नीट-यूजी (NEET-UG) 2026 की एक अभ्यर्थी को बड़ी राहत देते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु चिकित्सा चयन प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह छात्रा को अपना मसीही (ईसाई) धार्मिक अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र अपलोड करने की अनुमति दे। इस आदेश के बाद अब यह छात्रा सत्र 2026-27 के लिए एमबीबीएस दाखिला प्रक्रिया में धार्मिक अल्पसंख्यक श्रेणी के तहत हिस्सा ले सकेगी।
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की पीठ ने 11 अगस्त को इस मामले में आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को मैनेजमेंट कोटे के तहत मसीही अल्पसंख्यक श्रेणी में शामिल करने से मेरिट सूची में मौजूद किसी भी अन्य उम्मीदवार के हितों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।
ऑनलाइन फॉर्म में हुई थी अनजाने में गलती
मामले के अनुसार, वैध धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र रखने वाली इस अभ्यर्थी ने ऑनलाइन आवेदन भरते समय गलती से ‘अल्पसंख्यक श्रेणी’ के कॉलम में ‘यस’ की जगह ‘नो’ का विकल्प चुन लिया था। गलती का अहसास होने पर छात्रा ने 7 अगस्त 2026 को अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर पोर्टल दोबारा खोलने और प्रमाण पत्र अपलोड करने देने का अनुरोध किया था। जब अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की, तो उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष एक पूर्व फैसले का हवाला दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने तेलुगु भाषाई अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र अपलोड करने से चूके एक अन्य छात्र को इसी तरह राहत प्रदान की थी।
राज्य सरकार ने किया था याचिका का विरोध
राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि आवेदन की अंतिम तिथि 26 जून थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 27 जुलाई 2026 किया गया था। सरकारी पक्ष की दलील थी कि 13 अगस्त से काउंसलिंग शुरू हो रही है, ऐसे में इस चरण में आवेदन में संशोधन की अनुमति देने से पूरी चयन प्रक्रिया प्रभावित होगी।
अधिकारियों ने दाखिला विवरणिका (प्रॉस्पेक्टस) के नियमों का भी हवाला दिया, जिसके अनुसार अल्पसंख्यक श्रेणी का दावा करने वाले अभ्यर्थियों को शुरुआती आवेदन के साथ ही दस्तावेज अपलोड करने होते हैं और बाद में किए गए दावों को स्वीकार न करने का प्रावधान है।
मेरिट सूची पर नहीं पड़ेगा प्रभाव
मामले के तमाम दस्तावेजों और तर्कों का समीक्षा करने के बाद जस्टिस गौरी ने पाया कि छात्रा केवल मैनेजमेंट कोटे के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक सीट पर दाखिला पाने की कोशिश कर रही है। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि छात्रा को इस मानवीय भूल को सुधारने का मौका देने से किसी भी मेधावी छात्र का हक प्रभावित नहीं होगा। अदालत ने चयन प्राधिकरण को छात्रा का प्रमाण पत्र स्वीकार कर उसे प्रक्रिया में शामिल करने का स्पष्ट निर्देश दिया।

