कोझिकोड स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बार-बार खराब होने वाला नाव का इंजन बेचने और सेवा में लापरवाही बरतने के मामले में एक विक्रेता को दोषी ठहराया है। आयोग ने कंपनी को एक दिव्यांग मछुआरे को उसके इंजन की पूरी कीमत 47,500 रुपये लौटाने और 10,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
प्रिया एस. की अध्यक्षता और वी. बालकृष्णन की सदस्यता वाली पीठ ने 27 जुलाई को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि लगातार खराब उपकरण बेचने और सेवा न देने से शिकायतकर्ता को भारी मानसिक पीड़ा और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। आयोग ने स्पष्ट किया कि उत्पाद में बार-बार खराबी आने के कारण पीड़ित उपभोक्ता रिफंड और वित्तीय हर्जाना पाने का पूरा हकदार है।
समुद्र के बीच बार-बार बंद होता रहा इंजन
शिकायतकर्ता ने फरवरी 2025 में 47,500 रुपये में दो साल की वारंटी वाला जापानी तकनीक का एक मरीन इंजन खरीदा था। कंपनी के तकनीशियनों ने इस इंजन को उनकी नाव में फिट किया। कुछ दिनों तक काम करने के बाद रमजान और विशु त्योहार की छुट्टियों के कारण मछली पकड़ने का काम कुछ समय के लिए रुका रहा।
जब मछुआरे ने दोबारा काम शुरू किया, तो समुद्र के बीच इंजन में बार-बार खराबी आने लगी। इस वजह से वह लहरों के बीच फंस गए और कम से कम तीन अलग-अलग मौकों पर दूसरे मछुआरों ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला। कंपनी के कर्मचारियों ने जांच के बाद खराबी का कारण खराब पेट्रोल या तेल को बताया। उन्होंने मरम्मत की और बाद में कार्बोरेटर भी बदला, लेकिन इसके बावजूद इंजन ठीक से काम नहीं कर पाया।
कंपनी की लापरवाही और आयोग का रुख
इंजन की खराबी दूर न होने पर मछुआरे ने इसे बदलने या पैसे वापस करने का अनुरोध किया, लेकिन विक्रेता ने इसे खारिज कर दिया। कंपनी का दावा था कि इंजन में कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट नहीं है। इस बीच, विक्रेता ने खरीद की रसीद देने में भी काफी देरी की। जब आजीविका का साधन पूरी तरह ठप हो गया, तो पीड़ित ने उपभोक्ता फोरम का रुख किया और रिफंड के साथ-साथ 1 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष अदालत में हाजिर नहीं हुआ और न ही कोई लिखित जवाब दाखिल किया। इसके बाद आयोग ने एकतरफा सुनवाई करते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला दिया। पीड़ित मछुआरे ने अपनी बात साबित करने के लिए विकलांगता प्रमाणपत्र, टैक्स इनवॉइस, ओनर मैनुअल, कार्बोरेटर की तस्वीरें, इंजन का वीडियो और मौखिक गवाही पेश की।
अपने निर्णय में आयोग ने रेखांकित किया कि विक्रेता कंपनी आरोपों को खारिज करने या यह साबित करने में विफल रही कि उसने खराबी को ठीक कर दिया था। पीठ ने कहा कि यदि कोई उत्पाद उपभोक्ता की आजीविका छीन रहा हो और लगातार निष्फल साबित हो रहा हो, तो कंपनियां बार-बार मरम्मत का बहाना बनाकर रिफंड या रिप्लेसमेंट देने की अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं।

