इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नगर निगम वाराणसी के तत्कालीन जोनल ऑफिसर रामेश्वर दयाल की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) जैसी अर्ध-न्यायिक कार्यवाही के दौरान किसी आदेश में कानूनी त्रुटि होने का अर्थ स्वतः यह नहीं लगाया जा सकता कि अधिकारी ने कदाचार (Misconduct) किया है, जब तक कि भ्रष्टाचार या किसी बाहरी प्रभाव का कोई ठोस सबूत न हो।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने दयाल की याचिका को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि उनके खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही “दोषपूर्ण” थी और “बिना किसी सबूत” के आधारित थी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता रामेश्वर दयाल वाराणसी नगर निगम में जोनल ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। 16 फरवरी 2022 को उन्होंने एक पंजीकृत बैनामे (Sale Deed) के आधार पर मकान नंबर डी-28/105 के दाखिल-खारिज का आदेश पारित किया था। यह आदेश मुख्य रूप से टैक्स वसूली के उद्देश्य से राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने के लिए था।
एक शिकायतकर्ता, राज कुमार की शिकायत पर विभाग ने दयाल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की। 12 दिसंबर 2022 को जारी चार्जशीट में उन पर छह आरोप लगाए गए, जिसमें कहा गया कि उन्होंने “अत्यधिक जल्दबाजी” दिखाई और यह ध्यान देने में विफल रहे कि संबंधित संपत्ति एक “सार्वजनिक देवोत्तर” (Public Endowment) संपत्ति थी। विभाग का आरोप था कि दयाल ने कानूनी राय की अनदेखी की और बिना स्थलीय निरीक्षण (Spot Inspection) के आदेश पारित कर दिया, जिससे विभाग की छवि धूमिल हुई। जांच अधिकारी ने सभी आरोपों को सिद्ध माना, जिसके बाद दयाल को सेवा से हटा दिया गया।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे ने तर्क दिया कि दाखिल-खारिज की कार्यवाही संक्षिप्त (Summary) प्रकृति की होती है और यह किसी संपत्ति के मालिकाना हक (Title) का निर्धारण नहीं करती। उन्होंने कहा कि दयाल का आदेश एक पंजीकृत बैनामे पर आधारित था जिसे किसी भी सक्षम न्यायालय द्वारा रद्द नहीं किया गया था। यह भी तर्क दिया गया कि जांच के दौरान कोई मौखिक सुनवाई नहीं की गई, जिससे यह प्रक्रिया दोषपूर्ण हो गई।
वहीं, राज्य और नगर निगम की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और देवोत्तर संपत्ति के स्वरूप को नजरअंदाज किया। उन्होंने तर्क दिया कि अधिकारी को दी गई कानूनी राय को भी दरकिनार कर दिया गया था, जो उनके कदाचार को दर्शाता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने दाखिल-खारिज कार्यवाही के स्थापित कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल टैक्स वसूली जैसे वित्तीय कार्यों के लिए होता है। सुप्रीम कोर्ट के करम सिंह बनाम अमरजीत सिंह (2025) मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि म्यूटेशन प्रविष्टियों से मालिकाना हक नहीं मिलता है।
अर्ध-न्यायिक आदेशों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आदेश का गलत होना कार्यवाही का आधार नहीं बन सकता। हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:
“दाखिल-खारिज आवेदन पर पारित आदेश किसी बाहरी कारक या भ्रष्ट मंशा से प्रभावित था, ऐसा कोई आरोप नहीं है। यदि आदेश बिना किसी बेईमानी के नेक नीयती (Good Faith) में पारित किया गया है, तो पूरी अनुशासनात्मक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि म्यूटेशन अधिकारी पंजीकृत बैनामे की वैधता या विक्रेता के अधिकार की जांच करने के लिए बैनामे की सीमाओं से बाहर नहीं जा सकता, खासकर तब जब बैनामा सिविल कोर्ट में चुनौतीपूर्ण न हो।
झुंजारराव भिकाजी नागरकर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1999) मामले का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“अर्ध-न्यायिक अधिकारी द्वारा किसी विशेष निर्णय में की गई त्रुटि का अर्थ स्वतः कदाचार या पक्षपात नहीं होता है। न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु कानूनी गलती के अलावा बाहरी प्रभाव का स्पष्ट साक्ष्य होना आवश्यक है।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि जोनल ऑफिसर पर लगाए गए आरोप साबित नहीं किए जा सकते थे क्योंकि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो टैक्स ऑफिसर को सरकारी वकील की राय मानने या बैनामे के अलावा विक्रेता की क्षमता की जांच करने के लिए बाध्य करता हो।
अंत में, कोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी के निष्कर्षों को “मनमाना” करार देते हुए कहा:
“कोर्ट का मानना है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करना ही दोषपूर्ण था… यह उन दुर्लभ मामलों में से एक है जहां सीमित समीक्षा अधिकार क्षेत्र के तहत भी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।”
हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को इसके सभी कानूनी लाभ प्रदान किए जाएं।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: रामेश्वर दयाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 4 अन्य
- केस नंबर: रिट ए संख्या 1456 ऑफ 2025
- पीठ: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
- निर्णय की तिथि: 17 अप्रैल, 2026

