इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की पीठ ने लखनऊ में एक विवादित संपत्ति पर वकीलों की पोशाक पहने लोगों द्वारा कथित तौर पर अवैध कब्जा करने, तोड़फोड़ मचाने और कर्मचारियों को धमकाने की घटना में स्थानीय पुलिस की मूकदर्शक भूमिका पर कड़ा रुख अपनाया है। अधिवक्ता सक्षम सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने लखनऊ के पुलिस कमिश्नर को मामले की व्यक्तिगत जांच करने, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को कोर्ट के समक्ष उपस्थित होने और याचिकाकर्ता वकील को सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका अधिवक्ता सक्षम सिंह द्वारा 7 जुलाई 2026 की शाम को हुई एक घटना के बाद व्यक्तिगत रूप से दायर की गई थी। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो क्लिप में वकीलों के पहनावे में दर्जनों लोग दयानंद सेवा संस्थान स्थित एक परिसर में दाखिल होते दिखे। इस परिसर का उपयोग क्रिकेट नेट प्रैक्टिस और शादी-समारोहों के लिए किया जाता है। आरोप है कि इन लोगों ने वहां मौजूद कर्मचारियों और मजदूरों को गाली दी, धमकियां दीं, उनसे मारपीट की, ईंटें फेंकी और वहां लगे सीसीटीवी कैमरों को तोड़ दिया।
इस घटना के संबंध में संपत्ति पर कब्जे का दावा करने वाली संस्था ‘करम प्रदोषी’ की अध्यक्ष श्रीमती मनोरमा मिश्रा द्वारा एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कराई गई थी। इस एफआईआर में अधिवक्ता अमित मिश्रा, राहुल शुक्ला, दीपक प्रकाश, अरुण जायसवाल और आनंद मोहन तिवारी को नामजद किया गया है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को सूचित किया कि संपत्ति विवाद से जुड़े दोनों पक्षों को थाने बुलाया गया था, जहां सेंट्रल बार एसोसिएशन के कनिष्ठ उपाध्यक्ष अधिवक्ता सौरभ कुमार वर्मा भी मौजूद थे। उनके खिलाफ आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन पर संपत्ति हड़पने के आरोप हैं। इसके अलावा, कैसरबाग के एसीपी द्वारा उपलब्ध कराई गई स्टेटस रिपोर्ट को शासकीय अधिवक्ता डॉ. वी.के. सिंह ने कोर्ट में पेश किया, जिसमें आरोपी हर्षित दीक्षित का नाम शामिल है। हर्षित दीक्षित, सेंट्रल बार एसोसिएशन के महामंत्री अवनीश दीक्षित के भाई हैं।
साक्ष्यों का अवलोकन और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने याचिका के साथ संलग्न पेन ड्राइव में मौजूद वीडियो क्लिप का स्वयं अवलोकन किया। इस फुटेज में बड़ी संख्या में वकील परिसर में घुसते, कर्मचारियों और मजदूरों को भगाते और संपत्ति पर अवैध कब्जा करने की नीयत से घूमते हुए दिखाई दिए।
वकीलों के इस आचरण की कड़ी आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने बार के सदस्यों की बातों का उल्लेख किया कि “वकीलों का ऐसा समूह, जो सतर्कता गिरोह की तरह काम कर रहा है, इस तरह के विवादों को गैर-कानूनी तरीके से सुलझाने का वादा करता है। इससे न केवल वकालत का पेशा बदनाम हो रहा है, बल्कि कानून की प्रक्रिया को भी दरकिनार कर उससे समझौता किया जा रहा है।”
अदालत ने आगे पाया कि सुबह 10:00 बजे से दोपहर 02:00 बजे तक चले इस चार घंटे के घटनाक्रम के दौरान मौके पर 10 से 15 पुलिसकर्मी लगातार मौजूद थे, लेकिन उपद्रवियों को रोकने या पकड़ने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जब एसीपी से पूछा गया कि अतिक्रमणकारियों को हिरासत में लेने के लिए अतिरिक्त बल क्यों नहीं बुलाया गया, तो उन्होंने कहा कि बल बुलाया गया था, लेकिन वह इस बात का कोई जवाब नहीं दे सके कि किसी को हिरासत में क्यों नहीं लिया गया।
घटनास्थल पर मौजूद पुलिस टीम के रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि “पुलिसकर्मी अतिक्रमणकारियों के साथ काफी दोस्ताना व्यवहार करते हुए और प्रत्यक्ष रूप से निष्क्रिय दिखाई दे रहे थे। हम बहुत कुछ नहीं कहना चाहते, सिवाय इसके कि स्थानीय पुलिसकर्मियों द्वारा उक्त अवैध गतिविधियों में मदद करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (सचिव, नई दिल्ली के माध्यम से) और यूपी बार काउंसिल (सचिव, प्रयागराज के माध्यम से) को याचिका में पक्षकार के रूप में शामिल करने का आदेश दिया।
- लखनऊ के पुलिस कमिश्नर को वीडियो क्लिप देखने और इस बात की जांच करने का निर्देश दिया कि मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा उचित कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
- पुलिस कमिश्नर, लखनऊ को 23 जुलाई 2026 को दोपहर 02:15 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालती कार्यवाही में शामिल होने का निर्देश दिया।
- संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था), संबंधित डीसीपी और एसीपी को 23 जुलाई 2026 को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया।
- पुलिस कमिश्नर को इस जनहित याचिका को अदालत के समक्ष लाने वाले याचिकाकर्ता अधिवक्ता सक्षम सिंह की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
- वीडियो फुटेज वाली पेन ड्राइव को सील बंद लिफाफे में अदालती रिकॉर्ड के साथ सुरक्षित रखने और उसकी एक प्रति को कंप्यूटर में अलग से सहेज कर रखने का आदेश दिया।
अदालत ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए क्रिमिनल मिस. रिट याचिका संख्या 8810/2023 के साथ संबद्ध कर दिया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सक्षम सिंह (अधिवक्ता) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, द्वारा अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार एवं 3 अन्य
वाद संख्या: जनहित याचिका (पीआईएल) संख्या 682/2026
पीठ: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला
निर्णय की तिथि: 22 जुलाई, 2026

