लिखित कारणों के बिना गिरफ्तारी असंवैधानिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया रिमांड आदेश, आरोपी की रिहाई के निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित में गिरफ्तारी के स्पष्ट कारण न बताना संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिले अधिकारों का सीधे तौर पर उल्लंघन है। इस आधार पर अदालत ने एक आरोपी के न्यायिक रिमांड आदेश को निरस्त करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है। 27 जुलाई को आए इस फैसले में पीठ ने माना कि बिना ठोस तथ्य बताए किसी को भी हिरासत में रखना गैरकानूनी है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने याचिकाकर्ता की उस अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश सुनाया, जिसमें उसने 20 अप्रैल 2025 को हुई अपनी गिरफ्तारी और उसके बाद जारी रिमांड आदेश को चुनौती दी थी।

लिखित आधार न देना मौलिक अधिकारों का हनन

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मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय उसे कोई लिखित कारण नहीं सौंपा। अरेस्ट मेमो में केवल ‘अपराध रोकने’ या ‘जांच में सहयोग’ जैसी सामान्य बातें लिखी गई थीं, जिससे आरोपी को यह पता ही नहीं चल सका कि उसे किस विशिष्ट मामले और किन तथ्यों के तहत पकड़ा गया है। इस कारण वह न तो रिमांड का विरोध कर सका और न ही अपने बचाव की तैयारी कर पाया।

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी पर गंभीर आरोप हैं और पुलिस ने पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया है। सरकार ने अरेस्ट मेमो और जनरल डायरी (GD) की प्रविष्टियों को पेश किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इन दस्तावेजों में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि आरोपी को अदालत में पेश करने से पहले लिखित में गिरफ्तारी के ठोस कारण दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अपना यह संवैधानिक दायित्व निभाने में विफल रही है।

मशीनी तरीके से रिमांड देने पर निचली अदालत को फटकार

हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड मंजूर करने के तरीके पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने टिप्पणी की कि निचली अदालत के मजिस्ट्रेट ने पूर्व-मुद्रित (प्री-प्रिंटेड) फॉर्म का उपयोग करते हुए यांत्रिक रूप से रिमांड आदेश जारी कर दिया और यह जांचने की जहमत नहीं उठाई कि अनुच्छेद 22(1) की अनिवार्य शर्तों का पालन हुआ है या नहीं।

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अदालत ने आरोपी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 91 के तहत मुचलका जमा करने पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही यह साफ किया कि इस फैसले से मामले की चल रही जांच या मुकदमे (ट्रायल) पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हाईकोर्ट ने भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के लिए संभल के सत्र न्यायाधीश को निर्देश जारी किया कि वे यह सुनिश्चित करें कि क्षेत्र के मजिस्ट्रेट पुलिस या न्यायिक रिमांड देने से पहले लिखित कारणों की जांच अनिवार्य रूप से करें।

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