सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम (COFEPOSA) के तहत दो व्यक्तियों की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमेइ कापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि COFEPOSA अधिनियम की धारा 8(e) और संविधान के अनुच्छेद 22(3)(b) के तहत, एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष किसी वकील के माध्यम से उपस्थित होने का अधिकार हिरासत में लिए गए व्यक्ति (detenu) को तब तक नहीं है, जब तक कि हिरासत में लेने वाली अथॉरिटी भी कानूनी सलाहकार की सहायता न ले रही हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 3 मार्च, 2025 को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर श्रीमती हर्षवर्धन रानी की गिरफ्तारी से शुरू हुआ था। राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) ने उनके पास से लगभग 14.2 किलोग्राम वजन के 17 विदेशी मार्क वाले सोने के बिस्कुट बरामद किए थे। सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 108 के तहत उनके बयान दर्ज किए गए, जिससे यह संकेत मिला कि श्री साहिल सरकारिया जैन ने नवंबर 2024 और फरवरी 2025 के बीच सोने की खेप के निपटान में सहायता की थी।
इसके परिणामस्वरूप, 22 अप्रैल 2025 को दोनों के खिलाफ COFEPOSA अधिनियम की धारा 3(1) के तहत हिरासत के आदेश जारी किए गए। कर्नाटक हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर, 2025 को इन आदेशों को बरकरार रखा था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आर. बसंत और वकील अमोल बी. करांडे ने तर्क दिया कि:
- कानूनी सहायता: एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष वकील रखने की अनुमति न देना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है।
- दस्तावेजों की कमी: सीसीटीवी फुटेज वाली पेन ड्राइव जेल में केवल एक बार दिखाई गई और बाद में परिवार को दे दी गई, जो नियमानुसार सही तामील नहीं है।
- अथॉरिटी की क्षमता: तर्क दिया गया कि उनकी आपत्तियों को एक अक्षम अधिकारी (निदेशक, COFEPOSA) ने खारिज किया, न कि केंद्र सरकार या सक्षम अथॉरिटी ने।
- साहिल जैन का पक्ष: उनके लिए तर्क दिया गया कि फरवरी 2024 की घटनाओं और मार्च 2025 की घटना के बीच कोई “लाइव-लिंक” या निकटता नहीं है।
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने स्पष्ट किया कि एडवाइजरी बोर्ड की सुनवाई में मौजूद अधिकारी केवल रिकॉर्ड पेश करने के लिए थे और उन्होंने “वकील” की भूमिका नहीं निभाई थी। उन्होंने यह भी कहा कि सभी आवश्यक दस्तावेजों की अनुवादित प्रतियां समय पर दी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22(3)(b) और COFEPOSA अधिनियम की धारा 8(e) के बीच संबंधों का विश्लेषण किया।
कानूनी प्रतिनिधित्व पर: ए.के. रॉय बनाम भारत संघ (1982) मामले में संविधान पीठ के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“हिरासत में लिया गया व्यक्ति (detenu) अधिकार के तौर पर कानूनी सहायता की मांग नहीं कर सकता। COFEPOSA अधिनियम की धारा 8(c) के तहत सुनवाई केवल हिरासत में लिए गए व्यक्ति के लिए है, और इसलिए रिकॉर्ड पेश करने वाले अधिकारी की बोर्ड के सामने कोई अन्य भूमिका नहीं है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकील रखने का अधिकार केवल तभी मिलता है जब अथॉरिटी खुद किसी कानूनी सलाहकार की मदद लेती है।
पेन ड्राइव और दस्तावेजों की तामील पर: कोर्ट ने पाया कि जेल में लैपटॉप पर पेन ड्राइव की सामग्री दिखाना और परिवार को सूचित करना पर्याप्त तामील है।
“जब जेल के नियम किसी कैदी को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स रखने की अनुमति नहीं देते, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें पेन ड्राइव दी जानी चाहिए थी, विशेषकर तब जब उन्होंने दोबारा ऐसी कोई मांग नहीं की थी।”
आपत्तियों के खारिज होने पर: कोर्ट ने “अक्षम अथॉरिटी” के तर्क को भी खारिज करते हुए कहा कि निदेशक ने केवल एक “प्रशासनिक कार्य” किया और वे निर्णय केंद्र सरकार और सक्षम अथॉरिटी के ही थे।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हिरासत का आदेश पर्याप्त आधारों और निकटतम लिंक पर आधारित था। प्रक्रियात्मक मानदंडों का पालन होने के कारण, कोर्ट ने दोनों विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण: मामले का शीर्षक: प्रियंका सरकारिया बनाम भारत संघ और अन्य (साथ में SLP (Crl) No. 24/2026)
केस संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 1484/2026
बेंच: जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमेइ कापम कोटिश्वर सिंह
दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

