लेख किया जो जीवित पति या पत्नी के रहते दूसरे विवाह पर रोक लगाता है। दोनों नियमों को पढ़ते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवारत कर्मचारी का बिना अनुमति दूसरा विवाह करना कदाचार है जो सीआरपीएफ अधिनियम की धारा 11 के तहत दंडनीय है।
धारा 11(1) के तहत बर्खास्तगी के अधिकार पर उठाए गए सवालों को खारिज करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय यूनियन ऑफ इंडिया बनाम गुलाम मोहम्मद भट (2005) 13 SCC 228 का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी:
“धारा 11(1) के खंड (ए) से (ई) से पहले प्रयुक्त शब्द ‘निलंबन या बर्खास्तगी के स्थान पर, या इसके अतिरिक्त’ यह दर्शाते हैं कि इसमें निर्दिष्ट अधिकारियों को दोषी पाए गए बल के सदस्य को बर्खास्तगी या निलंबन की सजा देने का अधिकार है, और इसके अतिरिक्त या इसके स्थान पर खंड (ए) से (ई) में उल्लेखित सजाएं भी दी जा सकती हैं।”
कोर्ट ने आगे गुलाम मोहम्मद भट मामले का पुनरोलेख करते हुए कहा:
“…धारा 11 केवल उन छोटी सजाओं से संबंधित है जो विभागीय जांच में दी जा सकती हैं और इसका स्पष्ट अध्ययन यह पूरी तरह साफ करता है कि इसके तहत बर्खास्तगी की सजा निश्चित रूप से दी जा सकती है, भले ही दोषी पर धारा 9 या धारा 10 के तहत किसी अपराध का मुकदमा न चलाया गया हो।”
कदाचार के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय एम. एम. मल्होत्रा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2005) 8 SCC 351 का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:
“‘कदाचार’ शब्द की कोई एक सटीक परिभाषा नहीं दी जा सकती। लेकिन सटीक परिभाषा न होने के बावजूद, ‘कदाचार’ का अर्थ संदर्भ, कर्तव्य के पालन में कोताही और अनुशासन तथा सेवा की प्रकृति पर उसके प्रभाव से तय होता है। आरोपित कार्य में एक निषिद्ध गुणवत्ता या आचरण होना चाहिए और इसके दायरे को कानून के उद्देश्य तथा लोक हित के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।”
क्या अनुशासित बल में बहुविवाह के लिए बर्खास्तगी की सजा असंगत है, इस प्रश्न पर हाईकोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णय यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रामा शंकर (2012 SCC OnLine Gau 943) पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था:
“जब कानून द्वारा बहुविवाह को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है, तो बहुविवाह के साबित आरोप पर सेवा से बर्खास्तगी की सजा को इस आधार पर असंगत नहीं कहा जा सकता कि आपराधिक कानून में बहुविवाह एक शमनीय अपराध है, खासकर तब जब कर्मचारी असम राइफल्स जैसे अनुशासित बल का सदस्य हो। ऐसे व्यक्ति को बल में बनाए रखने से बल की समग्र छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे जनता में यह संदेश जा सकता है कि बहुविवाह का दोषी व्यक्ति भी बल का सदस्य बना रह सकता है। इसके अलावा, इसका बल के मनोबल और अनुशासन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।”
अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अपने पूर्व निर्णय वीर पाल सिंह बनाम वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आगरा (2006 (5) ALJ 307) का भी उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि बहुविवाह का दोषी सरकारी सेवक कम सजा देकर सेवा में नहीं बनाए रखा जा सकता।
सर्विस रिकॉर्ड में नॉमिनी बनाए जाने के तर्क पर कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि उसने विभाग को यह सूचित किया था कि वह उसकी दूसरी पत्नी है। कोर्ट ने इसे याचिकाकर्ता द्वारा जानबूझकर तथ्य छिपाना माना।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता पर बहुविवाह का आरोप पूरी तरह सिद्ध हो चुका है और सीआरपीएफ अधिनियम की धारा 11(1) के तहत सेवा से बर्खास्तगी की सजा कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है। यह सजा न तो अत्यधिक है, न ही असंगत है और न ही अदालत की आत्मा को झकझोरने वाली है। इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: प्रभु सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं 3 अन्य
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 14282 / 2014
पीठ: जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता
निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026

