इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवाओं की विभाग द्वारा पुष्टि कर दी गई है, तो उसका नियमितीकरण उसमें स्वतः ही निहित माना जाएगा। अदालत ने साफ किया कि केवल एक औपचारिक नियमितीकरण आदेश के न होने को आधार बनाकर राज्य सरकार किसी कर्मचारी को पदोन्नति के अवसरों से वंचित नहीं कर सकती।
न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार अपनी खुद की प्रशासनिक कमियों और लापरवाही का फायदा उठाकर लगभग चार दशकों तक सेवा देने वाले किसी कर्मचारी को नुकसान नहीं पहुंचा सकती।
जस्टिस करुणेश सिंह पवार की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता देवा नंद श्रीवास्तव की याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य अधिकारियों को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता को उसके कनिष्ठों की पदोन्नति की तिथि से सहायक चकबंदी अधिकारी के पद पर पदोन्नत करने पर विचार करें। साथ ही उन्हें वरिष्ठता सहित सभी परिणामी लाभ भी दिए जाएं।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता देवा नंद श्रीवास्तव की प्रारंभिक नियुक्ति 11 सितंबर 1986 को बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी, सहारनपुर द्वारा एक मूल नियमित रिक्ति के सापेक्ष चकबंदी लेखपाल के पद पर की गई थी। हालांकि नियुक्ति नियमित पद पर थी, लेकिन नियुक्ति पत्र में भूलवश “स्थानापन्न” शब्द अंकित हो गया था।
तीन वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने के बाद, उत्तर प्रदेश लेखपाल सेवा नियमावली, 1978 के नियम 16 के तहत 1 मार्च 1990 से याचिकाकर्ता की सेवाओं की चकबंदी लेखपाल के पद पर पुष्टि कर दी गई। बिना किसी सेवा व्यवधान के लगातार काम करते रहने के कारण 1 अक्टूबर 2008 को उन्हें ‘उत्तर प्रदेश चकबंदीकर्ता सेवा नियमावली, 1978’ के तहत चकबंदीकर्ता के पद पर पदोन्नत किया गया। इस प्रोन्नत पद पर भी उनकी सेवाओं की पुष्टि 14 मई 2012 को कर दी गई।
31 मई 2022 को जारी चकबंदीकर्ताओं की अंतिम वरिष्ठता सूची में याचिकाकर्ता को क्रमानुसार क्रमांक 48 पर रखा गया था। उत्तर प्रदेश राजस्व चकबंदी सेवा नियमावली, 1992 के तहत अगला पदोन्नति का पद सहायक चकबंदी अधिकारी का है।
विभाग में पदोन्नति में देरी के कारण चकबंदीकर्ताओं के संघ (प्रादेशिक चकबंदीकर्ता संघ) ने 2023 में हाईकोर्ट का रुख किया था। इसके बाद न्यायालय के आदेश पर 19 दिसंबर 2024 को याचिकाकर्ता से कनिष्ठ कई चकबंदीकर्ताओं को सहायक चकबंदी अधिकारी के पद पर पदोन्नत कर दिया गया, लेकिन याचिकाकर्ता को इसमें दरकिनार कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने पहले भी हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी, जिसमें अदालत ने अधिकारियों को उनकी आपत्ति अथवा प्रत्यावेदन का निपटारा करने का निर्देश दिया था। 9 अक्टूबर 2025 को चकबंदी आयुक्त (प्रतिवादी संख्या 3) ने याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति “स्थानापन्न” आधार पर थी और चकबंदी लेखपाल के पद पर उनकी सेवाओं का औपचारिक नियमितीकरण नहीं हुआ था, इसलिए वे सहायक चकबंदी अधिकारी पद पर पदोन्नति के पात्र नहीं हैं। इस आदेश से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने वर्तमान रिट याचिका दायर की थी।
दोनों पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें:
याचिकाकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क किया कि वरिष्ठता सूची में क्रमांक 48 पर होने और पूरी तरह योग्य होने के बावजूद, याचिकाकर्ता की अनदेखी की गई, जबकि उनसे कनिष्ठ कई कर्मचारियों (जैसे क्रमांक 97, 132, 252 आदि) को पदोन्नत कर दिया गया।
अधिवक्ता द्वारा मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु उठाए गए:
- सेवाओं की पुष्टि होने के बाद याचिकाकर्ता का चकबंदीकर्ता के मूल पद पर वैधानिक धारणाधिकार है।
- विभाग की 16 जनवरी 2024 को हुई उच्च स्तरीय बैठक में निर्णय लिया गया था कि स्वीकृत पदों के सापेक्ष तदर्थ या स्थानापन्न आधार पर नियुक्त कर्मचारियों की सेवाओं को उनके स्थायीकरण की तिथि से “मानद नियमित” माना जाएगा।
- बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी, सहारनपुर की 4 मार्च 2024 की रिपोर्ट में भी यह सत्यापित किया गया था कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति एक रिक्त, स्वीकृत और नियमित पद पर ही हुई थी।
- विभाग द्वारा नियमितीकरण का औपचारिक आदेश जारी न करने के कारण पदोन्नति से इनकार करना एक तरह का शत्रुतापूर्ण भेदभाव है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है।
प्रतिवादी (राज्य सरकार) की ओर से दलीलें:
अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क किया कि:
- याचिकाकर्ता की नियुक्ति एक “स्थानापन्न” के रूप में हुई थी और जब तक ‘उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के कार्यक्षेत्र से बाहर के पदों पर तदर्थ नियुक्तियों का नियमितीकरण नियमावली, 1979’ के तहत कोई विशिष्ट नियमितीकरण आदेश पारित नहीं होता, तब तक उन्हें नियमित नहीं माना जा सकता।
- ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए 19 नवंबर 2024 को एक चार सदस्यीय समिति का गठन किया गया था, जिसके समक्ष याचिकाकर्ता उपस्थित हुए थे, लेकिन वे अपने नियमितीकरण से संबंधित कोई भी औपचारिक दस्तावेज पेश करने में असमर्थ रहे।
- विभागीय प्रोन्नति समिति की बैठक 16 दिसंबर 2024 को हुई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को अपात्र पाया गया क्योंकि फीडर कैडर (चकबंदी लेखपाल) में उनकी नियुक्ति स्थानापन्न रूप में थी और उसका नियमितीकरण नहीं हुआ था।
न्यायालय का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने सेवा अभिलेखों की गहन समीक्षा की और नियुक्ति पत्र में प्रयुक्त शब्दावली के साथ-साथ स्थापित कानूनी नजीरों का विश्लेषण किया।
“स्थानापन्न” शब्द की कानूनी व्याख्या:
अदालत ने पाया कि प्रतिवादी विभाग ने स्वयं अपनी रिपोर्टों में यह स्वीकार किया है कि याचिकाकर्ता के प्रारंभिक नियुक्ति पत्र में “स्थानापन्न” शब्द का प्रयोग अनजाने में हुआ था और नियुक्ति वास्तव में एक मूल रिक्त पद पर की गई थी।
इस शब्द की व्याख्या के लिए अदालत ने राम हेत तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2005) के फैसले का सहारा लिया, जो इसी तरह के विवाद से संबंधित था। उस मामले में स्पष्ट किया गया था कि सामान्य सेवा नियमावली में “स्थानापन्न” का अर्थ मूल पद के साथ-साथ किसी अन्य पद का अतिरिक्त प्रभार अस्थायी रूप से संभालना होता है। लेकिन जहां किसी व्यक्ति की पहली बार नए पद पर सीधे नियुक्ति (जैसे याचिकाकर्ता की लेखपाल पद पर) की गई हो, वहां स्थानापन्न शब्द को केवल सीमित अवधि के लिए “तदर्थ” नियुक्ति के रूप में ही समझा जाना चाहिए।
स्थायीकरण और नियमितीकरण के अंतर्संबंध पर:
न्यायालय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि याचिकाकर्ता की सेवाओं को लेखपाल और फिर चकबंदीकर्ता के पद पर बिना किसी शर्त के औपचारिक रूप से स्थायी किया गया था।
अदालत ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णयों—उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य बनाम प्यारे लाल, उत्तर प्रदेश राज्य व 4 अन्य बनाम गोकिल राम, और सैयद मोहम्मद जकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2025)—का उल्लेख करते हुए कहा:
“न्यायालय द्वारा प्यारे लाल, गोकिल और सैयद मोहम्मद जकी मामलों में प्रतिपादित कानून के आलोक में यह पूरी तरह स्थापित है कि नियमितीकरण, स्थायीकरण में ही अंतर्निहित है। एक बार जब किसी कर्मचारी की सेवाओं की पुष्टि कर दी जाती है और उस पुष्टि को अवैधता के आधार पर चुनौती नहीं दी गई हो, तो वह निर्णय अंतिम हो जाता है।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि विभाग की अपनी बैठक (16 जनवरी 2024) में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि यदि नियुक्तियां स्वीकृत पदों की संख्या से अधिक नहीं थीं, तो ऐसे कर्मचारियों को “उनके मूल पद पर स्थायी होने की तिथि से नियमित मान लिया जाएगा।” चूंकि रिपोर्टों से सिद्ध था कि याचिकाकर्ता स्वीकृत पद पर कार्यरत थे, इसलिए वे इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं।
प्रशासनिक लापरवाही और राज्य की निष्क्रियता पर तल्ख टिप्पणी:
अदालत ने विभाग द्वारा अपनी ही नाकामी का हवाला देकर पदोन्नति रोकने के प्रयास की तीखी आलोचना की। कोर्ट ने कहा:
“प्रतिवादियों की ओर से नियमितीकरण का उचित आदेश जारी न करने की प्रशासनिक लापरवाही की सजा याचिकाकर्ता को उसके करियर के अंतिम पड़ाव पर भुगतने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। एक तरफ प्रतिवादी याचिकाकर्ता की सेवाओं को नियमित करने में विफल रहे और दूसरी तरफ वे इस आधार पर आगे की पदोन्नति देने से इनकार कर रहे हैं कि उनकी सेवाएं नियमित नहीं थीं। प्रतिवादी अपनी ही निष्क्रियता का अनुचित लाभ याचिकाकर्ता के नुकसान की कीमत पर उठाने के अधिकारी नहीं हैं।”
न्यायालय ने प्रसिद्ध लैटिन कानूनी सिद्धांत commodum ex injuria sua nemo habere debet (कोई भी व्यक्ति अपनी गलती का अनुचित लाभ नहीं उठा सकता) का उल्लेख किया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने कुशेश्वर प्रसाद सिंह बनाम बिहार राज्य व अन्य (2007) और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मेजर जनरल मदन लाल यादव (1996) में स्थापित किया है।
इसके साथ ही, अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय विनोद कुमार व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य (2024) का हवाला देते हुए दोहराया कि जहां किसी कर्मचारी ने लंबी और निरंतर सेवा दी है और अपने पूरे सेवाकाल में बिना किसी विवाद के पदोन्नति भी प्राप्त की है, वहां “प्रक्रियागत तकनीकी खामियों का सहारा लेकर कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों को परास्त नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट का निर्णय
चकबंदी आयुक्त द्वारा जारी अस्वीकृति आदेश दिनांक 9 अक्टूबर 2025 को “पूरी तरह से आधारहीन और खारिज किए जाने योग्य” पाते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।
अदालत ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- उत्प्रेषण रिट जारी करते हुए 9 अक्टूबर 2025 के विवादित अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया गया।
- परमादेश रिट जारी करते हुए प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता को सहायक चकबंदी अधिकारी के पद पर उस तिथि से पदोन्नत करने पर विचार करें, जिस तिथि से उनके कनिष्ठों को पदोन्नत किया गया था।
- इस पदोन्नति में वरिष्ठता सहित अन्य सभी परिणामी सेवा लाभ शामिल होंगे।
- प्रतिवादियों को इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन महीने के भीतर इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न करने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: देवा नंद श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रधान सचिव (राजस्व विभाग), लखनऊ एवं दो अन्य
- केस संख्या: रिट-ए संख्या 12815 सन 2025 (न्यूट्रल साइटेशन: 2026:एएचसी-एलकेओ:33582)
- पीठ: जस्टिस करुणेश सिंह पवार
- फैसले की तिथि: 11 मई, 2026
- याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: श्री अभिनीत जायसवाल, सुश्री श्रेया जायसवाल
- प्रतिवादियों के अधिवक्ता: श्री राम प्रताप सिंह (अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता), मुख्य स्थायी अधिवक्ता

