सेवानिवृत्त आईएएस अशोक खेमका को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने भविष्य की नियुक्तियों के लिए अतिरिक्त सचिव के समकक्ष मानने का दिया आदेश

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हरियाणा कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अशोक खेमका को भविष्य की प्रशासनिक नियुक्तियों के लिए केंद्र सरकार में एम्पैनल्ड एडिशनल सेक्रेटरी (पैनल में शामिल अतिरिक्त सचिव) के समान माना जाए। हाईकोर्ट ने पाया कि केंद्र सरकार ने खेमका को पात्रता नियमों में वैसी छूट देने से इनकार करके उनके साथ भेदभाव किया, जैसी उनके समकक्ष अन्य अधिकारियों को दी गई थी।

जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने खेमका की याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खेमका भी उन अधिकारियों के समान ही व्यवहार और समानता के हकदार हैं, जिन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की अनिवार्य शर्तों से छूट दी गई थी। कोर्ट ने माना कि नियमों में समानता न बरतना उनके हितों के खिलाफ है।

कैट के फैसलों को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

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यह फैसला 1991 बैच के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका द्वारा दायर उस याचिका पर आया है, जिसमें उन्होंने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के जुलाई 2023 के तीन अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी थी। कैट ने खेमका की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने सेवानिवृत्ति से पहले खुद को अतिरिक्त सचिव या सचिव के पद पर एम्पैनल्ड करने का अनुरोध किया था।

दरअसल, केंद्र सरकार ने खेमका को इस पद पर एम्पैनल्ड करने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उन्होंने डिप्टी सेक्रेटरी या उससे ऊपर के पद पर अनिवार्य तीन साल की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पूरी नहीं की थी। इसके विपरीत, खेमका का तर्क था कि ऐसे कई आईएएस अधिकारी हैं, जिनके पास इस स्तर पर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का शून्य अनुभव था, फिर भी उन्हें नियमों में विशेष ढील देकर अतिरिक्त सचिव के रूप में एम्पैनल्ड किया गया।

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समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने 29 मई के अपने आदेश में कहा कि हालांकि केंद्र सरकार के पास तीन साल की प्रतिनियुक्ति के नियम में ढील देने का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन इस अधिकार का असमान रूप से उपयोग करना स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि सरकार ऐसा कोई भी अंतर या कारण बताने में असमर्थ रही, जिससे खेमका को अन्य अधिकारियों की तरह छूट देने से रोका जा सके।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमों का यह दोहरा पैमाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत नागरिकों को मिलने वाले समानता के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। ऐसे में खेमका को अन्य समकक्ष अधिकारियों के समान ही लाभ मिलना चाहिए ताकि उनके साथ कोई पूर्वाग्रह या अन्याय न हो।

भविष्य की भूमिकाओं में मिलेगा बराबरी का मौका

चूंकि खेमका 30 अप्रैल 2025 को अपनी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि उन्हें अब सक्रिय सेवा के दौरान मिलने वाले प्रतिनियुक्ति के सीधे लाभ तो नहीं दिए जा सकते। हालांकि, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले किसी भी ऐसे असाइनमेंट या पद के लिए उन्हें उन अधिकारियों के समकक्ष माना जाएगा जो अतिरिक्त सचिव या सचिव के रूप में एम्पैनल्ड हैं। भविष्य की ऐसी नियुक्तियों में उन्हें बराबरी का मौका मिलेगा।

अपने लगभग 34 साल के सिविल सेवा करियर के दौरान 57 बार स्थानांतरित होने वाले अशोक खेमका अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। वह साल 2012 में देशव्यापी चर्चा में आए थे, जब उन्होंने गुरुग्राम में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े एक भूमि सौदे के म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) को रद्द कर दिया था।

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