आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पुनर्वास पैकेज के तहत आवंटित की गई भूमि के प्राप्तकर्ता पूर्ण मालिकाना अधिकार (मालिक) नहीं हैं, बल्कि वे “सरकारी भूमि के आवंटी” (Assignee of Government Land) ही रहेंगे।
जस्टिस रवि नाथ तिल्हारी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के ४ नवंबर २०१३ के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें राज्य सरकार को भूमि अधिग्रहण अधिनियम, १८९४ के तहत औपचारिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य सचिव या प्रधान सचिव द्वारा जारी कोई भी प्रशासनिक मेमो, राज्यपाल के नाम पर जारी किए गए किसी मूल शासनादेश (Government Order) को ओवरराइड या संशोधित नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए सरकार द्वारा भूमि का पुनर्ग्रहण (Resumption) पूरी तरह वैध है, और आवंटी केवल भूमि स्वामियों के समान मुआवजे के हकदार हैं, लेकिन वे औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया की मांग नहीं कर सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद श्रीहरिकोटा (नेलोर जिला) से विस्थापित हुए परिवारों के पुनर्वास से जुड़ा है। भारत सरकार द्वारा वहां रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (RLS) स्थापित करने के लिए विस्थापितों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया था। इन विस्थापितों के पुनर्वास के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने २ नवंबर १९७० को एक शासनादेश G.O.Ms.No. 1024 (उद्योग और वाणिज्य विभाग) जारी किया। इसके तहत विस्थापित परिवारों को खेती के लिए निःशुल्क सरकारी भूमि आवंटित की गई (अधिकतम ५ एकड़ शुष्क या २ एकड़ आर्द्र भूमि प्रति परिवार)। बची हुई भूमि को सामान्य आवंटन नीति के तहत अन्य गरीब विस्थापितों को आवंटित किया गया।
दशकों बाद, आंध्र प्रदेश औद्योगिक अवसंरचना निगम (APIIC) और मेसर्स श्री सिटी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा थोंडूर गांव में एक औद्योगिक पार्क/विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) विकसित करने के लिए राज्य सरकार ने इन आवंटित जमीनों को वापस लेने (पुनर्ग्रहण) की प्रक्रिया शुरू की।
इस कदम से मुकदमों के कई दौर शुरू हुए:
- W.P. No. 561 of 2007: बलपूर्वक बेदखली की आशंका से प्रभावित लोगों ने याचिका दायर की। कोर्ट ने १७ जुलाई २००८ को आदेश दिया कि आवंटियों को शासनादेश G.O.Ms.No. 1307 (दिनांक २३ दिसंबर १९९३) के तहत अनुग्रह राशि (ex-gratia) दी जाए।
- पुनर्ग्रहण आदेश (२३ सितंबर २००८): राजस्व मंडल अधिकारी (RDO), तिरुपति ने सहकारी संयुक्त कृषि समिति (CJFS) के पट्टे निरस्त कर दिए और शुष्क भूमि के लिए २.५ लाख रुपये तथा आर्द्र भूमि के लिए ३ लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजे की पेशकश के साथ भूमि का पुनर्ग्रहण कर लिया।
- W.P. No. 26439 of 2008: १८ याचिकाकर्ताओं ने इस पुनर्ग्रहण को चुनौती दी। १५ दिसंबर २००८ को कोर्ट ने मेकला पांडु (Mekala Pandu) मामले के पूर्ण पीठ के सिद्धांतों को लागू करते हुए आदेश दिया कि आवंटी भूमि स्वामियों के समान पूर्ण बाजार मूल्य पर मुआवजा पाने के हकदार हैं, हालांकि कोर्ट ने पुनर्ग्रहण के मूल आदेश को रद्द नहीं किया।
- २१ जुलाई २०१० की कार्यवाही: RDO तिरुपति ने मुआवजे की गणना कर इसे जमा करने का आदेश जारी किया।
- W.P. No. 23208 of 2010: याचिकाकर्ताओं ने इस मुआवजे के आदेश को चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने ४ नवंबर २०१३ को याचिका स्वीकार करते हुए पुनर्ग्रहण और मुआवजे दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। एकल न्यायाधीश ने १६ सितंबर २००० के एक सरकारी मेमो का हवाला देते हुए कहा कि आवंटियों को हस्तांतरण (Alienation) का पूर्ण अधिकार प्राप्त था, इसलिए वे ‘मालिक’ की श्रेणी में आते हैं और उनकी जमीन केवल भूमि अधिग्रहण अधिनियम, १८९४ के तहत ही ली जा सकती है।
वर्तमान अपीलें (W.A. Nos. 205 of 2014, 259 of 2014, और 848 of 2022) क्रमशः श्री सिटी, APIIC और राज्य सरकार द्वारा इसी ४ नवंबर २०१३ के एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं। इसके साथ ही ६१ अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा २००७-०८ के पुनर्ग्रहण को चुनौती देने वाली एक नई रिट याचिका (W.P. No. 26568 of 2014) को भी इसमें सुना गया।
पक्षकारों के मुख्य तर्क
अपीलकर्ताओं (श्री सिटी, APIIC और आंध्र प्रदेश सरकार) के तर्क:
- अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने केवल एक प्रशासनिक मेमो के आधार पर आवंटियों को पूर्ण भूमि स्वामी (मालिक) घोषित कर गंभीर कानूनी भूल की है।
- उनका कहना था कि १६ सितंबर २००० का सरकारी मेमो विशुद्ध रूप से प्रशासनिक है, जिसका कोई वैधानिक आधार नहीं है। यह राज्यपाल के नाम पर जारी मुख्य शासनादेशों (G.O.Ms.No. 1024 या G.O.Ms.No. 1142) को न तो संशोधित कर सकता है और न ही निरस्त कर सकता है।
- उन्होंने न्यायिक अनुशासन का हवाला देते हुए कहा कि जब पूर्व में तीन अलग-अलग समन्वय पीठों (Coordinate Benches) ने याचिकाकर्ताओं को केवल ‘आवंटी’ माना था, तो चौथी रिट याचिका में एकल न्यायाधीश द्वारा उनके विपरीत जाकर उन्हें ‘पूर्ण स्वामी’ घोषित करना कानून सम्मत नहीं है।
- जमीन का पुनर्ग्रहण बहुत पहले किया जा चुका था और उस पर अस्पताल, स्कूल, एक्सप्रेसवे और हेलीपोर्ट जैसी सार्वजनिक प्रणालियों का निर्माण भी हो चुका है।
प्रतिवादियों (मूल याचिकाकर्ताओं) के तर्क:
- याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उन्हें श्रीहरिकोटा में अधिग्रहित उनकी पैतृक भूमि के बदले यह जमीन मिली थी, इसलिए वे “भूमि-के-बदले-भूमि” के सिद्धांत पर पूर्ण मालिक हैं।
- १६ सितंबर २००० का सरकारी मेमो एक वैध स्पष्टीकरण था जिसने यह स्पष्ट किया कि उन्हें हस्तांतरण (बेचने) का अधिकार है, जिसने उनके दर्जे को बढ़ाकर भूमि स्वामी का कर दिया।
- उनका कहना था कि मालिकाना हक होने के कारण सरकार उन्हें केवल प्रशासनिक पुनर्ग्रहण के जरिए बेदखल नहीं कर सकती। संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत उन्हें संपत्ति से वंचित करने के लिए अनिवार्य भूमि अधिग्रहण कानून का पालन करना अनिवार्य था।
कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
जस्टिस रवि नाथ तिल्हारी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने आवंटन की शर्तों, मेमो की कानूनी शक्ति और अधिग्रहण व पुनर्ग्रहण के अंतर पर विस्तृत विश्लेषण किया।
राजस्व प्रविष्टियों और पट्टादार पासबुक की कानूनी स्थिति
अदालत ने स्पष्ट किया कि पट्टादार पासबुक या राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना किसी व्यक्ति को मालिकाना हक नहीं देता:
“यह पूरी तरह स्थापित सिद्धांत है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि अपने आप में न तो मालिकाना हक का सबूत है और न ही यह कोई मालिकाना हक प्रदान करती है।”
सुप्रीम कोर्ट के वडियाला प्रभाकर राव बनाम आंध्र प्रदेश सरकार मामले का संदर्भ देते हुए खंडपीठ ने कहा कि राजस्व प्रविष्टियों का उद्देश्य केवल “वित्तीय” (fiscal) होता है ताकि भू-राजस्व वसूला जा सके। कोर्ट ने येरिकाला सुंकलम्मा मामले से वर्तमान मामले को अलग बताया, क्योंकि उस मामले में आवंटी के पास एक निर्विवाद पंजीकृत विक्रय विलेख (Sale Deed) भी मौजूद था, जो वर्तमान याचिकाकर्ताओं के पास नहीं है।
शासकीय आदेश (G.O.) बनाम प्रशासनिक मेमो की कानूनी वैधता
अदालत ने गहनता से विचार किया कि क्या प्रधान सचिव द्वारा जारी मेमो आवंटन की शर्तों को बदल सकता है। के.वी. रमना राव और पी. तेजेश्वरी मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“कार्यकारी कानून के पदानुक्रम में, सरकार का कोई भी मेमो किसी पूर्व शासनादेश के प्रावधानों को न तो सुपरसीड कर सकता है और न ही उनसे अलग जा सकता है। जब तक कोई आदेश राज्यपाल के नाम पर व्यक्त और नियमों के अनुसार प्रमाणित न हो, उसे सरकार का प्रामाणिक निर्णय नहीं माना जा सकता।”
इस नियम को लागू करते हुए अदालत ने पाया:
“शासनादेश की व्याख्या करने वाला कोई सरकारी मेमो भी उस शासनादेश की मूल शर्तों के विपरीत नहीं हो सकता। हमारे विचार में यह मेमो व्याख्यात्मक नहीं है और यदि इस तर्क को मान भी लिया जाए, तो भी यह शासनादेश संख्या 1024 और 1142 के विपरीत है। इसलिए ऐसी व्याख्या कानून सम्मत नहीं है और यह हस्तांतरण का अधिकार नहीं दे सकती। मूल आवंटन गैर-हस्तांतरणीय (Non-alienable) शर्तों के अधीन ही था।”
अधिग्रहण (Acquisition) और पुनर्ग्रहण (Resumption) में अंतर
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले यदय्या बनाम तेलंगाना राज्य के आलोक में दोनों अवधारणाओं का अंतर स्पष्ट किया:
“अधिग्रहण राज्य का वह सकारात्मक कदम है जिसके द्वारा वह नीतिगत कारणों से किसी व्यक्ति के पूर्व-स्थापित संपत्ति के अधिकार को समाप्त करता है। इसके विपरीत, पुनर्ग्रहण राज्य की वह कार्रवाई है जिसके तहत वह उस संपत्ति या अधिकार को वापस लेता है जिसे उसने स्वयं पहले प्रदान किया था। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 300-A के संदर्भ में ‘पुनर्ग्रहण’ की तुलना ‘अधिग्रहण’ से नहीं की जा सकती।”
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि याचिकाकर्ता मूल स्वामी नहीं बल्कि आवंटी थे, और सरकार ने आवंटन शर्तों के तहत ही भूमि का पुनर्ग्रहण किया है, इसलिए नए सिरे से भूमि अधिग्रहण कानून लागू करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
पूर्व निर्णयों की अंतिमता (Finality of Judgments)
अदालत ने जोर देकर कहा कि पूर्व की समन्वय पीठों द्वारा २००७ और २००८ में दिए गए आदेश, जिसमें पुनर्ग्रहण को बरकरार रखते हुए पूर्ण बाजार मूल्य के बराबर मुआवजे का निर्देश दिया गया था, अंतिम रूप ले चुके थे। ऐसे में चौथी रिट याचिका में एकल न्यायाधीश का विपरीत निर्णय देना न्यायिक अनुशासन के खिलाफ था।
अंतिम निर्णय
- रिट अपीलें स्वीकार: कोर्ट ने एकल न्यायाधीश के ४ नवंबर २०१३ के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था।
- मुआवजे का अधिकार सुरक्षित: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व के अंतिम आदेशों (W.P. No. 561 of 2007 और W.P. No. 26439 of 2008) के तहत निर्धारित किया गया बाजार मूल्य आधारित मुआवजा (मेकला पांडु सिद्धांत के तहत) यदि याचिकाकर्ताओं को अभी तक नहीं मिला है, तो उसका तत्काल भुगतान किया जाए।
- देरी से दाखिल याचिका खारिज: विस्थापन के सात साल बाद दायर की गई रिट याचिका (W.P. No. 26568 of 2014) को कोर्ट ने गंभीर देरी (Laches) के आधार पर खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: मेसर्स श्री सिटी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम एन. सक्कुबायम्मा (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से एवं अन्य (और संबद्ध मामले)
- केस संख्या: रिट अपील संख्या 205, 259 (वर्ष 2014), 848 (वर्ष 2022) एवं रिट याचिका संख्या 26568 (वर्ष 2014)
- पीठ: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिल्हारी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम
- फैसले की तारीख: 11.05.2026

