न्यायिक रिमांड से इनकार करना चार्जशीट दाखिल करने या कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के रास्ते में बाधा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया है कि आरोपी की न्यायिक रिमांड देने से इनकार करने का पिछला आदेश जांच अधिकारी को जांच आगे बढ़ाने और चार्जशीट दाखिल करने से नहीं रोकता है। कोर्ट ने साफ किया कि न्यायिक रिमांड से इनकार करना और संज्ञान (कॉग्निजेंस) लेना, आपराधिक कार्यवाही के दो पूरी तरह से अलग चरण हैं और दोनों का उद्देश्य भी अलग होता है। जस्टिस जफीर अहमद की एकल पीठ ने यह टिप्पणी ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली एक आपराधिक अपील को खारिज करते हुए की, जिसके तहत अपीलकर्ता को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आपराधिक अपील अपीलकर्ता द्वारा विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट), लखीमपुर खीरी द्वारा विशेष मुकदमा संख्या 28/2026 में 25 मार्च 2026 को पारित समन आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। यह मामला लखीमपुर खीरी के कोतवाली सदर थाने में दर्ज केस अपराध संख्या 833/2025 से उत्पन्न हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 69 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट), 1989 की धाराओं 3(1)(r), 3(1)(s) और 3(2)(v) के तहत दर्ज अपराधों के लिए समन जारी किया था।

इस मामले में मुख्य विवाद इस बात पर आधारित था कि 29 अक्टूबर 2025 को उसी ट्रायल कोर्ट ने इन्हीं कथित अपराधों के लिए अपीलकर्ता की न्यायिक रिमांड मंजूर करने से इनकार कर दिया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के तर्क

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश अत्यंत संक्षिप्त और बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय है, जो न्यायिक विवेक के अभाव को दर्शाता है। उनका तर्क था कि जिस अपराध के लिए ट्रायल कोर्ट पहले ही न्यायिक रिमांड खारिज कर चुका था, उसमें जांच अधिकारी को धाराएं जोड़ने या आगे जांच करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। आरोप लगाया गया कि जांच अधिकारी ने केवल दो गवाहों के बयान दर्ज करके पिछले अदालती आदेश को दरकिनार और निष्प्रभावी करने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया गया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज बयानों को सरसरी तौर पर देखने से यह स्पष्ट नहीं होता कि पीड़िता अनुसूचित जाति की श्रेणी से संबंध रखती है।

अपने दावों के समर्थन में अपीलकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख फैसलों सोनू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021), प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) और हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) का हवाला दिया गया।

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राज्य सरकार के तर्क

दूसरी ओर, अपर सरकारी अधिवक्ता (ए.जी.ए.) ने अपील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि जांच अधिकारी ने जांच के दौरान कानून के दायरे में रहकर गवाहों के बयान दर्ज किए और उपलब्ध सबूतों के आधार पर चार्जशीट दाखिल की। सरकारी वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेते समय अपने अधिकार क्षेत्र का बिल्कुल सही उपयोग किया। उन्होंने इस आदेश के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले भूषण कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2012) का संदर्भ दिया।

कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने बीएनएसएस, 2023 के तहत “संज्ञान (कॉग्निजेंस)” और “समन भेजने” की कानूनी और सैद्धांतिक प्रकृति का गहराई से विश्लेषण किया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि संज्ञान लेने के चरण में कोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह सबूतों का बहुत बारीकी से मूल्यांकन करे या आरोपी के संभावित बचाव पर विचार करे। इस चरण में कोर्ट का दायित्व केवल यह देखना है कि पुलिस द्वारा पेश की गई सामग्री से प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता है या नहीं।

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भूषण कुमार मामले का संदर्भ देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि समन आदेश में बहुत विस्तृत या अलग से कारणों का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं होती, बशर्ते यह साफ हो कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट और संलग्न सामग्रियों पर अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया है। ट्रायल कोर्ट के आदेश की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“सिर्फ इसलिए कि आदेश संक्षिप्त है या उसमें प्रत्येक साक्ष्य पर विस्तृत चर्चा नहीं की गई है, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इसे न्यायिक विवेक का उपयोग किए बिना पारित किया गया है। संज्ञान लेने के चरण में, साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन न तो अपेक्षित है और न ही इसकी अनुमति है।”

अपीलकर्ता की इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कि न्यायिक रिमांड से इनकार के बाद आगे की कार्रवाई नहीं की जा सकती, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“न्यायिक रिमांड से इनकार करने का आदेश आपराधिक कार्यवाही के एक अलग चरण में पारित किया जाता है और इसका उद्देश्य संज्ञान लेने के आदेश से पूरी तरह से अलग होता है। ऐसा आदेश न तो जांच की वैधता पर कोई फैसला होता है और न ही इसे यह न्यायिक निष्कर्ष माना जा सकता है कि संबंधित अपराध नहीं बनते हैं। यह निश्चित रूप से जांच अधिकारी के उस वैधानिक अधिकार को सीमित नहीं करता जिसके तहत वह जांच जारी रख सकता है, अतिरिक्त साक्ष्य एकत्र कर सकता है और बीएनएसएस, 2023 के प्रावधानों के तहत उचित पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।”

अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए अन्य फैसलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि वे इस चरण में हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकते। कोर्ट ने कहा कि हितेश वर्मा मामले का सिद्धांत (जिसमें अपमान सार्वजनिक रूप से और पीड़िता की जाति के कारण होने का प्रमाण आवश्यक है) और प्रमोद सूर्यभान पवार मामले का सिद्धांत (जिसमें शादी का वादा शुरू से ही झूठा और दुर्भावनापूर्ण होने की बात कही गई है), ऐसे तथ्य हैं जिनका निर्धारण ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। संज्ञान लेने के शुरुआती चरण में इन पर फैसला नहीं किया जा सकता। इसी तरह, एफआईआर में पीड़िता की जाति का स्पष्ट उल्लेख न होना भी साक्ष्य की पर्याप्तता का विषय है, जिसका फैसला ट्रायल के दौरान होगा।

कोर्ट का निर्णय

ट्रायल कोर्ट के 25 मार्च 2026 के आदेश में कोई भी कानूनी त्रुटि या विसंगति न पाते हुए हाईकोर्ट ने इस आपराधिक अपील को शुरुआती चरण (एडमिशन स्टेज) पर ही खारिज कर दिया। अदालत ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा इस आदेश में की गई किसी भी टिप्पणी को मामले के गुण-दोष पर राय के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए और ट्रायल कोर्ट को स्वतंत्र रूप से सुनवाई आगे बढ़ानी चाहिए।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अदीम अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1258 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस जफीर अहमद
निर्णय की तिथि: 15 जुलाई, 2026

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