चेक पर हस्ताक्षर और मालिकाना हक निर्विवाद होने पर प्रथम दृष्टया मामला साबित होता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20% अंतरिम मुआवजे के आदेश को बरकरार रखा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (N.I.) एक्ट, 1881 की धारा 143-A के तहत एक आरोपी को चेक राशि का 20% अंतरिम मुआवजे के रूप में जमा करने के निचली अदालतों के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय ने निर्णय दिया कि चूंकि चेक के मालिकाना हक और उन पर किए गए हस्ताक्षर को लेकर कोई विवाद नहीं था, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने अपने विवेकाधीन अधिकार का बिल्कुल सही इस्तेमाल किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम मुआवजा तय करने के शुरुआती चरण में तथ्यों और बचाव के तर्कों का ट्रायल की तरह गहराई से मूल्यांकन करना न तो आवश्यक है और न ही इसकी अनुमति दी जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला शिकायतकर्ता रोहित सिंह द्वारा आरोपी राहुल यादव के खिलाफ N.I. एक्ट की धारा 138 के तहत 30 जुलाई 2024 को दर्ज कराई गई एक शिकायत से जुड़ा है। राहुल यादव रियल एस्टेट के कारोबार से जुड़े हैं। शिकायत के अनुसार, यादव पर शिकायतकर्ता का 10,00,000/- रुपये का कर्ज था। इस देनदारी को चुकाने के लिए यादव ने क्रमशः 3,00,000/-, 6,00,000/- और 1,00,000/- रुपये के तीन चेक जारी किए थे।

जब इन चेकों को बैंक में भुगतान के लिए लगाया गया, तो वे “अपर्याप्त कोष” (फंड्स इनसफिशिएंट) और “खाता निष्क्रिय” (अकाउंट इनऑपरेटिव) होने की वजह से बाउंस हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने अंतरिम मुआवजे की मांग करते हुए N.I. एक्ट की धारा 143-A के तहत कोर्ट में आवेदन दायर किया।

20 नवंबर 2025 को स्पेशल कोर्ट (138 N.I. एक्ट), गौतम बुद्ध नगर ने इस आवेदन को स्वीकार कर लिया और यादव को निर्देश दिया कि वह चेक की कुल राशि का 20% (यानी 2,00,000/- रुपये) दो महीने के भीतर शिकायतकर्ता को भुगतान करे। इस आदेश को यादव ने सत्र न्यायालय (सेशंस जज), गौतम बुद्ध नगर में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर कर चुनौती दी, जिसे कोर्ट ने 14 मई 2026 को खारिज कर दिया। इसके बाद यादव ने दोनों आदेशों को रद्द करने की मांग के साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता राहुल यादव के वकील ने तर्क दिया कि संबंधित लेनदेन लंबे समय के दौरान बिना किसी स्वतंत्र दस्तावेजी सबूत, रसीद, बैंकिंग लेनदेन, आयकर घोषणा या किसी कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत के किए गए नकद भुगतानों पर आधारित था। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जो कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज को स्थापित करता हो। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और रिवीजन कोर्ट इस बात को समझने में विफल रहे कि धारा 143-A के तहत मुआवजा देने का अधिकार विवेकाधीन (डिस्क्रिशनरी) है, न कि अनिवार्य। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले राकेश रंजन श्रीवास्तव बनाम झारखंड राज्य व अन्य (2024) 4 SCC 419 का हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि ये चेक याचिकाकर्ता की गाड़ी से चोरी हुए थे और उनका गलत इस्तेमाल किया गया था।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA-I) ने दलील दी कि निचली अदालतों के आदेश कानून सम्मत और तार्किक हैं। उन्होंने कहा कि चूंकि यादव ने खुद स्वीकार किया है कि चेक उनके ही हैं और उन पर उन्हीं के हस्ताक्षर हैं, इसलिए N.I. एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत वैधानिक धारणाएं आरोपी के खिलाफ लागू होती हैं। यह भी तर्क दिया गया कि धारा 143-A को विशेष रूप से चेक लेनदेन की विश्वसनीयता बढ़ाने और धारा 138 के मामलों के निपटारे में होने वाली अनावश्यक देरी को रोकने के लिए बनाया गया था।

कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय

N.I. एक्ट की धारा 143-A के दायरे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राकेश रंजन श्रीवास्तव वाले मामले के दिशानिर्देशों का संदर्भ लिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि धारा 143-A के तहत अधिकार विवेकाधीन हैं और कोर्ट को शिकायत व बचाव के शुरुआती (प्रथम दृष्टया) गुणों पर विचार करते हुए संक्षेप में कारण दर्ज करने चाहिए।

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‘प्रथम दृष्टया’ (प्राइमा फेसी) के कानूनी मानक की व्याख्या करते हुए जस्टिस उपाध्याय ने टिप्पणी की कि इस लैटिन शब्द का अर्थ “पहली नज़र में” या “पहली छाप के आधार पर” होता है। ‘वेबस्टर्स थर्ड इंटरनेशनल डिक्शनरी’ का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया मामले का मतलब “कानून में पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य द्वारा स्थापित ऐसा मामला है जो तथ्य की एक धारणा को तब तक जन्म देता है जब तक कि उसे खारिज न कर दिया जाए।”

हाईकोर्ट ने इस कानूनी मानक की सीमा को स्पष्ट करने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया:

  • बलवीर सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (AIR 2023 SC 5551): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि “प्रथम दृष्टया मामले के लिए केवल एक शुरुआती और विश्वसनीय धारणा की आवश्यकता होती है, न कि संदेह से परे साबित करने की।”
  • सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई (2015) 4 SCC 609 और नीहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) 19 SCC 401: सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि हालांकि जज को यह सुनिश्चित करने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल करना चाहिए कि तथ्यों से कोई वास्तविक अपराध प्रकट होता है या नहीं, लेकिन उन्हें प्रारंभिक चरण में “गहरे गुणों की जांच करने, तथ्यात्मक बचाव का आकलन करने या ‘मिनी-ट्रायल’ चलाने से बचना चाहिए।”

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट का आदेश प्रथम दृष्टया आवश्यकताओं को पूरा करता है क्योंकि चेक आरोपी के थे, हस्ताक्षर को लेकर कोई विवाद नहीं था और आरोपी को समन जारी होने के बाद धारा 251 CrPC के तहत नोटिस काफी समय से लंबित था।

इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि आरोपी के बैंक स्टेटमेंट से पता चलता है कि उसका खाता पहले से ही निष्क्रिय था और उसमें पैसे नहीं थे। इस स्थिति में आरोपी का यह तर्क कि चेक उसकी गाड़ी से चोरी हुए थे और उनका गलत इस्तेमाल किया गया, इस चरण में “अत्यधिक अप्रत्याशित” लगता है।

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जस्टिस उपाध्याय ने टिप्पणी की: “N.I. एक्ट की धारा 143-A के तहत अंतरिम मुआवजे के आवेदन पर विचार करने के चरण में, कोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह साक्ष्यों का इस तरह से विस्तृत मूल्यांकन करे जैसे कि मुख्य शिकायत का गुण-दोष के आधार पर अंतिम फैसला करना हो।”

कोर्ट ने आगे कहा कि “आरोपी द्वारा चेक के दुरुपयोग को लेकर लिया गया बचाव मुख्य रूप से ट्रायल का विषय है और इस पर दोनों पक्षों द्वारा सबूत पेश किए जाने के बाद ही फैसला किया जा सकता है।”

कर्ज की वैधता के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि “याचिकाकर्ता की इस दलील की गहनता से जांच इस प्रारंभिक चरण में नहीं की जा सकती कि शिकायतकर्ता कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज को साबित करने में विफल रहा है।” कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त कारणों के अधिकतम 20% का मुआवजा देकर गलती की है। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायत की लंबित अवधि, आरोपों की प्रकृति और चेक पर हस्ताक्षर की बात स्वीकार होने जैसे सभी पहलुओं पर सही तरीके से विचार किया था।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “निचली अदालतों के आदेशों में न तो कोई विसंगति है और न ही अधिकार क्षेत्र का कोई उल्लंघन हुआ है।” कानूनी रूप से हस्तक्षेप का कोई आधार न पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन बताते हुए खारिज कर दिया।

आदेश समाप्त करने से पहले, जस्टिस उपाध्याय ने अपनी रिसर्च एसोसिएट सुश्री अंजलि सिंह की कानूनी शोध और आदेश का मसौदा तैयार करने में दी गई सहायता के लिए सराहना की।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राहुल यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: एप्लीकेशन यू/एस 528 बीएनएसएस संख्या 22924/2026
पीठ: जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
निर्णय की तिथि: 2 जून, 2026

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