अदालती कार्यवाहियों की गरिमा और शुचिता से जुड़े एक अत्यंत गंभीर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक वकील और एक याचिकाकर्ता के खिलाफ जालसाजी, प्रतिरूपण (फर्जी पहचान) और झूठा हलफनामा दायर करने के आरोप में आपराधिक शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया है। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डिविजन बेंच ने कोर्ट के रजिस्ट्रार (चयन एवं नियुक्ति) को प्रयागराज के संबंधित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष इस मामले में औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट का यह निर्णय फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की उस वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें अदालत के महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर जाली हस्ताक्षर होने की पुष्टि हुई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कुशीनगर जिले के फतेह मेमोरियल इंटर कॉलेज और तमकुहीराज एजुकेशन सोसायटी के प्रबंधक की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं को लेकर संगीता गुप्ता द्वारा अपने वकील अशरफ अली के माध्यम से दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल संख्या 450 ऑफ 2025) से शुरू हुआ था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रबंधन समिति का चुनाव अवैध तरीके से और इंटरमीडिएट एजुकेशन एक्ट, 1921 की धारा 16(ए)(5) के उल्लंघन में किया गया था।
हालांकि, मामला तब गंभीर हो गया जब प्रतिवादी संख्या 5 ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 379 के तहत एक आवेदन दायर कर याचिकाकर्ता के खिलाफ झूठा हलफनामा दायर करने के आरोप में मुकदमा चलाने की मांग की। प्रतिवादी का आरोप था कि याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने (विड्रॉल) के आवेदन पर उनके वकील पारिजात श्रीवास्तव के जाली हस्ताक्षर किए थे, ताकि यह दिखाया जा सके कि उन्हें इस आवेदन की प्रति मिल गई है। इसके अलावा, यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता के वकील अशरफ अली वास्तव में कोई असली व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि एक अन्य वकील अमित प्रताप सिंह (ए.पी. सिंह) ने उनकी फर्जी पहचान बनाई है और वे स्वयं अशरफ अली बनकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में पेश होते रहे हैं।
पक्षों की दलीलें
प्रतिवादी संख्या 5 के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि खुद एक वकील होने के नाते संगीता गुप्ता, अमित प्रताप सिंह और अशरफ अली के साथ मिलकर अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तिकड़ी ने जाली दस्तावेजों और फर्जी हस्ताक्षरों के सहारे कई झूठे मुकदमे दायर किए हैं। उन्होंने रिकॉर्ड पर ऐसी 23 जनहित याचिकाओं की सूची भी पेश की जो इसी तरह दायर की गईं और बाद में वापस ले ली गईं।
दूसरी ओर, व्यक्तिगत रूप से पेश हुईं याचिकाकर्ता संगीता गुप्ता और वकीलों ए.पी. सिंह तथा अशरफ अली ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दावा किया कि दोनों ही वास्तविक वकील हैं और उनके पास पहचान पत्र भी हैं। उन्होंने बताया कि दोनों का एक ही पता और फोन नंबर होने का कारण उनके बीच मकान मालिक और किरायेदार का संबंध है। उन्होंने अदालत से याचिका को वापस लेने की अनुमति देने का अनुरोध किया।
दस्तावेजों पर अलग-अलग हस्ताक्षरों के बारे में वकील अशरफ अली ने एक व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर चिकित्सा कारणों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि वे ‘पॉल्यूरिया’ (Polyuria) और ‘पॉलीडिप्सिया’ (Polydipsia) जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं, जिसके कारण वे अपने पिछले हस्ताक्षरों की तरह हूबहू हस्ताक्षर करने में शारीरिक रूप से असमर्थ थे।
अदालत का विश्लेषण और फॉरेंसिक रिपोर्ट
हस्ताक्षरों और पहचान के विवाद को सुलझाने के लिए हाईकोर्ट ने लखनऊ की फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) को मूल याचिका, वापसी आवेदन और कोर्ट की ऑर्डर शीट पर मौजूद हस्ताक्षरों की वैज्ञानिक जांच करने का निर्देश दिया था। 30 जनवरी 2026 को अशरफ अली और पारिजात श्रीवास्तव के नमूने (स्पेसिमेन) हस्ताक्षर लिए गए और जांच के लिए भेजे गए।
25 फरवरी 2026 की एफएसएल रिपोर्ट में यह स्पष्ट निष्कर्ष आया कि नमूना हस्ताक्षर और विवादित दस्तावेज पर किए गए हस्ताक्षर मेल नहीं खाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिस व्यक्ति ने नमूने दिए थे, उसने मूल याचिका और वापसी आवेदन पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
अदालत ने अशरफ अली द्वारा बीमारी के संबंध में दी गई दलील को पूरी तरह से असंतोषजनक माना। बीएनएसएस की धारा 379 के तहत दायर आवेदन पर विचार करते हुए बेंच ने पूर्व में टिप्पणी की थी:
“इन कार्यवाहियों में याचिकाकर्ता (संगीता गुप्ता) के वकील के रूप में अशरफ अली के हस्ताक्षर अलग-अलग दस्तावेजों पर अलग-अलग तरीके से किए गए हैं। भेष बदलने, जालसाजी, दस्तावेजों में हेरफेर और इन कार्यवाहियों में शामिल या पेश होने वाले व्यक्तियों की पहचान से जुड़े आरोपों को देखते हुए, हम अशरफ अली के हस्ताक्षरों की जांच फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी, लखनऊ (‘एफएसएल’) से कराना उचित समझते हैं और एफएसएल की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद आगे के आदेश पारित किए जाएंगे।”
रिपोर्ट मिलने के बाद कोर्ट ने कहा:
“प्रथम दृष्टिया हमारा यह मानना है कि एडवोकेट अशरफ अली और याचिकाकर्ता संगीता गुप्ता ने बीएनएसएस की धारा 215(1)(b) में वर्णित अपराध किया है, इसलिए इस मामले की सुनवाई बीएनएसएस की धारा 379 और अन्य संबद्ध प्रावधानों के तहत प्रयागराज के अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए।”
अदालत का निर्णय
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 379 के तहत दायर आवेदन का निपटारा करते हुए आपराधिक मुकदमा चलाने के निर्देश जारी किए। कोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार (चयन एवं नियुक्ति) को अधिकृत किया कि वे वकील अशरफ अली और याचिकाकर्ता संगीता गुप्ता के खिलाफ एक औपचारिक लिखित शिकायत तैयार कर हस्ताक्षर करें।
रजिस्ट्रार को छह सप्ताह के भीतर इस शिकायत को प्रयागराज के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष प्रासंगिक रिकॉर्ड और एफएसएल रिपोर्ट के साथ भेजने का निर्देश दिया गया है। मजिस्ट्रेट बीएनएसएस, 2023 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ाएंगे।
हाईकोर्ट ने मुख्य जनहित याचिका पर आगे की विचार प्रक्रिया को स्थगित करते हुए कहा:
“चूंकि इस याचिका को दायर करने की पूरी प्रक्रिया ही प्रथम दृष्टिया जालसाजी, दस्तावेजों में हेरफेर और कदाचार का परिणाम प्रतीत होती है, इसलिए न्यायालय संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत पर निर्णय लिए जाने तक मामले की आगे की सुनवाई स्थगित करता है और पक्षकारों के लिए इस याचिका को फिर से सूचीबद्ध करने हेतु उचित आवेदन देने का विकल्प खुला रहेगा।”
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: संगीता गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: जनहित याचिका (पीआईएल) संख्या 450 ऑफ 2025
पीठ: चीफ जस्टिस अरुण भंसाली, जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
निर्णय की तिथि: 14 जुलाई, 2026

