बीफ परिवहन के बिना सबूत के वाहन जब्त करना ‘अवैध’, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को ₹2 लाख मुआवजे का दिया आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उस व्यक्ति को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिसका वाहन 2024 में बीफ परिवहन के अप्रमाणित आरोप में जब्त कर लिया गया था। लखनऊ बेंच के न्यायमूर्ति संदीप जैन ने जब्ती के आदेशों को रद्द करते हुए अधिकारियों की इस कार्रवाई को “मनमाना, अवैध और अनुचित” करार दिया। कोर्ट ने पाया कि राज्य यह साबित करने में विफल रहा कि बरामद मांस वास्तव में बीफ ही था।

यह मामला 18 अक्टूबर, 2024 का है, जब बागपत के अधिकारियों ने याचिकाकर्ता मोहम्मद चांद के वाहन को इस संदेह में जब्त कर लिया था कि उसका उपयोग पांच गायों के मांस (बीफ) को ले जाने के लिए किया जा रहा था। यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 के तहत की गई थी।

मोहम्मद चांद ने बागपत के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित जब्ती आदेश को चुनौती दी थी। जब मेरठ मंडल के आयुक्त ने उनकी अपील खारिज कर दी, तो उन्होंने रिट याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि जिस पशु चिकित्सक ने मांस का परीक्षण किया था, वह यह स्पष्ट नहीं कर सके कि वह बीफ ही था। डॉक्टर ने केवल यह उल्लेख किया था कि मांस के गाय या उसकी संतति का होने का “संदेह” है और इसके लिए प्रयोगशाला में परीक्षण की सिफारिश की थी।

हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि राज्य सरकार किसी अधिकृत प्रयोगशाला की ऐसी कोई रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी जो इन आरोपों की पुष्टि करती हो।

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कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा, “यह साबित करने का भार राज्य पर था कि जब्त किया गया मांस बीफ था। अधिकारियों ने इस मुद्दे की जांच किए बिना याचिकाकर्ता के वाहन को जब्त कर लिया, जो 1955 के अधिनियम के प्रावधानों के तहत मनमाना, अवैध और अनुचित है।”

हाईकोर्ट ने वाहन की लंबी जब्ती के कारण याचिकाकर्ता को हुए गंभीर आर्थिक नुकसान को रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि वाहन ही उसकी आजीविका का मुख्य साधन था।

27 अप्रैल के अपने आदेश में न्यायमूर्ति जैन ने कहा, “याचिकाकर्ता को 18 अक्टूबर, 2024 से इस वाहन के माध्यम से होने वाली कमाई से वंचित रखा गया है, जब इसे राज्य अधिकारियों द्वारा अवैध रूप से जब्त किया गया था। तब से अब तक 18 महीने से अधिक का समय बीत चुका है।”

बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि अधिकारियों की “अवैध और मनमानी” कार्रवाई के कारण याचिकाकर्ता के आर्थिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन हुआ है।

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हाईकोर्ट ने तीन दिनों के भीतर वाहन को छोड़ने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता को हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार को 2 लाख रुपये का हर्जाना देने का निर्देश दिया गया है।

इसके साथ ही, कोर्ट ने राज्य को यह छूट भी दी है कि वह मुआवजे की यह राशि उन संबंधित अधिकारियों से वसूल कर सकता है जो इस गलत जब्ती और जब्ती की कार्यवाही के लिए जिम्मेदार थे।

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