वसीयती क्षेत्राधिकार में भी हाई कोर्ट के पास आपराधिक जांच का आदेश देने की पूर्ण शक्तियां: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए फैसला सुनाया है कि वसीयती क्षेत्राधिकार (Testamentary Jurisdiction) का प्रयोग करते समय भी उच्च न्यायालय (High Court) एक संवैधानिक अभिलेख न्यायालय (Constitutional Court of Record) बना रहता है। ऐसी स्थिति में, अदालत की अभिरक्षा में मौजूद किसी संपत्ति (in custodia legis या in medio) को लुटने से बचाने के लिए, हाई कोर्ट के पास पुलिस जांच का निर्देश देने की अपनी अंतर्निहित और पूर्ण शक्तियां (Plenary and Inherent Powers) पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने ‘बाई अवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट’ द्वारा दायर की गई दीवानी अपीलों को खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के दिनांक 16 जुलाई 2024 के फैसले को बरकरार रखा। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिंगल जज के 21 दिसंबर 2018 के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासक को मुंबई पुलिस कमिश्नर के पास आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया गया था ताकि संपत्ति के धन को हेरफेर कर हड़पने की साजिश की जांच की जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई के रहने वाले पारसी पारसी कुंवारे परवेज़ बुर्जोर दलाल की संपत्ति से जुड़ा है, जिनका निधन 7 दिसंबर 2011 को हो गया था। वे अपने पीछे 100 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की चल और अचल संपत्ति छोड़ गए थे। उनकी मृत्यु के बाद दो विरोधी वसीयतें सामने आईं:

  1. पहली वसीयत (दिनांक 22.11.2010): इसे शेरनाज़ फारुख लॉयर (प्रतिवादी नंबर 1) और उनकी दिवंगत मां विली पिरोजशा अवासिया (प्रतिवादी नंबर 2) ने पेश किया, जिसमें उन्होंने खुद को संपत्ति का निष्पादक (executrices) और लाभार्थी होने का दावा किया।
  2. दूसरी वसीयत (दिनांक 08.09.2011): इसे मानेक दारा सुखदवाला ने पेश किया, जिसमें दावा किया गया कि पूरी संपत्ति धर्मार्थ कार्यों के लिए वसीयत की गई है और उन्हें एकमात्र निष्पादक (executor) नियुक्त किया गया है।

दोनों पक्षों ने प्रोबेट के लिए याचिकाएं दायर कीं, जिन्हें बाद में वसीयती मुकदमों (Testamentary Suits) में बदल दिया गया।

24 दिसंबर 2013 को बॉम्बे हाई कोर्ट के सिंगल जज ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (ISA) की धारा 247 के तहत मिस्टर जोनाथन सोलोमन को इस संपत्ति का वादकालीन प्रशासक (Administrator pendente lite) नियुक्त किया। जांच के दौरान प्रशासक ने पाया कि उनकी नियुक्ति से ठीक पहले और वसीयतकर्ता की मृत्यु के तुरंत बाद, सुखदवाला ने कोटक महिंद्रा बैंक में “एस्टेट ऑफ परवेज़ बुर्जोर दलाल” के नाम से एक खाता खोला था और उससे निम्नलिखित दो बड़े लेनदेन किए थे:

  • 17,08,147/- रुपये दिनांक 24 मार्च 2012 को मैसर्स अमूहा ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड (Amoha) को ट्रांसफर किए गए।
  • 15,00,000/- रुपये दिनांक 11 अप्रैल 2012 को अपीलकर्ता ‘बाई अवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट फॉर चैरिटेबल ऑब्जेक्ट्स’ को ट्रांसफर किए गए।

प्रशासक की जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि बाई अवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट, अमूहा ट्रेडर्स और इस मामले से जुड़ी अन्य कंपनियां (जैसे क्रेटोस एनर्जी और कैनोस ट्रेडिंग) एक ही पते, टेलीफोन नंबर और ईमेल पते का उपयोग कर रही थीं, जो जमशेद मिनोचर पांडे (जिमी पांडे) से जुड़े थे। यह भी पता चला कि कैनोस ट्रेडिंग (जिसमें सुखदवाला के शेयर थे) ने कथित तौर पर मृत वसीयतकर्ता को 2015 में — यानी उनकी मृत्यु के चार साल बाद — 69 लाख रुपये से अधिक का ऋण दिया था। इसके अलावा, जहां सुखदवाला ने दावा किया कि इस ट्रस्ट की स्थापना 1954 में उद्योगपति नवल टाटा द्वारा की गई थी, वहीं प्रतिवादियों द्वारा पेश दस्तावेजों से संकेत मिला कि यह 1943 का एक निष्क्रिय पारसी पारिवारिक ट्रस्ट था, जिसे 2011 में वसीयत निष्पादन के समय ही अचानक सक्रिय (revived) किया गया था।

इन संदिग्ध गतिविधियों और सुखदवाला व संबंधित संस्थाओं के असहयोगपूर्ण रवैये को देखते हुए, सिंगल जज ने 21 दिसंबर 2018 को संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्रशासक को मुंबई पुलिस में आपराधिक शिकायत दर्ज कराने और अदालत की निगरानी में जांच कराने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ दायर की गई अपीलों को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 16 जुलाई 2024 को खारिज कर दिया था।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (ट्रस्ट और अन्य) के तर्क:

  • वसीयत अदालत (Testamentary Court) का अधिकार क्षेत्र केवल वसीयत की प्रामाणिकता और उसके निष्पादन की जांच करने तक सीमित है, जैसा कि कंवरजीत सिंह ढिल्लों बनाम हरदयाल सिंह ढिल्लों (2007) में तय किया गया है। कोर्ट किसी “तथ्य-खोज और खोजी” (phishing and roving) आपराधिक जांच का आदेश नहीं दे सकता।
  • भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 एक संपूर्ण और स्वतः पूर्ण संहिता (self-contained code) है (फर्स्ट डे लॉसन लिमिटेड बनाम जिंदल एक्सपोर्ट्स लिमिटेड, 2011)। यदि संपत्ति में अनधिकृत हस्तक्षेप का आरोप था, तो अधिनियम की धारा 192, 208 या 269 के तहत ही उपाय किए जाने चाहिए थे।
  • अधिनियम की धारा 211, 227 और 307 के तहत, एक निष्पादक को प्रोबेट मिलने से पहले भी संपत्ति के लेन-देन का अधिकार होता है। इसलिए, ट्रस्ट और अमूहा ट्रेडर्स को किए गए भुगतान अवैध नहीं थे।
  • हाई कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 340 के तहत अनिवार्य प्रारंभिक जांच की अनदेखी की।
  • पुलिस का उपयोग दीवानी विवादों में निजी पक्षों के लिए सबूत इकट्ठा करने या वसूली एजेंट के रूप में नहीं किया जा सकता।

प्रतिवादियों (मूल वादी और प्रशासक) के तर्क:

  • वसीयती क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय भी हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों और संवैधानिक गरिमा को नहीं खोता।
  • जब संपत्ति विवादित हो और न्यायालय के प्रशासक की कस्टडी में हो (in medio), तो कोई भी स्वघोषित निष्पादक मनमाने ढंग से संपत्ति का लेन-देन नहीं कर सकता।
  • निष्पादक ने जिमी पांडे के साथ मिलकर एक ही पते और संपर्क सूत्रों वाली मुखौटा कंपनियों के जरिए पैसे ट्रांसफर किए।
  • अपीलकर्ताओं के कपटपूर्ण और टालमटोल वाले रवैये के कारण न्यायालय के पास सच सामने लाने के लिए पुलिस जांच के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
  • यह आदेश विशुद्ध रूप से CrPC की धारा 340 के तहत नहीं था, बल्कि कोर्ट के आदेशों की अवहेलना और असहयोग के खिलाफ अदालत की अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग था। इससे अपीलकर्ताओं के अधिकारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता क्योंकि वे जांच के दौरान अपना पक्ष रख सकते हैं।
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न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की दलीलों को खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले की पुष्टि की।

प्रशासक की स्थिति और कोर्ट की कस्टडी में संपत्ति

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 247 के तहत नियुक्त प्रशासक अदालत का एक अधिकारी और “अदालत का हाथ” होता है, जिसकी स्थिति एक रिसीवर जैसी होती है। पांडुरंग शामराव लाड बनाम द्वारकादास कालियानदास (1932) और एंथनी सी. लियो बनाम नंदलाल बाल कृष्णन (1996) के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब संपत्ति न्यायालय की कस्टडी में हो:

“यदि ऐसी संपत्ति के संरक्षण के लिए दीवानी या आपराधिक न्यायालय में कार्रवाई आवश्यक है, तो रिसीवर का कर्तव्य है कि वह इस कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता वाले प्रासंगिक तथ्यों को न्यायालय के ध्यान में लाए और संपत्ति के संरक्षण के लिए उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करने की अनुमति प्राप्त करे।”

अभिलेख न्यायालय के रूप में हाई कोर्ट की असीमित शक्तियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि वसीयती क्षेत्राधिकार हाई कोर्ट को उसकी संवैधानिक शक्तियों से वंचित करता है। एम.वी. एलिजाबेथ बनाम हरवन इन्वेस्टमेंट एंड ट्रेडिंग प्रा. लि. (1993) का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि उच्च न्यायालयों के पास अंतर्निहित और पूर्ण शक्तियां होती हैं:

“…जहां कानून मौन हैं और बुनियादी सिद्धांतों के आधार पर अदालतों से उपाय मांगा जाना है, वहां यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह सादृश्यता (analogy) और समीचीनता (expediency) के आधार पर प्रक्रियात्मक नियम तैयार करे।”

अदालत के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“…ऐसा करते समय यदि हाई कोर्ट को गंभीर अनियमितताएं दिखती हैं या हाई कोर्ट को लगता है कि निष्पादक द्वारा कोई शरारत की गई है, तो ऐसी स्थिति में हाई कोर्ट मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता और संपत्ति की रक्षा के लिए उसे अपनी पूर्ण और संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करना ही होगा।”

निष्पादक के अधिकारों की सीमा और धन की हेराफेरी

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित वसीयत के निष्पादक द्वारा किए गए लेन-देन की कड़े शब्दों में निंदा की और कानून की सीमा स्पष्ट की:

“यद्यपि एक निष्पादक को अपने अधिकार वसीयत से मिलते हैं, लेकिन यह अधिकार लूटपाट करने का कोई लाइसेंस नहीं है। जहां दो प्रतिद्वंद्वी वसीयतें पेश की गई हों और मामला गंभीर रूप से विवादित हो, और संपत्ति न्यायालय की कस्टडी में हो, वहां किसी विवादित वसीयत का निष्पादक अपने सहयोगियों से जुड़े निष्क्रिय ट्रस्टों को संपत्ति की नकदी संपत्ति मनमाने ढंग से हस्तांतरित करना शुरू नहीं कर सकता।”

अदालत ने टिप्पणी की कि वसीयत निष्पादन के समय ही 1943 के एक निष्क्रिय ट्रस्ट को अचानक जीवित करना “अनधिकृत हस्तक्षेप और धन की हेराफेरी का एक स्पष्ट उदाहरण” है।

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CrPC की धारा 340 की लागू योग्यता

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाई कोर्ट ने CrPC की धारा 340 की प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आपराधिक जांच केवल अदालत के भीतर न्याय प्रशासन को प्रभावित करने वाले किसी अपराध (जैसे झूठी गवाही) के लिए नहीं दी गई थी, बल्कि बैंकिंग धोखाधड़ी और साजिश के व्यापक नेटवर्क की जांच के लिए संवैधानिक शक्तियों के तहत दी गई थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि धारा 340(3)(a) के तहत जब शिकायतकर्ता न्यायालय स्वयं हाई कोर्ट हो, तो हाई कोर्ट रजिस्ट्री का कोई भी नामित अधिकारी शिकायत दर्ज करा सकता है।

कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के संजीव कुमार मित्तल बनाम राज्य (2010) मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब अदालत या संपत्ति के साथ बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का पता चलता है, तो अदालत को किसी भी जांच एजेंसी को जांच और रिपोर्ट सौंपने का निर्देश देने का पूरा अधिकार है।

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः पाया कि अपीलकर्ताओं की अपीलों में कोई योग्यता नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश की पुष्टि करते हुए पीठ ने निष्कर्ष निकाला:

“अपीलकर्ताओं और उनसे जुड़ी संस्थाओं का आचरण स्वर्गीय परवेज़ बुर्जोर दलाल की संपत्ति को नष्ट करने और प्रशासक के काम में बाधा डालने के एक संगठित और कपटपूर्ण प्रयास को दर्शाता है। हाई कोर्ट इस प्रक्रिया के दुरुपयोग को चुपचाप देखते रहने के बजाय हस्तक्षेप करने के लिए पूरी तरह न्यायसंगत था। संपत्ति की सुरक्षा और कानून की गरिमा को बनाए रखने के लिए संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत जांच का आदेश देना न केवल कानूनी रूप से सही था, बल्कि बेहद जरूरी भी था।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जांच शुरू होने से अपीलकर्ताओं के व्यक्तिगत अधिकारों को कोई वास्तविक या कानूनी नुकसान नहीं पहुंचता है और उन्हें जांच एजेंसी के समक्ष अपने सारे रिकॉर्ड और पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज कर दिया और संबंधित जांच अधिकारियों को आदेश दिया कि वे इस मामले की जांच तेजी से पूरी करें और अपनी प्रगति रिपोर्ट उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दाखिल करें।

केस विवरण 

  • केस का नाम: बाई अवाबाई होरमुसजी टाटा ट्रस्ट बनाम शेरनाज़ फारुख लॉयर एवं अन्य (संबंधित अपीलों के साथ)
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ______ / 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 25107 / 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: माननीय जस्टिस पंकज मिथल और माननीय जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • फैसले की तारीख: 25 मई, 2026

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