सीआरपीसी की धारा 216 के तहत केवल आरोपों के ‘प्रस्तावित’ बदलाव के चरण पर आरोपी को आत्मसमर्पण करने और नई जमानत लेने का निर्देश नहीं दिया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने स्पष्ट किया है कि सीआरपीसी की धारा 216 के तहत आरोपों में केवल ‘प्रस्तावित’ बदलाव के चरण में किसी आरोपी को आत्मसमर्पण करने और नई जमानत लेने का निर्देश नहीं दिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से खारिज कर दिया, जिसमें आरोपियों को आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत प्रस्तावित अधिक गंभीर आरोपों के लिए नई जमानत लेने को कहा गया था। इस महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि नई जमानत की कानूनी आवश्यकता तभी शुरू होती है जब आरोपों को अंतिम रूप से बदल दिया जाए, न कि उस शुरुआती चरण में जब आरोपों में बदलाव केवल प्रस्तावित हो या उन पर बहस चल रही हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला गोंडा जिले के पारसपुर थाने में 2 अगस्त 2020 को दर्ज की गई एक एफआईआर (संख्या 0194/2020) से शुरू हुआ था। यह एफआईआर पीड़िता के पिता द्वारा आईपीसी की धारा 354(क) और 506 के तहत दर्ज कराई गई थी, जिसमें घटना की तारीख 2 अगस्त 2020 बताई गई थी और आरोपियों पर बलात्कार का कोई आरोप नहीं था। इसके बाद पुलिस ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज किया, जिसमें उसने बलात्कार का कोई आरोप नहीं लगाया। इसके अलावा, 5 अगस्त 2020 को उसने अपनी मेडिकल जांच कराने से भी इनकार कर दिया।

इसके बाद, 20 अगस्त 2020 को सीआरपीसी की धारा 164 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज किया गया, जिसमें उसने आरोप लगाया कि आरोपियों ने 10 अगस्त 2020 को उसके साथ बलात्कार किया था। इस बीच, 13 अगस्त 2020 को पीड़िता के पिता ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), गोंडा के समक्ष सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन देकर आरोप लगाया कि आरोपियों ने 10 अगस्त 2020 को बलात्कार किया था और इस संबंध में एफआईआर दर्ज करने की मांग की। सीजेएम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 200 के तहत बयान दर्ज करने के लिए पीड़िता को बुलाया, लेकिन उसके उपस्थित न होने के कारण शिकायत को पैरवी के अभाव में खारिज कर दिया गया।

पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद 14 सितंबर 2020 को आईपीसी की धारा 354(क), 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 7/8 के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी। आरोपी अदालत में पेश हुए और उन्हें जमानत मिल गई।

सुनवाई (ट्रायल) के दौरान, 4 सितंबर 2025 को पीड़िता का बयान मुख्य गवाह (PW1) के रूप में दर्ज किया गया। इसके बाद, विशेष लोक अभियोजक (प्रॉसिक्यूटर) ने आरोपों में बदलाव के लिए सीआरपीसी की धारा 216 के तहत एक आवेदन दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को तो खारिज कर दिया, लेकिन आरोपों में बदलाव पर विचार करने के लिए स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही आगे बढ़ाई। 23 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने विवादित आदेश पारित करते हुए माना कि प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 376डीए और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(जी)/6 के तहत आरोप तय करने के आधार मौजूद हैं। कोर्ट ने आरोपियों को इस प्रस्तावित बदलाव पर अपनी दलीलें रखने को कहा और साथ ही उन्हें अदालत में पेश होकर इन नए प्रस्तावित आरोपों के लिए जमानत लेने का निर्देश भी दे दिया।

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पक्षों की दलीलें

आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि हालांकि ट्रायल कोर्ट के पास आरोपों में बदलाव का प्रस्ताव देने और दलीलें सुनने का अधिकार है, लेकिन आरोपियों को आत्मसमर्पण करने और नई जमानत लेने का निर्देश देना पूरी तरह गलत है। उन्होंने तर्क दिया कि सीआरपीसी या किसी भी न्यायिक मिसाल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी आरोपी को उन आरोपों के लिए जमानत लेने को मजबूर करे जो केवल प्रस्तावित हैं और जिन्हें अभी तक औपचारिक रूप से जोड़ा या बदला नहीं गया है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि यदि गंभीर धाराओं को जोड़कर आरोपों को वास्तव में बदल दिया जाता है, तो अपराध की गंभीरता के अनुसार नए जमानत बांड और मुचलके की आवश्यकता होगी, लेकिन जब तक आरोप अंतिम रूप से तय नहीं हो जाते, तब तक जमानत लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अपर सरकारी अधिवक्ता (एजीए) ने इन तर्कों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट का प्रथम दृष्टया निष्कर्ष पीड़िता (PW1) की गवाही जैसे पर्याप्त सबूतों पर आधारित था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ‘बिजेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ और सुप्रीम कोर्ट के ‘हमीदा बनाम रशीद’ मामलों के निर्णयों का हवाला देते हुए राज्य ने तर्क दिया कि जमानत पर विचार करने के लिए हिरासत में होना एक अनिवार्य शर्त है और जब आरोपों को गंभीर अपराधों में बदला जाता है, तो नई जमानत लेना आवश्यक होता है।

शिकायतकर्ता के वकील ने भी राज्य के तर्कों का समर्थन किया। उन्होंने दावा किया कि पुलिस द्वारा पीड़िता के शुरुआती बयानों को ठीक से दर्ज नहीं किया गया था और ट्रायल कोर्ट ने गवाह के रूप में उसकी गवाही सुनने के बाद आरोपों को बदलने की सही दिशा में कदम उठाया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रदीप राम बनाम झारखंड राज्य’ और ‘सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ के मामलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि गंभीर और गैर-जमानती धाराएं जुड़ने के बाद आरोपी को नए सिरे से जमानत के लिए आवेदन करना ही होगा।

कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और संबंधित कानूनों का गहन अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि सीआरपीसी की धारा 216 के तहत ट्रायल कोर्ट के पास फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोपों को बदलने या जोड़ने का अधिकार है। हालांकि, वर्तमान मामले में आरोपों को बदलने की प्रक्रिया अभी केवल अपने शुरुआती चरण में थी।

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जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आईपीसी की धारा 376डीए और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(जी)/6 के तहत आरोप केवल प्रस्तावित थे और इन्हें अंतिम रूप से तय करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह आदेश स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ट्रायल कोर्ट अभी तक इस अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है कि उपरोक्त धाराओं/अपराधों के तहत आरोपों में बदलाव किया जाएगा या उन्हें जोड़ा जाएगा। इसका मतलब यह है कि इस स्तर पर आरोपों में कोई बदलाव नहीं हुआ है और आवेदक अभी भी धारा 376डीए आईपीसी और 5 (जी)/6 पॉक्सो एक्ट के तहत केवल प्रस्तावित आरोपी हैं।”

प्रतिवादियों द्वारा पेश की गई कानूनी मिसालों को अलग करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘हमीदा’ और ‘बिजेंद्र’ मामलों के निर्णय केवल तभी लागू होते हैं जब आरोपों को औपचारिक रूप से अधिक गंभीर अपराधों में बदल दिया गया हो। कोर्ट ने कहा:

“यह कानूनी सिद्धांत स्पष्ट है कि आरोपी व्यक्ति केवल तभी नए सिरे से जमानत के लिए आवेदन करेंगे, जब अपराध/धाराएं अधिक गंभीर आरोपों/अपराधों में बदल दिए जाएं। यह ऐसा कानूनी सिद्धांत नहीं है कि आरोपों में बदलाव या वृद्धि से पहले ही आरोपी को जमानत लेने की आवश्यकता हो, इसलिए उपरोक्त निर्णयों के सिद्धांत वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होते हैं।”

इसी तरह, कोर्ट ने पाया कि ‘प्रदीप राम’ और ‘सुमित’ के मामलों के निर्णय भी यहां लागू नहीं होते क्योंकि वे उन परिस्थितियों से संबंधित थे जहां गंभीर और गैर-जमानती अपराध पहले ही जोड़े जा चुके थे। वर्तमान मामले में सीआरपीसी की धारा 216 के तहत प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“लेकिन यहाँ स्थिति पूरी तरह से अलग है, क्योंकि धारा 216 सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत शुरू की गई प्रक्रिया अभी परिपक्व नहीं हुई है और विचाराधीन है, इसलिए विपक्षी संख्या 2 के वकील द्वारा पेश किए गए कानूनी फैसले भी इस मामले के दायरे में नहीं आते हैं।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘कर्नाटक सरकार बनाम गौरीअम्मा’ मामले के निर्णय का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि तथ्यों में मामूली बदलाव भी किसी न्यायिक निर्णय के कानूनी महत्व को बदल सकता है और अदालती फैसलों को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि आवेदकों को केवल इस बात पर सुनवाई का अवसर दिया गया था कि आरोपों को बदला जाए या नहीं, इसलिए आरोप बदल भी सकते हैं और नहीं भी। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने माना:

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“इसलिए, इस स्तर पर, आवेदकों को आत्मसमर्पण करने और जमानत लेने का निर्देश देने की कोई औचित्यपूर्णता या वैधता नहीं दिखती है।”

कोर्ट का निर्णय / निर्देश

हाईकोर्ट ने घोषित किया कि प्रस्तावित चरण में ही आवेदकों को आत्मसमर्पण करने और जमानत लेने का ट्रायल कोर्ट का निर्देश त्रुटिपूर्ण, स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत और कानूनन अमान्य था।

इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने धारा 482 के तहत दायर इस आवेदन को प्रवेश चरण (एडमिशन स्टेज) पर ही आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने 23 फरवरी 2026 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को केवल उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें आवेदकों को आत्मसमर्पण कर जमानत लेने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश का शेष हिस्सा—जो आरोपों के प्रस्तावित बदलाव पर चल रही कार्यवाही से संबंधित है—पूरी तरह प्रभावी रहेगा और ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही संचालित करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नानके उर्फ शहाबुद्दीन और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रधान सचिव गृह, लखनऊ के माध्यम से और 2 अन्य

वाद संख्या: आवेदन यू/एस 482 संख्या 2922 वर्ष 2026

पीठ: जस्टिस श्री प्रकाश सिंह

निर्णय की तिथि: 13 मई 2026

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