जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 6,150 विलो क्लेफ्ट्स (क्रिकेट बैट बनाने की लकड़ी) और एक परिवहन वाहन को जब्त करने वाले प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि से पहले किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति को जब्त करना गैरकानूनी है। जस्टिस एमए चौधरी की पीठ ने 30 जुलाई के अपने आदेश में अधिकारियों को जब्त लकड़ी और ट्रक को उनके मालिकों को तुरंत सौंपने का निर्देश दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य के स्वामित्व वाली वन उपज को सुनवाई पूरी होने से पहले जब्त किया जा सकता है, लेकिन बिना किसी आपराधिक मामले या दोषसिद्धि के निजी संपत्ति पर ऐसा कदम उठाना मालिक को उसके संपत्ति के अधिकार से बेदखल करता है।
पर्यावरण संरक्षण पर हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पर्यावरण के लगातार हो रहे क्षरण पर गहरी चिंता व्यक्त की। जस्टिस एमए चौधरी ने कहा कि इंसानी लालच के कारण प्राकृतिक पर्यावरण का भारी नुकसान हुआ है, जिसके चलते जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कानूनों की न्यायिक व्याख्या करते समय पर्यावरण को पहुंचाए जा रहे नुकसान के प्रति हमेशा सतर्क रहने की आवश्यकता है।
ट्रायल से पहले जब्ती को बताया गैरकानूनी
हाईकोर्ट का यह आदेश पुलवामा स्थित खेल सामान निर्माता कंपनी और एक लॉजिस्टिक्स फर्म की याचिका पर आया है। याचिकाओं में प्रधान मुख्य वन संरक्षक, जम्मू-कश्मीर द्वारा 28 जून 2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने जब्ती की पुष्टि की थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मुकदमा पूरा होने से पहले ही व्यापारिक सामान जब्त करने से कारोबारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, अदालत ने ध्यान दिलाया कि जम्मू-कश्मीर विलो (निर्यात और आवाजाही पर प्रतिबंध) अधिनियम, 2000 के तहत जब्त विलो से निपटने के लिए अधिकारियों के पास वर्तमान में कोई स्पष्ट प्रक्रियात्मक ढांचा नहीं है। इस कमी को दूर करने के लिए अदालत ने सरकार को प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश तय करने वाली अधिसूचना या स्टैंडिंग ऑर्डर जारी करने का सुझाव दिया।
दस्तावेजों में गड़बड़ी के बाद लखनपुर सीमा पर हुई थी जब्ती
यह मामला 12 दिसंबर 2023 की सुबह करीब 6 बजे शुरू हुआ था, जब पुलिस ने लखनपुर टोल प्लाजा पर लकड़ी से लदे एक ट्रक को रोका। इस वाहन को जांच के लिए लखनपुर एंटी-पॉलीथिन चेक पोस्ट पर तैनात वन अधिकारियों के हवाले कर दिया गया था।
जांच के दौरान पुलवामा की कंपनी के मालिकाना हक वाली 6,150 विलो क्लेफ्ट्स बरामद हुईं, जिन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ भेजा जा रहा था। रिकॉर्ड से पता चला कि 7,000 पॉपुलस लकड़ी के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया गया था, जबकि ई-वे बिल में विलो क्लेफ्ट्स दर्ज था। इसके अलावा चालक केंद्र शासित प्रदेश से बाहर विलो ले जाने के लिए आवश्यक अनिवार्य निर्यात दस्तावेज पेश करने में विफल रहा।
वन अधिकारियों ने भारतीय वन अधिनियम और क्षेत्रीय विलो निर्यात प्रतिबंध कानून के तहत रिपोर्ट दर्ज की और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कठुआ को सूचित किया। अधिकृत अधिकारी ने 31 जनवरी 2024 को जब्ती का पहला आदेश जारी किया। निचली अदालत द्वारा पक्षों को दोबारा सुनने के निर्देश के बाद अधिकृत अधिकारी ने 14 अक्टूबर 2024 को फिर से जब्ती आदेश जारी किया, जिसे जून 2025 में अपीलीय प्राधिकारी ने बरकरार रखा था।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
खेल सामान निर्माता कंपनी का पक्ष रख रहे अधिवक्ता जगपाल सिंह और निखिल शर्मा ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई औपचारिक आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि भारतीय वन अधिनियम केवल अभियुक्त की दोषसिद्धि के बाद ही जब्ती की अनुमति देता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब्ती केंद्र शासित प्रदेश की सीमा के भीतर हुई थी, इसलिए निर्यात की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी।
परिवहन कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. निर्मल कोटवाल, अधिवक्ता सवेश कोटवाल और पवन देव सिंह ने कहा कि वाहक ने लकड़ी के परिवहन पर लगे प्रतिबंधों से अनजान रहते हुए सद्भावपूर्वक माल स्वीकार किया था।
प्रशासन की ओर से पेश उप अधिवक्ता जनरल (डिप्टी एडवोकेट जनरल) मीनाक्षी स्लाथिया ने प्रशासनिक कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब्ती की प्रशासनिक कार्यवाही आपराधिक मुकदमे से स्वतंत्र और समानांतर होती है और इसके लिए पूर्व आपराधिक मामला या दोषसिद्धि होना आवश्यक नहीं है।

