अग्निवीरों को पेंशन में समानता नहीं: केंद्र ने बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा— ‘नियमित सैनिकों से अलग है यह स्कीम’

केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को सूचित किया है कि अग्निवीर अपने परिजनों के लिए पेंशन लाभ के मामले में नियमित सैनिकों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते। सरकार का तर्क है कि ये दोनों श्रेणियां “अलग-अलग” हैं और उनकी सेवा की शर्तें भी पूरी तरह भिन्न हैं।

पिछले सप्ताह दाखिल किए गए एक हलफनामे में, केंद्र ने अग्निपथ योजना की संरचना की संवैधानिक वैधता का बचाव किया। सरकार ने स्पष्ट किया कि लाभों में यह अंतर राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों पर आधारित एक नीतिगत निर्णय है और यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है।

सरकार का यह जवाब ज्योतिबाई नाइक द्वारा दायर एक याचिका के संदर्भ में आया है। ज्योतिबाई, अग्निवीर मुरली नाइक की मां हैं, जो पिछले साल 9 मई को जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सीमा पार से हुई भारी गोलाबारी में शहीद हो गए थे।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील संदेश मोरे, हेमंत घाडीगांवकर और हितेंद्र गांधी ने दलील दी कि अग्निपथ योजना एक “मनमाना” और “भेदभावपूर्ण” अंतर पैदा करती है। याचिका में कहा गया कि चूंकि अग्निवीर भी नियमित सैनिकों की तरह ही कर्तव्यों का पालन करते हैं और उन्हीं जानलेवा जोखिमों का सामना करते हैं, इसलिए उनके परिवारों को भी पूर्ण मृत्यु लाभ और दीर्घकालिक पेंशन मिलनी चाहिए।

पेंशन की मांग को खारिज करते हुए केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा कि अग्निवीर और नियमित सैनिक “एक समान स्थिति” में नहीं हैं। सरकार के अनुसार, जहां नियमित सेवा एक दीर्घकालिक करियर है, वहीं अग्निपथ योजना वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए चार साल की एक अल्पकालिक नियुक्ति है।

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हलफनामे में कहा गया, “दो अलग-अलग श्रेणियों के व्यक्तियों के बीच समानता नहीं हो सकती। यह वर्गीकरण अग्निपथ योजना के उद्देश्यों के साथ एक तर्कसंगत संबंध रखता है और इसलिए संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत वैध है।”

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह वर्गीकरण सेवा की अवधि, नियुक्ति की प्रकृति और भर्ती की शर्तों जैसे “स्पष्ट अंतर” (Intelligible Differentia) पर आधारित है।

केंद्र ने जोर देकर कहा कि अग्निपथ योजना सशस्त्र बलों को “युवा, फुर्तीला और तकनीकी रूप से उन्नत” बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव है। सीमा की जटिल स्थिति और पड़ोसी देशों द्वारा घुसपैठ की कोशिशों का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि भारत को एक ऐसी विशिष्ट सेना की आवश्यकता है जो छद्म युद्ध और आक्रामकता का सामना कर सके।

हलफनामे में यह भी उल्लेख किया गया कि राष्ट्रीय अखंडता और सुरक्षा से जुड़े नीतिगत निर्णयों में न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश सीमित होती है। दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस योजना की संवैधानिक वैधता को बरकरार रख चुके हैं।

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मुरली नाइक के मामले का जिक्र करते हुए सरकार ने बताया कि उन्हें ‘बैटल कैजुअल्टी’ घोषित किया गया था और उनका अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया था। केंद्र के अनुसार, उनकी मां को रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर से संवेदना पत्र भी भेजा गया था, जैसा कि नियमित सैनिकों के लिए किया जाता है।

आर्थिक सहायता के मुद्दे पर हलफनामे में कहा गया: “अग्निपथ योजना के तहत सभी स्वीकार्य वित्तीय और टर्मिनल लाभ याचिकाकर्ता को दिए जा चुके हैं। कुल मुआवजा लगभग 2.3 करोड़ रुपये है, जिसमें बीमा कवर और अन्य सहायता शामिल है।”

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सरकार ने यह भी कहा कि भर्ती के समय योजना की शर्तों को स्वीकार करने के बाद, याचिकाकर्ता अब पिछली तारीख से नियमित सैनिक के लाभों की मांग नहीं कर सकतीं।

इस मामले की अगली सुनवाई 18 जून को होगी।

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