दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के उम्मीदवारों को आयु सीमा में छूट और अतिरिक्त प्रयास देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि EWS श्रेणी, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के साथ “स्वचालित समानता” (automatic parity) का दावा नहीं कर सकती।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने टिप्पणी की कि EWS श्रेणी के सामने आने वाली चुनौतियां मुख्य रूप से वित्तीय संसाधनों की कमी से जुड़ी हैं, जो SC, ST और OBC समूहों द्वारा झेले गए “संरचनात्मक और स्थायी” सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से मौलिक रूप से भिन्न हैं।
यह निर्णय उन EWS उम्मीदवारों की याचिका पर आया है जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य केंद्र सरकार की भर्तियों में अन्य आरक्षित श्रेणियों के समान रियायतों की मांग की थी।
वर्तमान नियमों के अनुसार, SC/ST उम्मीदवारों को अधिकतम आयु सीमा में पांच वर्ष और OBC उम्मीदवारों को तीन वर्ष की छूट मिलती है, साथ ही उन्हें परीक्षा में बैठने के अतिरिक्त अवसर भी दिए जाते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि EWS श्रेणी को इन लाभों से वंचित रखना मनमाना और असंवैधानिक है।
हाईकोर्ट ने विभिन्न समूहों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि जहाँ EWS का आधार वित्तीय स्थिति है, वहीं SC, ST और OBC श्रेणियों का आधार पीढ़ियों से चला आ रहा सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव है।
पीठ ने कहा, “इन समूहों ने अपनी जाति के कारण पीढ़ियों से भेदभाव और बहिष्कार का सामना किया है; इस तरह का नुकसान संरचनात्मक और स्थायी है। आर्थिक स्थिति के विपरीत, जाति कोई परिवर्तनशील कारक नहीं है; यह जन्म से तय होती है और इसे बदला नहीं जा सकता।”
अदालत ने आगे जोर देकर कहा कि आर्थिक स्थिति “तरल” (fluid) होती है और समय या पीढ़ियों के साथ बदल सकती है, जबकि एक वंचित जाति में जन्म लेने के परिणाम व्यक्ति के पूरे जीवन भर बने रहते हैं। हाईकोर्ट के अनुसार, EWS व्यक्तियों द्वारा सामना की जाने वाली वंचना की तुलना जाति-आधारित भेदभाव से नहीं की जा सकती, जिसके साथ कुछ हद तक स्थायी सामाजिक कलंक जुड़ा होता है।
पीठ ने रेखांकित किया कि विधायिका EWS उम्मीदवारों की स्थिति से पूरी तरह अवगत थी, इसीलिए 2019 में 103वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से उन्हें आरक्षण प्रदान किया गया।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि “अतिरिक्त छूट” देने के निर्णय में प्रशासनिक व्यवहार्यता, वित्तीय प्रभाव और मौजूदा आरक्षण ढांचे पर पड़ने वाले असर जैसे जटिल मापदंडों का मूल्यांकन शामिल होता है। ये मामले पूरी तरह से विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जिनमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की मांग को खारिज करते हुए 31 जनवरी 2019 के आधिकारिक ज्ञापन (Office Memorandum) और सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2024 के अधिसूचनाओं को रद्द करने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने दोहराया कि संवैधानिक ढांचा स्वयं EWS और SC/ST/OBC श्रेणियों के बीच अंतर को स्वीकार करता है। एक बार सभी को आरक्षण प्रदान कर दिए जाने के बाद, अलग-अलग श्रेणियों को अलग-अलग रियायतें देना भेदभाव की श्रेणी में नहीं आता है।

