उत्तर प्रदेश में समीक्षा अधिकारी (RO) और सहायक समीक्षा अधिकारी (ARO) भर्ती परीक्षा 2023 को लेकर एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आरक्षण नियमों के पालन में कथित विसंगतियों के चलते चयनित उम्मीदवारों की आगे की ज्वॉइनिंग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
न्यायालय का यह आदेश उन अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है जो नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने विवेक यादव और अन्य द्वारा दायर एक विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया।
क्या है पूरा विवाद?
मामले की जड़ें प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों में छिपी हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील आलोक मिश्रा ने अदालत में दलील दी कि आरक्षण नीति को लागू करने में गंभीर चूक हुई है। उन्होंने साक्ष्यों के साथ बताया कि ओबीसी (OBC) श्रेणी के कई ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्होंने सामान्य श्रेणी (General Category) के कम से कम 25 उन अभ्यर्थियों से अधिक अंक प्राप्त किए थे, जिन्हें मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया था।
वकील का तर्क है कि उच्च अंक प्राप्त करने के बावजूद ओबीसी उम्मीदवारों को प्रारंभिक परीक्षा में असफल कर दिया गया और उन्हें भर्ती प्रक्रिया से बाहर रखा गया, जो संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
UPPSC और सरकार का पक्ष
राज्य सरकार और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) ने कोर्ट में इस रोक का कड़ा विरोध किया। आयोग के प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि भर्ती प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है और अधिकांश सफल उम्मीदवारों को पहले ही नियुक्त किया जा चुका है। हालांकि, अदालत ने चयन प्रक्रिया की शुचिता और आरक्षण के सही क्रियान्वयन को प्राथमिकता देते हुए फिलहाल नियुक्तियों पर ब्रेक लगा दिया है।
यह कानूनी लड़ाई 1 फरवरी, 2026 के उस आदेश के खिलाफ शुरू हुई है, जिसमें एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। अब खंडपीठ ने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए 12 मई को अगली सुनवाई तय की है। आगामी सुनवाई में यह स्पष्ट होने की संभावना है कि क्या आयोग को परिणाम संशोधित करने होंगे या वर्तमान चयन सूची ही प्रभावी रहेगी।

