आस्था और संवैधानिक कानून के बीच जारी बहस में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों की संविधान पीठ के समक्ष दलील दी कि धार्मिक विश्वास और परंपराएं किसी भी समुदाय का व्यक्तिगत विषय हैं और न्यायपालिका को इन पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है। केरल के ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले बोर्ड ने तर्क दिया कि अदालत को समुदाय की मान्यताओं को स्वीकार करना चाहिए और उन पर ‘अनिवार्यता’ (essentiality) की बाहरी कसौटियों को नहीं थोपना चाहिए।
TDB की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने जोर देकर कहा कि धर्म मान्यताओं और प्रथाओं का एक समूह है, जिसका पालन एक समान पहचान वाला समूह या समुदाय करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी व्यक्ति को धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन ये व्यक्तिगत अधिकार किसी धार्मिक समुदाय के सामूहिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकते।
सुनवाई के चौथे दिन सिंघवी ने तर्क दिया, “किसी व्यक्ति के अधिकारों को उस सीमा तक विस्तार नहीं दिया जा सकता जो उसी धर्म या समुदाय के अन्य सभी अनुयायियों के सामूहिक अधिकारों में हस्तक्षेप करे।”
बोर्ड ने ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ से जुड़े अदालती सिद्धांतों को भी चुनौती दी। सिंघवी ने कहा कि अदालतों के लिए संवैधानिक पाठ में कुछ भी जोड़ना, बदलना या घटाना अनुचित है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि पिछले कुछ फैसलों द्वारा ‘अनिवार्यता’ की जो व्याख्या पेश की गई है, वह वर्तमान संवैधानिक ढांचे के तहत पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-जजों की पीठ वर्तमान में विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे की जांच कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जोयमाल्य बागची शामिल हैं।
यह सुनवाई 2018 के उस फैसले के बाद हो रही है जिसमें पांच-जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। हालांकि, नवंबर 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने धार्मिक स्थलों पर भेदभाव और विभिन्न संवैधानिक अनुच्छेदों के बीच संघर्ष के मुद्दों को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया था।
इससे पहले 9 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी कि यदि मंदिर और ‘मठ’ संप्रदाय के आधार पर प्रवेश को प्रतिबंधित करते हैं, तो इससे हिंदू धर्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और समाज विभाजित होगा। यह मौखिक टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता सी. एस. वैद्यनाथन की दलीलों के जवाब में आई थी, जो भगवान अयप्पा के भक्तों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने तर्क दिया था कि अनुच्छेद 26(b) (किसी समुदाय को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार) को अनुच्छेद 25(2)(b) (राज्य की हिंदू संस्थानों को सभी के लिए खोलने की शक्ति) पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सबरीमाला की कानूनी लड़ाई में TDB का यह रुख काफी अहम माना जा रहा है। समुदाय की ‘व्यक्तिगत मान्यताओं’ को स्वीकार करने का तर्क देकर बोर्ड धार्मिक परंपराओं की व्याख्या में न्यायपालिका की भूमिका को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण भारत के 1,000 से अधिक मंदिरों का प्रबंधन करने वाले एक स्वायत्त निकाय के रूप में TDB की दलीलें मंदिर प्रशासन और पारंपरिक प्रथाओं के भविष्य के लिए दूरगामी परिणाम रख सकती हैं।
वर्तमान सुनवाई में इन बुनियादी सवालों का समाधान खोजने का प्रयास किया जा रहा है:
- धार्मिक प्रथाओं में अदालत किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती है?
- ‘धार्मिक समुदाय’ की परिभाषा क्या है?
- क्या ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ का परीक्षण संवैधानिक रूप से वैध है?
विभिन्न हितधारकों की दलीलें सुनने के साथ ही नौ-जजों की पीठ के समक्ष सुनवाई जारी है।

