वैधानिक नियमों या नीति के खिलाफ लाभ पाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 का सहारा नहीं लिया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी रिट याचिकाकर्ता वैधानिक नियमों, विनियमों या सरकार की मौजूदा नीति के खिलाफ किसी लाभ का दावा करने या उसे जारी रखने के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सहारा नहीं ले सकता। हाईकोर्ट के बिलासपुर स्थित एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने यह टिप्पणी करते हुए असिस्टेंट वेटरनरी फील्ड ऑफिसर्स (एवीएफओ) की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने शैक्षणिक सत्र 2025–26 के लिए विभागीय उम्मीदवार के रूप में ‘बैचलर ऑफ वेटरनरी साइंस एंड एनिमल हसबेंडरी’ (बी.वी.एस.सी. एंड ए.एच.) डिग्री कोर्स की पढ़ाई के लिए राज्य सरकार द्वारा कार्यमुक्त किए जाने की मांग की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता छत्तीसगढ़ राज्य के पशुपालन विभाग में असिस्टेंट वेटरनरी फील्ड ऑफिसर (एवीएफओ) के पद पर कार्यरत थे। छत्तीसगढ़ पशुचिकित्सा (राजपत्रित) भर्ती सेवा नियम, 2011 के तहत, एवीएफओ का पद वेटरनरी असिस्टेंट सर्जन के पद पर पदोन्नति के लिए फीडर कैडर (पदोन्नति का प्राथमिक माध्यम) है। नियमों के अनुसार, इस उच्च पद पर पदोन्नति के लिए बी.वी.एस.सी. एंड ए.एच. की डिग्री होना एक अनिवार्य योग्यता है।

याचिकाकर्ताओं ने पांच साल से अधिक की सेवा पूरी करने के बाद नीट-यूजी परीक्षा 2025 में हिस्सा लिया और विभागीय उम्मीदवारों के रूप में प्रवेश के लिए आवश्यक न्यूनतम अंक प्राप्त किए। हालांकि, राज्य सरकार ने उन्हें इस कोर्स को करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके लिए सरकार ने 12 अक्टूबर 2020 और 3 दिसंबर 2020 के प्रशासनिक आदेशों का हवाला दिया, जिसमें पशुचिकित्सा विभाग के निदेशक को निर्देशित किया गया था कि आगामी आदेश तक राज्य के खर्च पर एवीएफओ को इस कोर्स के लिए न भेजा जाए। इसके बाद, 24 मार्च 2025 को डिप्टी डायरेक्टर ने याचिकाकर्ताओं के आवेदनों को वापस लौटा दिया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं का पक्ष

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि यह कानूनी बिंदु अब कोई अनसुलझा मुद्दा नहीं रह गया है, क्योंकि हाईकोर्ट ने पूर्व में ‘तोश कुमार सिन्हा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य’ (डब्ल्यूपीएस संख्या 4752/2024) के मामले में इसी तरह के एवीएफओ को विभागीय उम्मीदवार के रूप में कोर्स में शामिल होने की अनुमति दी थी। इस निर्णय की पुष्टि रिट अपील और सुप्रीम कोर्ट में भी हुई थी। याचिकाकर्ताओं ने समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के तहत इसी तरह के व्यवहार की मांग की।

उन्होंने यह भी दलील दी कि ‘बैचलर ऑफ वेटरनरी साइंस एंड एनिमल हसबेंडरी कोर्स प्रवेश नियम, 2025’ को प्रवेश प्रक्रिया के बीच में लागू किया गया था। यह नियम याचिकाकर्ताओं के उन अधिकारों को पिछली तारीख से प्रभावित नहीं कर सकता जो उन्होंने 2011 के नियमों और 2020 के प्रवेश नियमों के तहत हासिल किए थे, जो प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के समय प्रभावी थे।

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इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय अधिनियम, 2011 की धारा 41(5) का हवाला देते हुए 2025 के प्रवेश नियमों की वैधता को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि कार्य परिषद (एग्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा पारित किसी भी नियम को वैध होने के लिए कुलाधिपति (चांसलर) की अनिवार्य सहमति की आवश्यकता होती है, और 2025 के नियमों के लिए ऐसी कोई सहमति साबित नहीं हुई है।

प्रतिवादियों (राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय) का पक्ष

प्रतिवादियों ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास सत्र 2025-26 के लिए विभागीय उम्मीदवार के रूप में प्रवेश पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने दलील दी कि 2011 के नियम केवल पदोन्नति की योग्यता तय करते हैं, न कि विश्वविद्यालय को सीटें आरक्षित करने या प्रवेश की गारंटी देने के लिए बाध्य करते हैं।

विश्वविद्यालय की ओर से स्पष्ट किया गया कि सत्र 2025-26 के लिए प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह से ‘प्रवेश नियम, 2025’ द्वारा संचालित है, जिसे 30 जुलाई 2025 को कार्य परिषद की 25वीं बैठक में मंजूरी दी गई थी, जबकि प्रवेश की अधिसूचना इसके बाद 7 अगस्त 2025 को जारी हुई थी। इन नए नियमों में पशुपालन विभाग के इन-सर्विस उम्मीदवारों के लिए कोई कोटा या आरक्षण नहीं रखा गया है।

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि ‘तोश कुमार सिन्हा’ का मामला पूरी तरह से अलग परिस्थितियों में तय हुआ था जब 2020 के प्रवेश नियम लागू थे, और उस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि उसे एक अपवाद के रूप में देखा जाए और नजीर (मिसाल) न माना जाए। राज्य सरकार ने कर्मचारियों की कमी, प्रशासनिक अनिवार्यताओं और काम के बढ़ते बोझ को देखते हुए उम्मीदवारों को कोर्स के लिए न भेजने का नीतिगत निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 41(5) केवल “परिनियम” (स्टेट्यूट) पर लागू होती है, न कि प्रवेश से जुड़े प्रशासनिक दिशा-निर्देशों पर।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने कानूनी ढांचे और पूर्व के निर्णयों का बारीकी से विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती नियम 2011 केवल पदोन्नति और सेवा की शर्तें तय करते हैं। ये नियम किसी कर्मचारी को यह अधिकार नहीं देते कि वह जबरन किसी व्यावसायिक पाठ्यक्रम में प्रवेश मांगे या विश्वविद्यालय को सीटें सृजित करने के लिए मजबूर करे।

‘तोश कुमार सिन्हा’ के फैसले पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि उस मामले में दी गई राहत केवल उसी शैक्षणिक सत्र की विशेष परिस्थितियों तक सीमित थी। कोर्ट ने उस निर्णय के प्रासंगिक हिस्से को उद्धृत किया:

“प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे एक असाधारण मामले के रूप में, और इसे नजीर (मिसाल) न मानते हुए, यह सुनिश्चित करें कि याचिकाकर्ताओं को आगामी शैक्षणिक सत्र में बी.वी.एस.सी. कोर्स में भाग लेने की अनुमति दी जाए और वर्ष 2024 की नीट परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने के आधार पर उन्हें इस कोर्स के लिए योग्य माना जाए।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता नए प्रवेश नियमों के लागू होने के बाद वर्ष 2025-26 के लिए यांत्रिक रूप से उसी राहत की मांग नहीं कर सकते।

अधिनियम की धारा 41(5) पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि कुलाधिपति की सहमति केवल औपचारिक “परिनियम” (स्टेट्यूट) के लिए आवश्यक होती है। किसी सत्र विशेष के लिए जारी किए गए प्रवेश दिशा-निर्देश या कार्यकारी प्रस्तावों को ‘परिनियम’ का दर्जा नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा:

“कुलाधिपति की सहमति के अभाव में, इसका कोई वैधानिक प्रभाव नहीं होता है। वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज स्वतः ही केवल प्रवेश को विनियमित करने वाली एक अधिसूचना है।”

संविधान के अनुच्छेद 14 और समानता के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“कोई भी रिट याचिकाकर्ता मौजूदा वैधानिक नियमों, विनियमों या शासी नीति द्वारा गैर-स्वीकृत लाभ का दावा करने या उसे जारी रखने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का सहारा नहीं ले सकता है।”

परमादेश (रिट ऑफ मैंडामस) जारी करने के संबंध में कोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया:

“यह स्थापित कानून है कि परमादेश (रिट ऑफ मैंडामस) केवल तभी जारी किया जा सकता है जब याचिकाकर्ता अपना मौजूदा कानूनी अधिकार और प्रतिवादी प्राधिकरण के हिस्से पर उससे जुड़े सार्वजनिक कर्तव्य को साबित करे। वर्तमान मामले के तथ्यों में, दोनों ही आवश्यकताएं पूरी नहीं होती हैं।”

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से वर्तमान प्रवेश प्रक्रिया बाधित होगी जो काफी आगे बढ़ चुकी है।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि राज्य सरकार द्वारा एवीएफओ को अनुमति न देने और कार्यमुक्त न करने का निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने माना कि नियमों से परे जाकर विश्वविद्यालय को विभागीय कोटा बनाने के लिए विवश करने का कोई आधार मौजूद नहीं है।

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परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को पूरी तरह से सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। पक्षों को मुकदमे के खर्च का भुगतान खुद करने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कंचन राहुल उर्फ कंचन कौर राजपूत बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 9730 ऑफ 2025 (डब्ल्यूपीएस संख्या 9804 ऑफ 2025, डब्ल्यूपीएस संख्या 10191 ऑफ 2025, और डब्ल्यूपीएस संख्या 10126 ऑफ 2025 के साथ)
पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 25/06/2026

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